क्षेत्रीय दलों की अंदरूनी टूट-फूट
सभी राजनीतिक पार्टियां अपने कुछ आदर्श तय करके चलती थीं। पार्टी के सदस्य और पदाधिकारी उन आदर्शों/नियमों का सम्मान करते थे। प्रतिबद्धता उनके खून में थी, संस्कारों में थी। मसलन मार्क्सवादी विचारधारा का अनुसरण करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां मजदूर और किसान का नेतृत्व करती थीं और पूंजी आधारित क्षेत्र का विरोध करती थी, लेकिन पिछले कुछ समय से विचारधारात्मक प्रतिबद्धता की इतनी परवाह नहीं देखी गई अलबत्ता अपनी सुविधा और राजकीय दबाव का सामना न करते हुए टूट-फूट में भारी इज़ाफा देखा गया है।
तृणमूल कांग्रेस का चकित करने वाला विघटन हाल ही में देखा गया। चुनाव में राजनीतिक पार्टी की हार-जीत का सिलसिला चलता रहता है परन्तु उसके सदस्य भाग नहीं जाते। फिर लड़ने का वायदा कर विपक्ष में बैठना पसंद करते हैं। तृणमूल कांग्रेस का विघटन तो दिल्ली में भाजपा को मज़बूत करने में जुट गया। भाजपा ने अपने दम पर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया था। तृणमूल का बिखराव पराजय के कुछ ही घंटों बाद शुरू हो गया और देखते-देखते राज्य विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई विधायकों ने अलग होकर ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में एक बागी गुट बना लिया। उन्होंने दावा किया कि वही असली तृणमूल कांग्रेस है। विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें विपक्ष के रूप में सदस्यता देने में ज्यादा वक्त नहीं लगाया। इतना ही नहीं लोकसभा के बीस तृणमूल सांसदों ने भी लोकसभा अध्यक्ष से सम्पर्क किया और उन्हें सूचित किया कि वे नैशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर चुके हैं, दसवीं अनुसूची में दिए गए दो-तिहाई और विलय के प्रावधान का मोटिव दलबदल विरोधी कानून के तहत संसद की सदस्यता रद्द होने से बचता था। बीस सांसदों का यह विलय एक ऐसी पार्टी में हुआ जिसका पहले कभी किसी ने नाम तक नहीं सुना था। यह एन.सी.पी.आई. त्रिपुरा की एक छोटी पार्टी है जो पंजीकृत तो है लेकिन उसे मान्यता प्राप्त नहीं है। यह 2023 में बनी बताई गई। जिसने राज्य में विधानसभा चुनाव लड़ा था, जिसे एक हज़ार से भी कम वोट मिले थे।
यहां एक बात गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस के बीस बागी सदस्यों ने भाजपा में विलय का विकल्प नहीं चुना। हालांकि इस समूह का नेतृत्व करने वाली काकोली घोष दस्तीदार ने साफ कर दिया है कि वे एन.डी.ए. का समर्थन करेंगे। शायद भाजपा ही नहीं चाहती कि कुछ ही हफ्ते पहले जिस पार्टी के नेता उन्हें भ्रष्ट कहते रहे, उसके सांसद एकदम अपने खेमे में दाखिल होकर व्यर्थ की टीका-टिप्पणी मोल लें।
तृणमूल पार्टी का विभाजन कोई अकेली घटना नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना (यू.जी.टी.) भी एक और विभाजन के लिए तैयार खड़ी है। भाजपा ने अभी कुछ समय पहले विधानसभा चुनाव में हार का सामना कर चुके डी.एम.के. के प्रति अलग रणनीति का इज़हार किया है। वह द्रविड़ पार्टी के सम्पर्क में हैं ताकि परिसीमन विधेयकों पर उसका समर्थन हासिल किया जा सके। इन विधेयकों की डी.एम. के. सबसे मुखर आलोचक रही है। उसका तर्क है कि इससे दक्षिणी राज्यों को उत्तरी राज्यों की तुलना में नुकसान होगा। इस समय मिल रहे संकेत बता रहे हैं कि सरकार विधेयकों में बदलाव कर रही है, ताकि डी.एम.के. को साथ लाया जा सके। यदि डी.एम.के. अपनी लोकसभा की 22 सीटों के साथ भाजपा के साथ आती है तो यह भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकती है। पिछले दिनों पंजाब की आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के सदस्य राघव चड्ढा सहित भाजपा में चले गये। इससे पहले कि और टूट-फूट हो, आम आदमी पार्टी की लीडरशिप ने अपना घर मज़बूत कर लिया।



