क्या नया कानून ग्रामीण आर्थिकता को प्रोत्साहन दे पाएगा ?

एक जुलाई से केन्द्र सरकार द्वारा ग्रामीण रोज़गार के साथ जुड़े नए कानून विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार और आजीविका ‘ग्रामीण’ एक्ट ‘वी बी-जी राम जी कानून’ लागू कर दिया गया है। इसलिए केन्द्र सरकार द्वारा अदायगियों के लिए पहली 95,690.31 हज़ार करोड़ की राशि भी राज्यों में वितरित कर दी गई है। इसके दायरे में देश की 2,86,000 से अधिक पंचायतें आएंगी। इस तरह कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के समय वर्ष 2005 में बनी नरेगा योजना और जिसका बाद में नाम बदल कर मनरेगा कर दिया गया था, का स्थान  इस नई योजना ने ले लिया है। लागू होने से पहले कांग्रेस सहित देश की कई बड़ी विपक्षी पार्टियों ने नई योजना के बीच की कई धाराओं की कड़ी आलोचना की थी।
कर्नाटक सरकार ने इसके विरुद्ध अदालत में मामला भी दायर किया था और पंजाब विधानसभा में इसके लागू होने के विरुद्ध प्रस्ताव भी पारित किया गया था। संयुक्त प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन द्वारा नरेगा योजना शुरू करने से पहले भी ग्रामीण रोज़गार संबंधी कुछ योजनाएं देश में चलती रही थीं। तीसरी पांच वर्षीय योजना जो (1961-66) में शुरू की गई थी, के दौरान ग्रामीण रोज़गार योजना शुरू की गई थी। उस समय यह ग्रामीण रोज़गार योजना देश के लगभग एक हज़ार ब्लॉकों में लागू की गई थी। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार द्वारा 2005 में शुरू की गई मनरेगा योजना को एक बड़ी उपलब्धि माना जाता रहा है। मोदी सरकार ने भी हिचकिचाते हुए इसे जारी रखा था। चाहे उनकी ओर से लगातार इस योजना की कमियों को दर्शाया जाता रहा था। ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी अक्सर इसकी कमियों संबंधी बयान दिए थे। इस नए कानून के तहत इस ग्रामीण रोज़गार योजना के लिए 60 प्रतिशत फंड केन्द्र देगा और राज्यों को इसमें 40 प्रतिशत फंड का योगदान देना पड़ेगा। शिवराज सिंह ने कहा है कि सरकार यह सुनिश्चित बनाएगी कि कोई भी योग्य ग्रामीण मज़दूर एक दिन के लिए भी काम से वंचित न रह सके। पहले की भांति ही ग्राम पंचायतें इस योजना को लागू करने में अपनी मुख्य भूमिका निभाएंगी। केन्द्रीय मंत्री अनुसार पहली योजना में कई गम्भीर कमियां थीं। बड़े पैमाने पर धन का दुरुपयोग हो रहा था। मास्टररोल ठीक नहीं बनाए गए थे और मज़दूरों की दिहाड़ी में हेरा-फेरी की जा रही थी। पहली योजना में अलग-अलग राज्यों में दिहाड़ियों के भुगतान में भी बड़ा अंतर था। उत्तराखंड, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा में 241 रुपये प्रतिदिन दिहाड़ी दी जाती थी, जबकि केरलम, हरियाणा, पंजाब और कर्नाटक में यह दिहाड़ी 360 से लेकर 409 रुपये तक पहुंच जाती थी, परन्तु अब कम से कम दिहाड़ी 327 रुपये प्रतिदिन निर्धिरित की गई है।
इस नई योजना संबंधी विरोधी स्वर उठने के बावजूद समाचारों के अनुसार 29 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने इस कानून के लिए बजट के प्रबन्ध कर लिए हैं, जबकि 24 राज्यों ने इस योजना के प्रति सरकारी तौर पर समर्थन दे दिया है। इस संबंध में यह भी सुनिश्चित बनाया गया है कि नए डिजीटल प्रबन्ध द्वारा काम खत्म होने के कुछ दिनों के भीतर ही पैसे सीधे मज़दूर के खाते में डाल दिए जाएंगे। मजदूर की हाज़िरी को भी डिजीटल प्रबन्ध के साथ जोड़ा गया है। नि:संदेह सरकार द्वारा इस समूचे प्रबन्ध को सुचारू बनाने के लिए बड़े यत्न किए गए हैं। जिनका सीधा प्रभाव आगामी दिनों में देखा जा सकेगा। यह भी देखा जाएगा कि यह नया कानून ग्रामीण आर्थिकता को मज़बूत बनाने में कितना सहायक होता है। क्योंकि इस कानून में योग्य ग्रामीण परिवारों को 125 दिन तक रोज़गार देने का वायदा किया गया है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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