भारत-पाकिस्तान संबंध, संघ तथा भाजपा की रणनीति

जज़्बात भी हिन्दू होते हैं, 
चाहत भी मुसलमां होती है,
दुनिया का इशारा था लेकिन,
 समझा ना इशारा दिल ही तो है।
-सहिर लुधियानवी 
यह वास्तविकता है कि भाजपा तथा आरएसएस की राजनीति तथा रणनीति की बुनियाद ही हिन्दू-राष्ट्र तथा मुसलमान विरोध पर टिकी हुई है। आरएसएस के नेता लाख बार कहते रहें कि उनका सपना ‘अखंड भारत’ है, परन्तु यह सिर्फ हाथी के दिखाने वाले दांतों जैसी ही बात है, क्योंकि यदि कभी भारत, बांग्लादेश तथा पाकिस्तान पुन: एक इकाई या देश अर्थात ‘अखंड भारत’ बन जाएं तो अब भारत में हिन्दू आबादी जो लगभग 79-80 प्रतिशत है, कम होकर 60 प्रतिशत पर आ जाएगी, जो भाजपा की राजनीति के बिल्कुल चरितार्थ नहीं होती। इसलिए ज़ुबानी जमा-खर्च अलग बात है, परन्तु वास्तव में भाजपा या आरएसएस के लोग कभी भी इसके पक्ष में नहीं होंगे। फिर ऐसा क्या है कि आरएसएस के कई बड़े नेता पाकिस्तान से संबंध सुधारने की बातें कर रहे हैं। एक ओर पाकिस्तान के साथ ट्रैक-2 की गैर-अधिकारित बातचीत करने के समाचार हैं और दूसरी ओर इससे इन्कार तथा इसका विरोध, यह दोहरी रणनीति के अर्थ समझना कठिन नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद कम से कम 4 बार बैक चैनल या पिछले दरवाज़े से भारतीय-पाकिस्तानी रणनीतिक विशेषज्ञों, पूर्व कूटनीतिज्ञों, पूर्व सांसदों तथा अन्य महत्वपूर्ण शख्सियतों द्वारा आपसी बातचीत की गई है। ताज़ा बातचीत जो सम्भावित रूप में 5वीं बातचीत है, यह श्रीलंका में ‘इंटरनैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ स्ट्रैटजिक स्टडीज़’ द्वारा करवाए गए सम्मेलन के दौरान हुई। इसमें भाजपा के लम्बा समय महासचिव रहे ताकतवर आरएसएस नेता राम माधव, पूर्व भारतीय जनरल एम.एम. नरवणे तथा यू.के. तथा पाकिस्तान में भारतीय राजदूत रही रुचि घनश्याम भारत की ओर से तथा पाकिस्तान की ओर से पाकिस्तानी साउथ एशिया मामलों के प्रमुख सज्जाद हैदर, पूर्व मंत्री एवं पूर्व राजदूत शैरी रहमान तथा सेवामुक्त सैन्य अधिकारी तथा भारतीय अभिनेता सैफ अली खान के चाचा इसफंदियार अली पटौदी जैसी बड़ी शख्सियतें शामिल थीं, इसमें एक भोज के समय अमरीकी स्टेट विभाग के एक सहायक सचिव एस. पौल कपूर भी शामिल हुए। इनमें लगभग डेढ़ दिन में कई वार्ताएं हुईं। इसी बीच आरएसएस के दूसरे सबसे बड़े नेता दत्तात्रेय होसबोले का बयान भी आया था कि भारत आतंकवाद पर कोई समझौता नहीं कर सकता, परन्तु पाकिस्तान के साथ व्यापारिक और लोगों के संबंधों को बहाल के बारे में सोचना चाहिए। बाद में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी इस बयान का समर्थन किया था। 
अब पाकिस्तान तथा भारत की लगभग 117 प्रमुख शख्सियतों ने भी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ को पत्र लिख कर दोनों देशों के रिश्ते बहाल करने की अपील की है, जिसमें अटारी-बाघा सीमा से व्यापार खोलने की बात भी शामिल है और वीज़ा सामान्य रूप में देने की भी मांग की गई है। हम समझते हैं कि यदि ऐसा होता है तो इसका सबसे अधिक लाभ पंजाब को ही होगा। 
