समस्त मानवता की धरोहर है संत कबीर की वाणी
आज जयंती पर विशेष
भारतीय संत परम्परा में यदि किसी एक संत ने धर्म, समाज, अध्यात्म और मानवीय चेतना को सबसे अधिक झकझोरा, तो वह नाम है-संत कबीर। वह केवल एक कवि, संत या समाज सुधारक नहीं थे, बल्कि भारतीय आत्मा की उस जागृत चेतना के प्रतीक थे, जिसने मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने की दृष्टि दी। संत कबीर भारतीय अध्यात्म के ऐसे महासूर्य हैं, जिनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक, प्रेरक और क्रांतिकारी है, जितनी छह सौ वर्ष पूर्व थी। आज जब संसार हिंसा, युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, सामाजिक विभाजन, उपभोक्तावाद, मानसिक तनाव और नैतिक पतन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब कबीर की वाणी मानवता के लिए आशा की किरण बनकर सामने आती है। कबीर का समूचा चिंतन मनुष्य को स्वयं से जोड़ने, समाज को समरस बनाने और धर्म को आडम्बरों से मुक्त कर उसके मूल स्वरूप तक पहुंचाने का यत्न है।
संत कबीर का अवतरण ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय समाज अनेक प्रकार की रूढ़ियों, कर्मकांडों, जातीय विभाजनों और धार्मिक पाखंडों में उलझा हुआ था। एक ओर मुस्लिम शासकों की धर्मांधता थी, दूसरी ओर हिंदू समाज कर्मकांड और बाह्याचार के बोझ तले दबा हुआ था। धर्म का वास्तविक स्वरूप कहीं खो गया था। ऐसे संक्रमणकाल में कबीर जी ने स्पष्ट किया कि धर्म का सार ज्ञान, प्रेम, करुणा और आत्मानुभूति में है, न कि बाहरी कर्मकांडों में। उन्होंने मंदिर और मस्जिद दोनों की सीमाओं को पार करते हुए मनुष्य के भीतर स्थित परमात्मा की खोज का संदेश दिया। कबीर जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अनुभव के संत थे। उनकी वाणी किसी ग्रंथ, शास्त्र या परम्परा की दास नहीं थी। उन्होंने जो कहा, अपने अनुभव के आधार पर कहा। यही कारण है कि उनकी वाणी में अद्भुत प्रामाणिकता और जीवन-सत्य का तेज़ दिखाई देता है। कबीर निरन्तर आत्म-परीक्षण के पक्षधर थे। उनका प्रसिद्ध दोहा-’बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।’ आज के समय में भी उतना ही सार्थक है। वर्तमान समाज में दूसरों की आलोचना, निंदा और दोषारोपण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कबीर जी हमें आत्म-निरीक्षण और आत्मशोधन का मार्ग दिखाते हैं।
संत कबीर सर्वधर्म समभाव के सशक्त प्रवक्ता थे। उनका विरोध केवल अंधविश्वास, पाखंड और कट्टरता से था। उन्का उद्देश्य किसी धर्म विशेष की आलोचना नहीं, बल्कि मनुष्य को बाहरी आडंबरों से ऊपर उठाकर आंतरिक साधना की ओर ले जाना था। आज जब धार्मिक असहिष्णुता और सांप्रदायिक तनाव विश्व के अनेक देशों में संकट का कारण बने हुए हैं, तब संत कबीर का संदेश, ‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे’ मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
कबीर ने जाति-पाति की संकीर्णता को भारतीय समाज की बड़ी कमज़ोरी माना। उन्होंने सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना का प्रयत्न किया। संत कबीर ने मनुष्य की पहचान उसके कर्म, ज्ञान और चरित्र से करने की बात कही। उन्होंने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक ऊंचाई किसी जाति या वर्ग की बपौती नहीं है। एक सामान्य मनुष्य होकर भी वह भारतीय संत परम्परा के शिखर पुरुष बने। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिकता केवल जंगलों, आश्रमों और मठों तक सीमित नहीं है। उन्होंने गृहस्थ जीवन जीते हुए उच्चतम आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त कीं। आज जब जीवन में तनाव, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता बढ़ती जा रही है, तब संत कबीर का जीवन-संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि परिवार और समाज के बीच रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन जिया जा सकता है।पर्यावरण संकट, हिंसा, असहिष्णुता और नैतिक पतन के इस दौर में कबीर की करुणा, सह-अस्तित्व और सादगी की जीवन-दृष्टि मानव सभ्यता को नई राह दिखा सकती है। कबीर की वाणी किसी एक युग की नहीं, बल्कि समस्त मानवता की धरोहर है। उनकी साखियां, सबद, रमैनी, बीजक और उलटबांसियां आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरणा देती हैं।
संत कबीर किसी एक धर्म, सम्प्रदाय या समुदाय के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के संत थे। उन्होंने अपने जीवन और वाणी से यह सिद्ध किया कि मनुष्य का वास्तविक धर्म प्रेम, सत्य, करुणा और आत्मबोध है। उन्होंने समाज को नई दृष्टि, धर्म को नई दिशा और अध्यात्म को नया आयाम दिया। आज संत कबीर जयंती के अवसर पर आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल उनके दोहों का पाठ न करें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। सचमुच, कबीर भारतीय अध्यात्म के महासूर्य हैं, जिनकी ज्ञान-किरणें युगों-युगों तक मानवता का मार्ग आलोकित करती रहेंगी।
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