अनावश्यक विवाद से बचे महाराष्ट्र सरकार

मौजूदा समय में महाराष्ट्र की सरकार ने 70 वर्ष पुराने ‘नांदेड़ सिख गुरुद्वारा सचखंड श्री हज़ूर साहिब अबचल नगर साहिब एक्ट 1956’ को रद्द करके ‘तख्त सचखंड श्री हज़ूर अबचल नगर साहिब गुरुद्वारा एक्ट’ के नाम वाला नया कानून बनाने की पहल स्थगित कर दी है। इस संबंध में सोमवार 22 जून को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देविन्द्र फड़नवीस के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल ने पुराने एक्ट को रद्द करने और उसके स्थान पर नया एक्ट बनाने का फैसला किया था। पुराने एक्ट का स्थान लेने वाले नए एक्ट के प्रारूप को भी मंत्रिमंडल ने स्वीकृति दे दी थी, जिसे विधानसभा के मॉनसून सत्र में पारित करने के लिए पेश किया जाना था।
महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले का न सिर्फ महाराष्ट्र, अपितु पूरे देश की सिख संस्थाओं और सिख संगठनों द्वारा कड़ा विरोध किया गया था। तख़्त श्री हज़ूर साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलवंत सिंह के नेतृत्व में पांच प्यारों और अन्य सिख संगठनों के प्रतिनिधियों द्वारा सर्वसम्मति से गुरमता पारित करके नए प्रस्तावित एक्ट का कड़ा विरोध किया गया था और पुराने एक्ट को ही कायम रखने की मांग की गई थी। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी, दिल्ली गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी और अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदार कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने भी इसका तीव्र विरोध करते हुए इसे सिखों के धार्मिक मामलों विशेष रूप से गुरुधामों के प्रबन्ध में महाराष्ट्र सरकार का अनावश्यक हस्तक्षेप करार दिया था। पंजाब के राजनीतिक गलियारों में भी इसके विरोध में प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। उसके दृष्टिगत भाजपा के वरिष्ठ राष्ट्रीय प्रवक्ता आर.पी. सिंह और पंजाब भाजपा के अध्यक्ष स. केवल सिंह ढिल्लों ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देविन्द्र फड़नवीस के साथ बातचीत की और उक्त फैसला वापिस लेने के लिए कहा। इसका पंजाब में भाजपा की चुनाव गतिविधियों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की भारी सम्भावनाएं थीं। इस स्थिति के दृष्टिगत महाराष्ट्र सरकार ने मौजूदा समय में यह फैसला स्थगित कर दिया है और इस संबंध में अंतिम फैसला लेने के लिए पांच सदस्यीय समिति बनाने का फैसला किया है। यह समिति आगामी समय में सिख संस्थाओं और सिख संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ विचार करके कोई फैसला लेगी।
यह पहली बार नहीं है कि महाराष्ट्र की सरकार ने तख़्त श्री हज़ूर साहिब के 1956 वाले एक्ट से छेड़छाड़ करने का यत्न किया है। इससे पहले भी ऐसे यत्न हुए हैं। 1956 में बने उक्त एक्ट के अनुसार तख़्त श्री हज़ूर साहिब का प्रबन्ध चलाने वाले बोर्ड के कुल 17 सदस्य होते हैं। सचखंड हज़ूरी खालसा दीवान महाराष्ट्र के 04, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी अमृतसर के 03, च़ीफ ़खालसा दीवान अमृतसर द्वारा 01, मध्य प्रदेश से सिख सदस्य 01, महाराष्ट्र के सिखों में से 03 सदस्य, केन्द्र सरकार द्वारा नामज़द सिख सांसद 02, महाराष्ट्र सरकार द्वारा 02 और हैदराबाद और सिकंदराबाद से संयुक्त रूप से 01 सिख सदस्य नियुक्त किया जाता है। इस विवरण से स्पष्ट होता है कि यह एक्ट बहुत ही दूरदृष्टि से तैयार किया गया है और देश की सिख संस्थाओं को अधिक से अधिक संतुलित ढंग से प्रतिनिधित्व देने वाला है। एक्ट के अनुसार सरकारी हस्तक्षेप बेहद सीमित ही हो सकता है। महाराष्ट्र की सरकारें तख़्त श्री हज़ूर साहिब का प्रबन्ध चलाने वाले बोर्ड में अधिक हस्तक्षेप की इच्छुक रही हैं। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने 1956 के एक्ट में संशोधन करने के लिए 2015, 2018, 2019, 2023 और 2024 में कई बार यत्न किए हैं, जिसका सिख पंथ की ओर से बार-बार विरोध किया गया है। इस समय भी तख़्त श्री हज़ूर साहिब का प्रबन्ध सरकारी ‘केयरटेकर’ द्वारा चलाया जा रहा है। एक्ट के अनुसार बोर्ड का गठन सरकार द्वारा नहीं किया गया। सरकार ने एक्ट में संशोधन करने या नया एक्ट बनाने के लिए भाटिया आयोग भी स्थापित किया था। अब नया एक्ट बनाने के लिए उक्त आयोग की कथित सिफारिशों को ही आधार बनाया जा रहा है।
इस संबंध में हमारी बड़ी स्पष्ट राय है कि जब सिख भाईचारा 1956 एक्ट केअनुसार ही तख़्त श्री हज़ूर साहिब का प्रबन्ध चला कर सन्तुष्ट है और नए एक्ट की कोई मांग नहीं की जा रही तो सरकार यह  व्यर्थ की कवायद करके सिख भाईचारे की नाराज़गी क्यों लेना चाहती है। यदि महाराष्ट्र की सिख संगतें या देश भर की अन्य सिख संस्थाओं और संगठनों की ओर से इस तरह की मांग आती है तो ही सरकार को इस संबंध में कोई पहलकदमी करनी चाहिए, नहीं तो यह मामला पूरी तरह ठप्प कर देना चाहिए। इसमें ही महाराष्ट्र सरकार और देश भर के सिख भाईचारे की भलाई है। उम्मीद करते हैं कि आगामी समय में सरकार इस संबंध में उचित फैसला लेकर पुराने एक्ट के अनुसार ही बोर्ड का गठन करके इस विवाद को पूरी तरह से समाप्त कर देगी।

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