यूरोप की भीषण गर्मी से सबक सीखे भारत
फ्रांस में भीषण गर्मी के कारण डेढ़ हजार से अधिक लोगों की मौत एक गंभीर पारिस्थितिकीय आपातकाल है। साफ है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम भविष्य की कोई अमूर्त आशंका नहीं, भयावह वर्तमान है। फ्रांस की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार वास्तविक संख्या अभी और बढ़ सकती है। उनके स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि हीटवेव का प्रभाव अभी बना रह सकता है। निस्संदेह जब ठंडी जलवायु के अभ्यस्त विकसित देश प्रकृति के इस रौद्र रूप के सामने बेबस नज़र आने लगें, तो मानना होगा कि पृथ्वी का तापीय संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ा चुका है। यूरोप का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा इस समय तापमान के पुराने रिकॉर्ड तोड़कर नए रिकॉर्ड बनाने की स्थिति में है। स्पेन में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है, जर्मनी ने अपने इतिहास की सबसे गर्म रात दर्ज हुई, फ्रांस के पिस्सोस में 44.3 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड हुआ, जबकि ब्रिटेन, डेनमार्क, चेक गणराज्य, पोलैंड और स्विट्जरलैंड में भी दशकों पुराने रिकॉर्ड टूट गए हैं।
हालांकि पहली बार नहीं है, जब यूरोप ने ऐसी त्रासदी देखी हो। 2003 की हीटवेव में फ्रांस सहित पूरे यूरोप में लगभग 70 हजार लोगों की जान गई थी, जबकि 2022 में भी लगभग 61 हजार अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं। अब 2026 की भीषण गर्मी बताती है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का संकट नहीं, वर्तमान का कठोर यथार्थ है। 2022 के बाद 2026 में फिर ऐसी आपदा बताती है कि शीघ्र ही यूरोप के देशों का यह वार्षिक कार्यक्रम होने वाला है। फ्रांस समेत समूचे यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव जलवायु परिवर्तन की भयावह चेतावनी के साथ तमाम सवालों को जन्म देती है। समूचा यूरोप इस तरह अचानक क्यों तपने लगा? यह सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप क्यों बन रहा है? यहां गर्मी बढ़ाने के लिए कौन से कारक जिम्मेदार हैं? फ्रांस और दूसरे उन्नत यूरोपीय देश ऐसी गर्मी के आगे इतने असहाय क्यों हैं?
भारत में 43 डिग्री की गर्मी और यूरोप की 43 डिग्री की गर्मी में इतना फर्क कैसे है? यूरोप पहले भी हीटवेव झेल चुका है क्या उन्होंने अतीत से कोई सीख नहीं ली। अंतर्राष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वेदर ऐट्रिब्यूशन ने हीटवेव को अब और अधिक तीव्र, बार-बार आने और लंबे समय तक टिकने वाली है, चेताया था। फ्रांस और दूसरे देशों ने उसके मुताबिक तैयारी क्यों नहीं की? इस हीटवेव से सीख लेकर यूरोप भविष्य में इसके बचाव के लिए क्या उपाय अपना सकता है? भारत एक गर्म देश है, भीषण गर्मी यहां जान और माल दोनों को नुकसान पहुंचाती है। क्या यूरोप जिन तरीकों को अपनायेगा, वे सब भीषण गर्मी से बचने के लिये हमारे भी काम आ सकते हैं? भारत को यूरोपीय परिघटना से क्या कुछ सीख लेनी चाहिये? विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि यूरोप वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से गर्म हो रहा है। आखिर यूरोप ही इतना क्यों तप रहा है? इसके पीछे अनेक वैज्ञानिक कारण हैं। पहला कारण ‘हीट डोम’ है, जिसमें उच्च दाब का विशाल क्षेत्र गर्म हवा को एक ढक्कन की तरह अपने भीतर कैद कर लेता है। दूसरा कारण आर्कटिक के तेजी से गर्म होने से उसकी बर्फ पिघती है और ‘अल्बेडो प्रभाव’ कमजोर पड़ता है, जिससे वहां की धरती अधिक