ग्राम सभाओं में लोगों की कम भागीदारी पर उठते सवाल
भारतीय शासन व्यवस्था में लंबे समय से यह धारणा रही है कि लोकतंत्र को मज़बूत बनाने का सबसे अच्छा तरीका प्रक्रियाओं का विस्तार करना है। अधिक बैठकें हों, अधिक सूचनाएं जारी हों, अधिक रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध कराए जाएं और अधिक डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाए जाएं। लेकिन ग्राम सभाओं में लोगों की भागीदारी पर राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (एनआईआरडीपीआर) की हाल ही में प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट ‘नेशनल स्टडी ऑन लो पार्टिसिपेशन इन ग्राम सभा अक्रॉस द स्टेट्स एंड यूटीज’ यह संकेत देती है कि केवल प्रक्रियाएं बढ़ा देने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।रिपोर्ट केवल ग्राम सभाओं में कम उपस्थिति का अध्ययन नहीं है, बल्कि उस सोच पर भी सवाल उठाती है जिसमें लोकतांत्रिक सफलता का आकलन केवल प्रक्रियाओं के आधार पर किया जाता है। रिपोर्ट बताती है कि शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के आयोजन में तो पहले से अधिक सक्षम हुई हैए लेकिन उनके अपेक्षित परिणाम सुनिश्चित करने में अभी भी पीछे है।
रिपोर्ट के कई आंकड़े सकारात्मक दिखाई देते हैं। लगभग 66.4 प्रतिशत लोगों का मानना है कि सूचना तंत्र नागरिकों को ग्राम सभा तक लाने में प्रभावी है। 67.32 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्हें सार्वजनिक घोषणाओं के माध्यम से बैठक की जानकारी मिलती है। लगभग 86.78 प्रतिशत उत्तरदाताओं का कहना है कि ग्राम सभा में उनकी शिकायतें स्वीकार की जाती हैं। वहीं 49 प्रतिशत ग्राम पंचायतें ‘सभासार’ और 53 प्रतिशत ‘पंचायत निर्णय’ एप/पोर्टल का उपयोग कर रही हैं। यदि सूचना लोगों तक पहुंच रही हैए बैठकें हो रही हैं, शिकायतें स्वीकार की जा रही हैं और डिजिटल रिकॉर्ड भी तैयार हो रहे हैंए तो फिर भागीदारी कम क्यों बनी हुई है? रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि बेहतर प्रशासनिक प्रक्रियाएं अपने आप बेहतर लोकतंत्र की गारंटी नहीं देतीं। प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालनबढ़ा है, लेकिन लोकतांत्रिक विश्वसनीयता उसी गति से नहीं बढ़ सकी।
इस विरोधाभास को दो आंकड़े स्पष्ट करते हैं। जहां लगभग 87 प्रतिशत लोगों ने कहा कि ग्राम सभा में उनकी शिकायतें स्वीकार की जाती हैं, वहीं केवल 63.29 प्रतिशत लोगों का मानना है कि इन शिकायतों को वास्तव में दर्ज कर उन पर आगे कार्रवाई भी होती है। यह लगभग 23 प्रतिशत का अंतर केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि नागरिकों के भरोसे और शासन के बीच बढ़ती दूरी का संकेत है। जब लोग बार-बार अपनी बात रखते हैं लेकिन उसका परिणाम नहीं देखते, तो बैठकों में शामिल होने का उत्साह भी कम होने लगता है। लोकतंत्र अचानक अपना विश्वास नहीं खोता, बल्कि छोटी-छोटी उपेक्षाओं और अधूरे वादों के कारण उसकी विश्वसनीयता धीरे-धीरे कमज़ोर होती जाती है।
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण योगदान ‘ग्राम सभा में भागीदारी के प्रति घटता उत्साह’ की अवधारणा है। जब नागरिक बार-बार ऐसे अनुभव से गुजरते हैं कि उनकी बात सुनी तो जाती है, लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं होती, उनसे सुझाव तो लिए जाते हैं, लेकिन उन्हें लागू नहीं किया जाता, तब उनमें भागीदारी के प्रति उदासीनता विकसित होने लगती है। इसका समाधान केवल अधिक प्रचार-प्रसार या जागरूकता अभियानों से नहीं हो सकता। यदि दो-तिहाई ग्रामीणों तक पहले ही बैठक की सूचना प्रभावी ढंग से पहुंच रही है, तो समस्या सूचना की कमी नहीं है। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ग्राम सभा के निर्णयों का समयबद्ध क्रियान्वयन हो और लोग उसके परिणाम देख सकें।
प्रौद्योगिकी को लेकर भी रिपोर्ट महत्वपूर्ण संकेत देती है। सरकारें डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार को बड़ी उपलब्धि मानती हैं, लेकिन केवल डिजिटलीकरण से जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती। किसी एप पर शिकायत दर्ज हो जाने या किसी प्रस्ताव का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हो जाने से तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता, जब तक उस पर कार्रवाई न हो।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि संवैधानिक विकेंद्रीकरण लागू होने के तीन दशक बाद भी ग्राम सभाओं के संचालन के लिए आवश्यक भौतिक आधारभूत सुविधाओं की औसत उपलब्धता केवल 61.9 प्रतिशत है जबकि डिजिटल तैयारी का स्तर 48.2 प्रतिशत है। यदि ग्राम सभा को भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद माना जाता है, तो उसके लिए बुनियादी सुविधाओं की यह स्थिति गंभीर प्रश्न खड़े करती है। अनेक ग्राम सभाएं आज भी सीमित सुविधाओं वाले स्थानों पर आयोजित होती हैं और राज्यों के बीच संस्थागत क्षमता में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है।
रिपोर्ट का अंतिम निष्कर्ष सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें कहा गया है कि ग्राम सभा का भविष्य केवल बैठकें आयोजित करने में नहीं, बल्कि ऐसी संस्थाएं विकसित करने में है जहां प्रत्येक नागरिक स्वयं को सुना हुआ महसूस करे, प्रत्येक निर्णय पर प्रभावी कार्रवाई हो और प्रत्येक बैठक लोगों का विश्वास मजबूत करे।
यदि पंचायती राज सुधारों के तीन दशक बाद भी सार्वजनिक विश्वास को मजबूत करने की आवश्यकता महसूस हो रही है, तो चुनौती अब संस्थागत ढांचे की नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। (संवाद)



