चलो चली दीआं गल्लां
मेरी तरह अपनी आयु के अंतिम पड़ाव में से गुज़र रहे जीवों द्वारा अपने मित्र-प्यारों के याद करना स्वाभाविक है। अपने से छोटे होने के बावजूद दुनिया से पहले चले जाने वालों को विशेषकर। सुरजीत हांस की अंतिम तीन पुस्तकों के नाम ‘हुण तां’, ‘लंघ चल्ली’ तथा ‘बिरध लोक’ इसकी पुष्टि करते हैं। सुरजीत पातर की भी अंतिम तीन पुस्तकें ‘हनेरे विच सुलघदी वरणमाला’, लफ्ज़ां की दरगाह’ तथा ‘धुखदा जंगल’ थीं। ‘असीं तां जोबन रुत्ते मरनां’ को बार-बार दोहराने वाले शिव कुमार की इस भावना से तो पंजाबी पाठक तथा श्रेता बिल्कुल भी भूले हुए नहीं हैं। सुरजीत हांस मुझसे थोड़ा बड़े थे और शिव कुमार छोटे, 1937 में जन्म लेकर 1973 में चले जाने वाले। यहां हम शिव कुमार की ही बात करते हैं।
शिव मंच के बादशाह थे। वह मंच पर जाकर किसी बढ़िया बात को बिना अवसर के भी पढ़ते तो श्रोता झूम उठते थे। मेरे विवाह के बारातियों में वह भी शामिल थे, परन्तु वह इतनी देर से पहुंचे कि आते ही सो गए। श्रेताओं के सुबह तक इंतज़ार करना पड़ा, विवाह की रस्म के बाद तक। फिर आनंत कारज के बाद जो गीत उन्होंने सुनाया, वह है तो उनकी भारतीय साहित्य सम्मान प्राप्त ‘लूणां’ में से था, परन्तु है था बेटियों के दुख वाला गीत। लूणां के शब्दों तथा शिव के स्वरों में इतना दर्द था कि प्रत्येक श्रोते की आंखों में आंसू आ गए। माहौल इतना शोकमय हो गया कि संत सिंह सेखों को अपनी अधिक बेटियों का हवाला देकर सहज संतुष्टि की।
शिव ने अपने पंजाब के इतिहास, मिथिहास, चांद-तारों तथा थोहर कथूरिया को अपने पसंदीदा रंग में तैयार कर इस तरह पाठकों को समझाया कि लोगों के मन आज भी कायल हैं। उन्होंने पेड़ों, पौधों, छतों, दीवारों तथा उनकी परछाइयों को गहरे तथा नये अर्थ दिए।
मैंने एक यात्रा के समय उन्हें दिन के समय तारे तोड़ते हुए भी देखा है। मैं दिल्ली से चंडीगढ़ पहुंचा था। हम दोनों मांस-मुर्गा के आचार तथा दारू के तलाश में चंडीगढ़ से सोलन मार्ग पर पड़ते ढली नामक मोड़ की ओर चल पड़े। सस्ता बीयर का अड्डा होने के कारण भी। शिव कुमार को नदी से पार एक पहाड़ी महिला का भ्रम पड़ा। अचानक मुझे कार चलाते हुए अपने बाएं हाथ शिव के शब्द सुनाई दिए।
चड़ आ, चड़ आ, चड़ आ
धरती ’ते धरती धर आ
अज्ज सारा अम्बर तेरा
तैनूं रोकण वाला किहड़ा
उन्हें रोकना वाला कोई नहीं था। वैसे भी शिव के प्रशंसक उनके दाएं-बाएं जेब पैसे भर कर उन्हें दिल्ली तथा सात समुद्र पार घुमाते फिरते थे। उनके भीतर क्या था? उनके अपने शब्द सुनो :
मैनूं लोक कहिण मेरे गीतां ने
महिलां दी जिंद हंढाई है
पर लोक विचारे की जानण
गीतां की विथिया दर्द भरी
मेरा विचार है कि शिव का चंचल मन सदा नई तथा ताज़ा बात करने के लिए तड़पता रहा। वह पुरानी आंख से देखने के पक्ष में नहीं थे।
पुराणी अक्ख मेरे मत्थे ’चों कढ के
सुट्ट दिओ किधरे
एह अन्नी हो चुकी है
मैनूं इस अक्ख संग हुण
आपना आप नहीं दिसता
तुहानूं किंझ वेखांगां?
बदलते मौसमां की अग्ग सांवीं
किंझ वेखांगा?
शिव कुमार बटालवी की कविता का वास्तविक मूल्य सुरजीत पातर ने डाला था। तब जब खालिस्तान मांगने वाले पंजाब के और टुकड़े करना चाहते थे। उनके शब्थ दे।
पहिलां वारिस शाह नूं वंडिया सी
हुण शिव कुमार दी वारी है
ओह ज़ख्म पुराणे भुल्ल वी गये
नवियां दी होर तियारी है
प्रसंग कोई भी हो भावना मिज़र्ा गालिब वाली है :
रेखता के तुम ही उस्ताद नहीं ़गालिब
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था
जहां तक मेरा संबंध है मैं इस भावना को सदा अपने तकिये के पास रखता हूं। शिव कुमार के बेटे मिहरबान बटालवी द्वारा सम्पादित ‘शिव कुमार समूची कविता’ के रूप में जो शिव के प्रशंसक तथा मेरे मित्र विजय देव ने मुझे गत वर्ष के अंतिम दिनों में भेंट की थी।



