नारी शक्ति और सृजन का उत्सव है अंबुवाची मेला
22 जून से 26 जून तक अंबुवाची मेला पर विशेष
अंबुवाची मेला भारत के सबसे विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। यह हर वर्ष कामाख्या मंदिर में आयोजित होता है। मान्यता है कि इस अवधि में देवी कामाख्या रजस्वला (मासिक धर्म) होती हैं। इसलिए मंदिर तीन दिनों के लिए बंद रहता है और चौथे दिन विशेष पूजा के साथ मंदिर के द्वार पुन: खोले जाते हैं। यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजनभर नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति में स्त्री शक्ति, प्रकृति और सृजन के सम्मान का अद्भुत प्रतीक है। हालांकि भारतीय समाज में सदियों से मासिक धर्म को लेकर अनेक सामाजिक संकोच मौजूद रहे हैं लेकिन अंबुवाची मेला इस धारणा के विपरीत जाकर स्त्री की जैविक प्रक्रिया को पवित्र और सृजनात्मक शक्ति के रूप में स्थापित करता है। इस सांस्कृतिक मेले के जरिये यह संदेश प्रेषित होता है कि जिस प्रक्रिया से जीवन की उत्पत्ति संभव होती है, वह अपवित्र नहीं बल्कि पूजनीय है। इसलिए कुछ लोग इसे नारी शक्ति का महापर्व कहते हैं। ,असम तथा पूर्वोत्तर भारत की लोकमान्यताओं में अंबुवाची का संबंध वर्षा ऋतु और धरती की उर्वरता से जोड़ा जाता है। माना जाता है इस समय धरती माता भी विश्राम करती हैं। परंपरागत रूप से कई किसान इन दिनों खेतों में हल चलाने या बुआई से कार्यों से बचते हैं। इस प्रकार यह पर्व कृषि संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावनाओं को व्यक्त करता है। इसी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा अंबुवाची मेला का कामाख्या मंदिर के साथ एक पवित्र सांस्कृतिक रिश्ता जोड़ा गया है। जैसा कि हम जानते हैं कामाख्या मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, सती कथा से जुड़ी मान्यताओं के कारण इसका विशेष महत्व है। अंबुवाची मेला तांत्रिक साधना, शक्ति उपासना और देवी परंपरा का सबसे बड़ा सार्वजनिक मंच माना जाता है। देश-विदेश से साधु, तांत्रिक, योगी और श्रद्धालु यहां एकत्रित होते हैं।
यह मेला भारत की सांस्कृतिक विविधता का सबसे जीवंत उदाहरण है। इस साल यह मेला 22 जून से शुरु होकर 26 जून 2026 तक मनाया जायेगा। कामाख्या मंदिर परिसर में 22 जून को मेले की शुरुआत होगी, जिसके बाद देवी के वार्षिक रजस्वला काल के मुताबिक तीन दिनों तक मंदिर का गर्भगृह बंद रहेगा और 26 जून को विशेष अनुष्ठानों के बाद यह पुन: दर्शन के लिए खोला जायेगा। इस साल इस मेले का विशेष धार्मिक महत्व है। क्योंकि इस साल अंबुवाची मेला ऐसे समय पर हो रहा है, जब स्त्री स्वास्थ्य, मासिक धर्म जागरुकता और प्रकृति के प्रति सम्मान पर देशभर में चर्चा बढ़ रही है। ऐसे में यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजनभर नहीं है बल्कि नारी शक्ति, सृजन और प्रकृति की उर्वरता के उत्सव का रूप ले लेता है। अंबुवाची के तीन दिनों तक जब देवी विश्राम करती हैं, तब पूरे समाज में स्त्रीत्व, सृजन और प्रकृति की शक्ति को सिर्फ प्रणाम ही नहीं किया जाता बल्कि उसके महत्व पर व्यापक विमर्श भी होता है। इस साल के कार्यक्रम में 22 जून को विशेष पूजा के बाद कामाख्या शक्तिपीठ के कपाट बंद हो जाएंगे और 23, 24 और 25 जून 2026 को देवी के विश्राम काल की मान्यता के मुताबिक श्रद्धालुओं को सामान्य दर्शन नहीं मिलेंगे। आज के इस आधुनिक काल में अंबुवाची मेले का सिर्फ धार्मिक या पौराणिक महत्व भर नहीं है, इसका सामाजिक और आधुनिक महत्व भी है। क्योंकि आज जब महिला स्वास्थ्य, मासिक धर्म, जागरुकता और लैगिंग समानता पर राष्ट्रव्यापी चर्चा हो रही है, तब भारतीय परंपरा के कुछ विशेष पक्षों को उसकी सृजनात्मक शक्ति के रूप में सम्मान देना प्रकृति के साथ अपने तार्किक संबंधों को बढ़ाना है।
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