मूंगफली

मूंगफली में दाना नहीं हम तुम्हारे मामा नहीं। ये कहावत तो सुनी ही होगी। एक अदना सी चीज़ के लिए रिश्ते-नातों को ताक पर रखने वालों जरा सोचिए हम कितने महत्वपूर्ण हैं पर हां कृपया दिखावे पर मत जाए अपनी अक्ल लगाए। जी हां मैं मूंगफली हूँ, जिसका अपने नाम और सर नेम से कोई लेना नहीं। वैसे हमें चिनिया बादाम भी कहा जाता है। कभी-कभी कंफ्यूजन हो जाता है कि हमारा प्रमोशन किया जा रहा है या फिर बादाम भाई साहब का डिमोशन? वैसे हमें जाड़े का मेवा और टाइमपास के नाम से भी जानते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दे, मेरा नशा सिगरेट और शराब से भी ज्यादा खराब है।
बारिश की बात हो तो चाय-पकोड़े याद आते हैं, गर्मी की बात हो तो ठंडा-ठंडा कूल-कूल खाद्य पदार्थ याद आते हैं फिर जाड़ा बेचारा अछूता क्यों रह जाए। मूंगफली के बिना जाड़े की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सर्द कुहासे भरी रातों में रजाई में पैर डाले चर-चुर की आवाज़ कानों में एक मधुर संगीत से छेड़ती है। जिसका स्वाद किसी और ही लोक में ले जाता है। गलती से अगर आपने हमारा सेवन करना शुरू किया तो यकीन मानिए जब भी आप ये सोंचे कि अब बस करता हूं। इस बस के इंतज़ार में दो-चार मूंगफली वैसे ही गले के नीचे उतर जाती है और ऊपर से तुर्रा ये कि गलती से आखिरी  मूँगफली का स्वाद कसैला निकल गया तो मुँह के स्वाद को ठीक करने के लिए आपको 5-6 मूंगफली और खाने को और मजबूर कर देता है। सरकार चाहे जितना स्वच्छ भारत के झंडे गाड़ ले पर हमारे समर्थक छिलके इधर-उधर फेंककर और फूं-फूं कर उड़ाकर स्वच्छ भारत अभियान की धज्जियां उड़ा देते हैं। हमारे समर्थकों को इतने पर भी चैन नहीं मिलता है। वह हमारे छिलकों को आग में डाल एक अलग ही आनंद लेते है। कभी-कभी लगता है अपने मनोभावों को अग्नि देव के हवाले कर स्वाहा कर रहे हो।हमारा नशा कुछ ऐसा है हमारा चाहे कितना भी सेवन कर लो आखिर में एक कसक बनी ही रहती है। हर बार लगता है कि और ले ली होती तो अच्छा होता। कुछ तो इतने से भी बाज नहीं आते अपनी दोनों जेबों को हमें हवाले करने के बाद भी वह मुट्ठी भर उठाने के बाद ही महफिल छोड़ते हैं।
मूंगफली खाने का भी अपना एक ढंग होता है। जैसे बाटी चोखे के बिना, डोसा सांभर के बिना और छोला भटूरे के बिना अधूरा है। उसी तरह मूंगफली चटनी और दरदरे नमक के बिना अधूरी है।
‘भइया दो-चार और डाल दो।’
जिसे ठेले पर इस बात की पुकार सुनाई दे तो समझ लीजिए वो ठेला मूँगफली का ठेला है। मूँगफली के साथ मिलने वाली नमक की पुड़िया की भी अपनी ही अहमियत होती है। कुछ जगह मिर्च की चटनी भी मिलती है। कुछ लोग तो मूंगफली भी सिर्फ इसलिए खाते हैं क्योंकि उसके साथ स्वादिष्ट लहसुन-मिर्च की चटनी मिलती है। मूँगफली भरे मुंह में हमारे छिलके में चटनी लगा के चाटने का जो सुख है वह सुख शब्दों से परे है पर बस अब यहीं रुकिए... जब मूँगफली का स्वाद अपने चरम पर होता है तो एक मूँगफली के अंदर भरी हुई मिट्टी या रेत या फिर नमक आपके जीवन में फैले रायते की तरह जीभ पर फैल जाती है आपके स्वाद ग्रंथियों की ऐसी की तैसी कर देती हैं।
हर चीज़ को खाने का अपना एक सलीका होता है। जैसे भिंडी थोड़ी कुरकुरी, रोटी थोड़ी करारी बिरयानी थोड़ी सोंधी खाने में अच्छी लगती है। वैसे मूँगफली भी खाने का एक तरीका है। मूँगफली का ठोंगा खुलते ही खाने वाले व्यक्ति की जासूसी आंखें मोटी स्वस्थ और तंदुरुस्त भरी हुई मूँगफलियों पर धावा बोलता है। ततपश्चात कुपोषित, छोटी और थोड़ी बहुत जली-फुकी मूँगफलियों पर बाद में नज़र डालता है।  
ऐसे कठिन समय में मूँगफली खाते हुए अगर एक दाना हाथ से छूटकर गिर जाए तो बाई गॉड की कसम ऐसी फीलिंग आती है, जैसे पुरखों की संपत्ति हाथ से निकल गयी है या फिर करोड़ों की डीलिंग होते-होते ऑपोजिट पार्टी के पास चली गौ हो। मूँगफली खाने वाला व्यक्ति की इच्छा शक्ति की दाद देनी पड़ेगी जब तक वह उस मूँगफली के दाने को ढूंढ नहीं लेता तब तक दूसरी मूँगफली खाने में उसका मन नही लगता। जाने जा ढूँढता फिर रहा गाना स्वत: ही कानों में जोर-शोर से बजने लगता है।
आप हमारी उपयोगिता को कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं। मीटिंग में चाहे कितने भी गम्भीर मसलों पर चर्चा हो रही पर जिस महफिल में हम हो खाने वाले का सारा कंसेंट्रेसन इस बात पर होता है कि साथ वाला उनसे पहले ही हमें निपटा न जाए। अगर चार-पांच लोग एक साथ मूँगफली खा रहे हैं तो आपके खाने की स्पीड सामने वालों के खाने की स्पीड पर बहुत हद तक निर्भर करती है। हो सकता है आप पांच सौ मीटर के धावक हो और सामने वाला मैराथन दौड़ का आदि हो।
महफिल का दौर खत्म होते और छिलकों का ढेर लगने के बाद अगर गलती से एक-आध दाना फुदक कर हमारी आंखों के सामने आ जाता है तो सच पूछिए परम् आनन्द की अनुभूति होती है।

-लाल बाग कॉलोनी, छोटी बसही, 
मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश पिन कोड 231001
मो. 9415479796

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