ऊष्मा सोख रही है। तीसरा कारण जेट स्ट्रीम का बदलता स्वरूप है, जिसके कारण ठंडी अटलांटिक हवाएं यूरोप तक नहीं पहुंच पा रही हैं। चौथा कारण जीवाश्म ईंधनों के निरंतर उपयोग से बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें हैं। हीटवेव से महज मौतें ही नहीं हो रहीं जंगलों में आग, बिजली ग्रिड पर दबाव, रेलवे पटरियों का फैलना, सड़कों का पिघलना, जल संकट, ग्लेशियरों का गलना, कृषि उत्पादन में गिरावट, स्कूलों का बंद होना और पर्यटन उद्योग पर भी उसके दुष्परिणाम दिख रहे हैं। फ्रांस में हजारों स्कूल बंद करने पड़े, जर्मनी में रेल सेवाएं बाधित हुईं, इटली में पो नदी का जलस्तर गिर गया, स्पेन और पुर्तगाल के जंगलों में भीषण आग लगी। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, हृदयाघात, श्वसन रोग और किडनी संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी। मुर्दाघरों तक में शव रखने की जगह कम पड़ गई। यह दृश्य बताता है कि अत्यधिक गर्मी किसी महामारी जितनी विनाशकारी है।
हम 44 डिग्री से भी ज्यादा का तापमान इसलिए झेल जा रहे हैं; क्योंकि देश का अधिकांश भाग उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में स्थित है, इसलिए हमारी जैविक अनुकूलन क्षमता अपेक्षाकृत अधिक है, यूरोपीय लोगों के पास ऐसा अनुकूलन नहीं है। फिर यूरोप की हीटवेव अत्यधिक उमसभरी होती है। उच्च आर्द्रता के कारण पसीना वाष्पित नहीं हो पाता, जिससे शरीर का आंतरिक ‘कूलिंग सिस्टम’ फेल हो जाता है और ‘वेट-बल्ब’ तापमान बढ़ने से शरीर के अंग काम करना बंद कर देते हैं। हमारे यहां पारंपरिक भवनों में वेंटिलेशन, ऊंची छतें और खुली संरचना गर्मी कम करने में मददगार हैं। इसके विपरीत यूरोपीय भवन सर्दियों के लिए डिजाइन होते हैं। मोटी दीवारें और इन्सुलेशन गर्मी को भीतर कैद कर घर को ओवन जैसा बना देते हैं। वहां घरों दफ्तरों में एयर कंडीशनर का चलन भी सीमित है। इसलिए उनके लिए 40 डिग्री का तापमान भी जानलेवा होता है। हालांकि फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों ने इस संकट से निपटने के लिए रेड अलर्ट, कूलिंग सेंटर, सार्वजनिक स्थानों पर मिस्टिंग स्टेशन, कामकाज के घंटों में बदलाव, स्कूलों को अस्थायी तौर पर बंद करना, जंगलों में आग की विशेष निगरानी, अस्पतालों की अतिरिक्त तैयारी तथा कमजोर वर्गों की निगरानी जैसे अनेक कदम उठाए हैं, लेकिन ये पर्याप्त नहीं पाए गए।
तापमान वृद्धि से कृषि उत्पादकता, निर्माण कार्य, श्रम क्षमता और औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होते हैं। बढ़ती गर्मी का सीधा प्रभाव बिजली की मांग, स्वास्थ्य व्यय, जल संकट और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ता है। फ्रांस और यूरोप की यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन किसी महाद्वीप, संस्कृति या आर्थिक समृद्धि का भेद नहीं करता।
भारत हर बरस इसे झेलता है, हमें इस यूरोपीय अनुभव से समय रहते सीख लेनी होगी। प्रत्येक राज्य को प्रभावी हीट एक्शन प्लान लागू करना होगा। स्थानीय निकायों को छायादार सड़कें, वाटर प्वाइंट, सार्वजनिक कूलिंग सेंटर, श्रमिकों के लिए कार्य समय में बदलाव, विद्यालयों और अस्पतालों की विशेष तैयारी तथा मौसम पूर्व चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करना होगा। भवन निर्माण संहिता में तापरोधी डिजाइन को अनिवार्य बनाना चाहिए। साथ ही स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, वृक्षारोपण और कार्बन उत्सर्जन में कमी को राष्ट्रीय विकास रणनीति का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