परन्तु इस बीच भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव एवं सांसद तरुण चुघ ने कहा कि ‘आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।’ भारत की आतंकवाद के प्रति ज़ीरों टालरैंस की नीति है। हम श्री चुघ के बयान के इस हिस्से से तो सहमत हैं, परन्तु उनकी इस बात से सहमत नहीं हैं कि पत्र लिखने वाले लोगों ने बलिदान देने वाले और अपराधियों को नैतिक स्तर पर समान खड़ा करने का यत्न किया है। उल्लेखनीय है कि कथित ट्रैक-2 की बातचीत में शामिल रहे राम माधव ने ट्रैक-2 बातचीत को खारिज किया है। राजनीतिक रूप में यह भाजपा की दोहरी रणनीति प्रतीत होती है। इससे भारत सरकार शायद एक तरफ तो पाकिस्तान-भारत के बीच तनाव से अमरीका तथा चीन को लाभ उठाने से रोकना चाहती है, जबकि भारत की आंतरिक राजनीति में भाजपा की सारी टेक मुसलमान तथा पाकिस्तान विरोध पर टिकी होने के कारण वह इस पत्र तथा ट्रैक-2 बातचीत को नकार भी रही है। स्पष्ट है कि भाजपा नेता इस कथित ट्रैक-2 बातचीत तथा पत्र का विरोध करते भी दिखाई देते हैं जो घरेलू राजनीति के लिए ज़रूरी है और पाकिस्तान के साथ पिछले दरवाज़े की बातचीत शुरू करके अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में रणनीतिक लाभ भी हासिल करना चाहते हैं। 
मेरी हर बात का मतलब,
 समझ जाओगे तुम कैसे,
मेरी इक बात का मतलब,
 कभी भी एक नहीं होता।
-लाल फिरोज़पुरी 
केजरीवाल की सनातनी हिन्दू छवि की रणनीति
यह ठीक है कि आम आदमी पार्टी मुफ्त बिजली, अन्य सुविधाएं तथा अब महिलाओं के खाते में डाले 1000-1500 रुपये प्रति माह के दम पर 2027 के चुनाव जीतने की उम्मीद में है, परन्तु यह भी सच है कि पिछले 2022 के चुनाव में सिख समुदाय तथा प्रवासी पंजाबी बड़ी सीमा तक ‘आप’ की बड़ी जीत का कारण बने थे। परन्तु इस बार इस तरह के संकेत है कि सिख समुदाय और प्रवासी पंजाबी उस शिद्दत से ‘आप’ के साथ नहीं हैं जिस शिद्दत से वे 2017 तथा उसके बाद और भी तेज़ी से 2022 में ‘आप’ के साथ चले थे। शायद यही कारण है कि 2027 के  चुनाव से बिल्कुल पहले ‘आप’ प्रमुख अरविंद केजरीवाल अपने-आप को भाजपा से भी बड़ा सनातनी हिन्दू सिद्ध करने के यत्नों में लगे दिखाई देते हैं, क्योंकि यह समझा जाता है कि पंजाब का हिन्दू भाजपा को सिर्फ उन सीटों पर ही एक-मुश्त वोट देता है, जहां भाजपा उम्मीदवार के जीतने के आसार होते हैं, नहीं तो वह कांग्रेस की ओर झुक जाता है। यही कारण समझा जा रहा है कि श्री केजरीवाल हिन्दू वोट को भ्रमित करने के यत्न में लगे हैं, क्योंकि यह तो स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री तथा सरकार के श्री अकाल तख्त साहिब के साथ तनाव की स्थिति तथा अन्य कारणों से इस बार सिख तथा प्रवासी पंजाबी वोट ‘आप’ की ओर कम होगा। यही कारण है कि केजरीवाल यह घाटा हिन्दू वोट से पूरा करने के यत्न में लगे प्रतीत होते हैं। उन्होंने पहली बार श्री अमृतसर में लव-कुश तथा सीता जी का मंदिर बनवाने की घोषणा की है। पंजाब के 22 शहरों में ‘एक शाम भगवान शिव दे नाल’ मनाने के कार्यक्रम करवाने की घोषणा की है। ‘हमारे राम’ नाटक का भी मंचन करवाया जा रहा है और मुख्यमंत्री मुफ्त तीर्थ यात्रा में 3 नये रूट भी जोड़े गए हैं जो हिन्दू समुदाय के लिए हैं। इनमें सालासर-खाटू श्याम (राजस्थान), हरिद्वार-ऋषिकेश यात्रा (उत्तराखंड) तथा मथुरा-वृंदावन यात्रा (उत्तर प्रदेश) शामिल हैं। हमें क्या, किसी को भी हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार पर कोई एतराज नहीं होगा। पंजाब में हिन्दू-सिख रिश्ते बहुत गहरे हैं। 