विश्वसनीय मित्र

जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची भारत के तीन दिवसीय दौरे पर हैं। जापान एक ऐसा देश है, जो बहुसंख्यक भारतीयों के मन में बसा हुआ है। गत लम्बे समय में अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर हम तीन देशों जिनमें रूस, जापान और फ्रांस शामिल हैं, को भारत के विश्वसनीय मित्र मानते आ रहे हैं, जिन्होंने हमारे देश के स्वतंत्र होने के बाद न सिर्फ इसकी प्रत्येक पक्ष से सहायता की है, अपितु प्रत्येक कठिन समय में भारत के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े भी रहे हैं। यहीं बस नहीं, आर्थिकता के अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग के अतिरिक्त देश के मूलभूत निर्माण के पक्ष से ही नहीं,अपितु इन तीनों ने ही समय-समय पर भारत की सहायता के लिए हाथ आगे बढ़ाया है। यदि आज भारत विश्व की एक बड़ी आर्थिकता बनने की ओर आगे बढ़ रहा है तो इसमें भी इन तीनों देशों के प्रत्येक पक्ष के सहयोग को किसी भी स्थिति में दृष्टिविगत नहीं किया जा सकता।
आज जापान की प्रधानमंत्री तकाइची ने भारत के लिए अच्छी भावनाओं का इज़हार किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनको दिल से सम्मान दिया है, परन्तु इससे पहले जापान के प्रधानमंत्रियों शिंज़ो आबे, योशिहिदे सुगा, फुमियो किशिदा और शिगेरू इशिबा की भी भारतीय नेताओं के साथ बड़ी निकटता और मित्रता रही है। सनाए तकाइची की यह यात्रा उसी क्रम का ही अहम हिस्सा है। जापान पूर्वी एशिया में एक द्वीपों का समूह है, जो प्रशांत क्षेत्र में स्थित है। यहां के समुद्री क्षेत्र पर चीन अपनी विस्तारवादी नीतियां जारी रख रहा है, जिस कारण यहां के दर्जनों ही पड़ोसी देश परेशानी में विचरण कर रहे हैं। जापान भी इन देशों में से एक है। चाहे ज़मीनी क्षेत्र के पक्ष से जापान बहुत बड़ा देश नहीं है परन्तु दूसरे बड़े विश्व युद्ध के बाद इसने तकनीकी क्षेत्र में जो विकास किया है, वह बेहद आश्चर्यजनक है। इसलिए यह विश्व के कुछ बड़ी आर्थिकता वाले देशों की पंक्ति में खड़ा दिखाई देता है। चाहे वर्ष 1981 में भारत में जापानी कम्पनी सुज़ुकी द्वारा मारुति-सुज़ुकी इंडिया नाम के तहत मारुति कारों का उत्पादन शुरू हुआ था, जो भारत ऑटोमोबाइल क्षेत्र में एक अहम मील पत्थर माना जाता है और कारों के क्षेत्र में आज भी मारुति-सुज़ुकी कम्पनी का नाम भारत में पहले स्थान पर आता है। चाहे भारतीयों की ज़ुबान पर जापान का नाम अधिकतर उस समय आया, परन्तु उससे पहले भी जापान ने भारत की तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाए रखा था।
दूसरे बड़े विश्व युद्ध के समय भारत में ब्रिटिश शासन स्थापित था और जापान उसके विरोधियों की पंक्ति में खड़ा था परन्तु आज़ाद हिंद फौज़ की शुरुआत जापान की धरती से ही हुई थी और उसके उपरांत भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस ने इसका नेतृत्व सम्भाल कर सिंगापुर की धरती से भारत में सरकार के विरुद्ध अपना संघर्ष शुरू किया था। देश स्वतंत्र होने के बाद सोवियत यूनियन की भांति जापान की भारत के साथ मित्रता की एक अमिट छाप बनी रही है और जापान हमेशा ही भारत का रणनीतिक सहयोगी बना रहा है। भारत और जापान के बीच प्रत्येक तरह की वस्तुओं के आपसी आदान-प्रदान को और मज़बूत करने के लिए वार्षिक शिखर सम्मेलन होता रहा है। सनाए तकाइची 16वें भारत-जापान शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आई हैं। आज दोनों देशों को प्रशांत क्षेत्र में एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। दोनों ही देश एक स्वतंत्र, खुशहाल और नियम आधारित प्रशांत क्षेत्र को साझी प्राथमिकता के आधार पर देख रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगस्त 2025 में जापान यात्रा पर गए थे और वहां उन्होंने 10 वर्ष के लिए आपसी साझे सहयोग के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे। प्रधानमंत्री की यात्रा इस सहयोग में बड़े साझे कदम उठाने में सहायक हुई है। इस समय दोनों देशों में दवाइयों, टैक्नोलॉजी और साफ्टवेयर आदि के क्षेत्र में अनेक ही समझौते हुए हैं, जिनमें अलग-अलग तरह के उद्योगों के क्षेत्र भी शामिल हैं। जापान ने 10 खरब जापानी येन (लगभग 6 लाख करोड़ रुपये) से अधिक का भारत में निवेश करने की घोषणा की है।
भारत की धरती से जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची ने स्पष्ट और दृढ़ घोषणा की है कि भारत-जापान एशिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक शक्तियां हैं और दोनों मिलकर कानून का सम्मान बनाए रखेंगी और किसी की, किसी भी तरह की धमकी, दबाव या ताकत के दम पर हालात बदलने के किए गए यत्नों का मिलकर विरोध करेंगी। इन सभी पक्षों के दृष्टिगत जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची की इस तीन दिवसीय यात्रा को ऐतिहासिक कहा जा सकता है और यह दोनों देशों के संबंधों की कड़ी को और भी मज़बूत करने में सहायक होगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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