न्याय के नये दौर की शुरुआत हैं नए फौजदारी कानून
164 वर्षों तक भारत की न्याय व्यवस्था ब्रिटिश दौर के कानूनों पर चलती रही, जो लोकतंत्र के लिए नहीं, ब्रिटिश शासन के लिए बनाए गए थे। 1860 का इंडियन पीनल कोड, 1898 का क्रिमिनल प्रोसीज़र कोड और 1872 का इंडियन एविडेंस एक्ट आज़ादी के 77 साल बाद भी चलते रहे। सड़कों, गली-मोहल्लों में होने वाले अपराधों का स्वरूप तेज़ी से बदल गया। साइबर धोखाधड़ी, संगठित गिरोह, गैंगस्टर और डिजीटल अरेस्ट जैसे अपराध बढ़े, परन्तु कानून पुरानी व्यवस्था पर ही टिका रहा। 1 जुलाई, 2024 को भारत ने एक मज़बूत फैसला लिया और बस्तीवादी कानूनों के स्थान पर तीन नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता (बी.एन.एस., नया आपराधिक कानून), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बी.एन.एस.एस., नयी आपराधिक प्रक्रिया संहिता) और भारतीय सबूत एक्ट (बी.एस.ए., नया सबूत कानून) बनाकर लागू किये जो आज़ाद भारत के लिए सबसे बड़ा कानूनी सुधार साबित हुए। हरियाणा के डी.जी.पी. के तौर पर मैंने इस तबदीली को विगत दो वर्षों में सिर्फ एक प्रशासक के रूप में नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर एक थाने से लेकर फोरैंसिक लैब और अदालत के गलियारों तक देखा है। नए आपराधिक कानून लागू करने में विगत 21 जून को 94.42 का स्कोर प्राप्त करके हरियाणा देश भर में पहले नम्बर पर पहुंचा। इस रैंकिंग के लिए चार स्तंभों को मज़बूत किया गया, पहला प्रशासनिक सुधार, दूसरा कार्यकुशलता, तीसरा सूचना और संचार तकनीक (आई.सी.टी.) का एकीकरण और चौथा आपराधिक न्याय व्यवस्था (आई.सी.जे.एस.) के साथ तालमेल। नये आपराधिक कानूनों के साथ आई बड़ी तबदीली को समझने के लिए भारत की दशकों पुरानी कानून-न्याय व्यवस्था की उन पांच चुनौतियों को समझना ज़रूरी है, जिनके साथ निपटने में नया कानून समर्थ साबित हो रहा है :-
जवाबदेही : नए कानून में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत पुलिस के जांच अधिकारी (आई.ओ.) ने महिलाओं के खिलाफ शारीरिक अपराध की जांच दो माह में पूरी करनी है। बहस पूरी होने के बाद जज ने 45 दिनों में फैसला करना है। नया कानून सुनवाई स्थगित करने पर रोक लगाता है, यदि कोर्ट में चार्जशीट 60 से 90 दिनों के अंदर दाखिल न हुई तो आरोपी को इस निश्चित समय के बाद कानूनी ज़मानत का अधिकार अपने आप मिल जाता है। ई-साक्षी जैसे डिजिटल सबूत प्लेटफार्म और इलैक्ट्रानिक प्रबंधन प्रणाली सबूतों को सख्त निगरानी में सुरक्षित रखती है।
विचाराधीन कैदियों को राहत : जेलों में बंद 5.70 लाख कैदियों में से 76 प्रतिशत विचाराधीन कैदी न्याय की उम्मीद में वर्षों से जेलों में हैं। नया कानूनी ढांचा निश्चित समय-सीमा में जांच यकीनी बनाता है। समय-सीमा खत्म होने पर डिफाल्ट ज़मानत दी जा रही है। रिमांड सुनवाई के लिए वीडियो कांफ्रैंसिंग लागू हो गई है। ज्यादा से ज्यादा सज़ा का एक निश्चित हिस्सा पूरा होने के बाद रिहाई पर विचार करना ज़रूरी है।
वैज्ञानिक सबूत : नए कानून तहत फोरैंसिक और इलैक्ट्रानिक सबूतों ने गवाहों को मज़बूत किया है। गम्भीर अपराधों में फोरैंसिक जांच ज़रूरी है। डिजिटल रिकार्ड और वैज्ञानिक जांच पर अधिक विश्वास किया जा रहा है। फिंगरप्रिंट, डी.एन.ए., डिजिटल निशान और अन्य सुराग सबूतों की कड़ी मज़बूत करने से अदालत में सच्चाई आधारित न्याय मिलने के मौके बढ़े हैं।
21वीं शताब्दी के अपराधों पर चोट : औपनिवेशिक कानूनों ने कभी साइबर अपराध, संगठित गिरोह या डिजिटल वित्तीय जाल की कल्पना नहीं की थी। उन्होंने भीड़ की हिंसा (मॉब लिंचिंग) की भी कल्पना नहीं की थी।
भारतीय न्याय संहिता (बी.एन.एस.) इन खतरों के साथ सीधा निपटती है। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा मज़बूत की गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से आए अहम सुरक्षा उपाय, जैसे लाज़मी एफ.आई.आर. (प्रथम सूचना रिपोर्ट) और गिरफ्तारी के नियम अब सिर्फ अदालती व्याख्या नहीं रहे, बल्कि कानून का हिस्सा बन गये हैं।
एफ.आई.आर. क्षेत्र अधिकार खत्म : एफ.आई.आर. दर्ज करवाने के लिए पुलिस थानों के क्षेत्र अधिकार के झगड़े बहुत सारे लोगों को न्याय से दूर कर देते थे। अब अपराध देश के किसी भी कौने में हुआ हो, बिना क्षेत्र अधिकार के ज़ीरो एफ.आई.आर. देश भर में किसी भी थाने में दर्ज करवाई जा सकती है। ई-एफ.आई.आर. के साथ लोग बिना थाने गये डिजिटल शिकायत दर्ज करा सकते हैं। गवाह सुरक्षा, वीडियो-लिंक गवाही और पहचान छुपाने के उपाय असरदार साबित हुए हैं। डिक्रिमिनलाइज़ेशन के संकल्प को पूरा करने के लिए समर्था से अधिक भरी जेलों में भीड़ कम करने के यत्न पूरे हो रहे हैं। मामूली अपराधों पर आपराधिक आरोप का कलंक दूर करके नया कानून इन्सानियत को महत्व देता है।
नए आपराधिक कानूनों के तहत पुलिस की भूमिका में प्रशासनिकता के साथ नैतिकता बढ़ाने के यत्न जारी हैं। मोबाइल फोरैंसिक यूनिट का इस्तेमाल पीड़ितों को यह बताता है कि उनकी सच्चाई की क्या कीमत है। ई-सम्मन गवाहों के समय की कदर करता है। डी.एन.ए. और आवाज़ के नमूने की जांच, सी.सी.टी.वी. फुटेज और फोरैंसिक रिपोर्ट से तैयार डिजिटल चार्जशीट अदालत को बताती है कि पुलिस सच्चाई को महत्व दे रही है। नये आपराधिक कानूनों ने हर हिस्सेदार यानी न्यायपालिका, जनता, पुलिस, वकील, फोरैंसिक साईंस लैब और सरकार को डिजिटल औज़ारों के साथ समर्थ बनाया है, ताकि न्याय के लिए हर नागरिक विश्वास से आगे बढ़े, डर से नहीं।
-डी.जी.पी., हरियाणा।
मो. 98888-54444