1984 का बड़ा घटनाक्रम भी इसमें कोई स्थायी दरार नहीं डाल सका, परन्तु हमें इस नई राजनीति से डर लगता है कि कहीं यह हिन्दू सिखों के बीच भाइचारे का कोई नुकसान न करे। वैसे हैरानी की बात है कि भगवान श्री वाल्मीकि का राम तीर्थ तो पहले ही माता सीता तथा लव-कुश का स्थान ही है। आज तक किसी भी पंजाबी हिन्दू संस्था ने या पंजाबी हिन्दू नेता ने श्री अमृतसर में इस तरह का मंदिर बनवाने की मांग नहीं की जबकि श्री केजरीवाल पंजाबी भी नहीं हैं, परन्तु नोट करने वाली बात है कि राजनीति में 2 जमा 2 का नतीजा 4 ही नहीं निकलता, कुछ और भी हो सकता है। इसलिए ‘आप’ को याद रखना चाहिए कि वह अपने आप को भाजपा से बड़ा सनातनी आसानी से सिद्ध नहीं कर सकेगी और ज़रूरी भी नहीं कि वह हिन्दू वोट बैंक तथा सिख वोट बैंक, दोनों को ही प्राप्त कर सकेगी। 
दोनों जहां पाने की चाहत करते 
तो हो फिर भी तुम,
सोचो कि दो की चाह में एक
 भी न खो जाए कहीं।
कांग्रेस में फूट के आसार अभी खत्म नहीं
हालांकि कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब कांग्रेस के सभी गुटों तथा प्रमुख नेताओं को व्यवस्थित करने का यत्न किया है और यह भी सूचना है कि इन नेताओं को 5-5 या 6-6 हलकों का स्वतंत्र प्रभार और जीतने की ज़िम्मेदारी भी सौंपी है। परन्तु ‘सरगोशियां’ हैं कि पंजाब कांग्रेस का एक मज़बूत गुट दिल्ली से लौटने के बाद बैठक करके अगली रणनीति तय करने की तैयारी में है। एक प्रमुख नेता ने तो नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा है कि वह तथा उनके साथी नए पदों से इस्तीफे देने के बारे सोच सकते हैं। उल्लेखनीय है कि पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने स्वयं विजयइंद्र सिंगला को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने की शर्त पर स्वयं चुनाव अभियान कमेटी का प्रमुख बनने के लिए हां की थी, क्योंकि उन्हें सिंगला से मुख्यमंत्री पद के लिए चुनौती नहीं दिखाई देती थी। यह पता लगा है कि कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे स्वयं सिंगला की पैरवी कर रहे थे। पता चला है अंतिम समय पंजाब कांग्रेस की नियुक्तियों में सबसे अधिक के.सी. वेणुगोपाल की चली है। यह भी हैरानी की बात है कि चुनाव प्रचार कमेटी में को-चेयरमैनों के रूप में सुखपाल सिंह खैहरा तथा राणा गुरजीत सिंह की नियुक्ति एक साथ करके क्या संकेत दिया गया है, जबकि दोनों में 36 का आंकड़ा किसी से छिपा हुआ नहीं। यह देखना दिलचस्प होगा कि ये दोनों किस तरह तालमेल करके  चलते हैं।    
इब्तदा-ए-इश्क है रोता है क्या,
आगे आगे देखिये होता है क्या। 
(मीर तकी मीर)  

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