अब नई पीढ़ी रिश्तों का महत्त्व नहीं समझती

आज़ादी से पहले और बाद में रिश्ते ‘कर्त्तव्य’ की भावना से बनाए जाते थे, लेकिन आज वे ‘समझौते’ की शर्तों पर बनते हैं और परिवार ‘सुरक्षा चक्र’ से ‘सर्विस प्रोवाइडर’ बन गए। 75 साल में ‘चूल्हा टूटा तो घर टूटा’, बंटवारा हो गया और पैसा दूरी तय करने लगा। ‘हक मिला, फज़र् गया’,  तलाक कानूनी बन गया है, बेटी को बराबर हक पर बाप-बेटी में प्रॉपर्टी केस बढ़े, वसीयत में पुत्र को सब कुछ, पुत्री पराये घर की कह कर वंचित। घरेलू हिंसा में कानून ने सुरक्षा दी, लेकिन अदालत में साबित करना लगभग नामुमकिन। शहरी जोड़े ‘फोन की वजह से झगड़ा’ करते हैं और इंस्टा/स्नैपचैट पर ब्रेक अप कर लेते हैं। लोग समाज से कट रहे हैं, पड़ोसी पराए की तरह हो गए हैं।
दो तिहाई बुजुर्ग अकेले रहते हैं। ‘ओल्ड एज होम’ को इंडस्ट्री बना दिया। भारत में 20-35 साल के 39 प्रतिशत युवा ‘लम्बे समय के लिए अकेले’ हैं। बाप कहता है ‘हमने 7 फेरे लिए थे, 7 जन्म निभाए।’ बेटा कहता है ‘7 रेड फ्लैग मिले, 7 दिन में छोड़ दिया।’ अनुमान है कि अगले 30 साल में आबादी घटेगी। ‘रिश्ते कम, लोग कम होंगे।’ समाज ‘पुनर्गठित’ हो रहा है। खून का रिश्ता कमजोर, पसंद का रिश्ता मजबूत हो रहा है। परिणाम : पारम्परिक रिश्ते से आज़ादी और संकट में कोई साथ नहीं देने वाला, माता-पिता की अंतिम यात्रा में कंधा देने के लिए वक्त ही नहीं। दादा के ज़माने में छत एक थी, चाहे चूल्हे चार थे, परन्तु दिल एक था। 
आज कमरा एक है, फोन चार हैं, परन्तु दिल अपना-अपना है।’ रिश्ता बनाना भूल गए। ज़ैन ज़ी को देष न दें, क्योंकि हमने ही उन्हें ‘पैसा कमाओ, प्रसिद्धि पाओ’ सिखाया है। आधुनिकता के नाम पर ‘मां-बाप को ओल्ड एज होम’ और ‘बीवी को आदालत’—ये तरक्की नहीं, तन्हाई का लाइसेंस है। 
शुगर डैडी सिंड्रोम या संगठित शोषण
आजकल महानगरों में एक नया दौर शुरू हो गया है। युवा लड़के-लड़कियां नौकरी या व्यवसाय की तलाश करते हैं। अपने घर से कह कर आए थे कि करियर बनाने जा रहे हैं, लेकिन वो हुआ नहीं और वापिस नहीं जा सकते। ये लोग ऐसे रिटायर्ड, अकेले, एनआरआई अथवा तलाकशुदा या हाई-प्रोफाइल प्रोफेशनल लोगों को ढूंढते हैं जिन्हें ये पापा या डैडी बुला सकें और भावना के नाम पर उनके नाम, पैसे और पहुंच का इस्तेमाल कर अपना मकसद पूरा करने के बाद उन्हें ब्लैकमेल करते हैं। यह बीमारी सभी महानगरों और बड़े शहरों में बढ़ रही है। 2020-2026 के बीच मुम्बई पुलिस के डेटा में रूझान देखा गया—‘हनीट्रैप+भावनात्मक धोखाधड़ी+ज़बरदस्ती’। कोई युवा लड़की/महिला की 45-70 साल के पुरुष से दोस्ती करके ‘अंकल आप पापा जैसे हो’ कह कर फिर निजी चैट/वीडियो/गिफ्ट का रिकॉर्ड और बाद में ‘पत्नी को बता दूंगी, सोशल मीडिया पर डाल दूंगी’ कहकर वसूली की जाती। चाहे शुरु में मां बीमार, भाई की फीस, मकान मालिक निकाल रहा ह, कह कर फिर वसूली की जाती है। फिर ब्लैकमेलिंग शुरू हो जाती है। 
अधिकतर पीड़ित ‘मी-टू’ जैसे पाखंड में फंसकर एफआईआर दर्ज नहीं करवाते  कि इज़्ज़त खत्म हो जाएगी। इस खेल में अकेला लड़का या लड़की नहीं होते, पर्दे के पीछे कोई ब्वायफ्रैंड/भाई भी होता है, जो बातचीत करता है। एक पूरा गिरोह—एक लड़की, दो लड़के तथा एक नकली वकील जिसे ‘बुलबुल रैकेट’ कहा जाता है। दुष्कर्म के केस से डरे व्यक्ति 20 लाख रुपये देकर समझौता क लेते हैं। सोशल मीडिया में इसे ‘शुगर डैडी कल्चर’ कहा जाता है, अपराध नहीं। 
भविष्य के संकेत 
लड़के या लड़की को दोष देकर बात खत्म नहीं होगी। सवाल यह कि 60-70 साल का आदमी 20 साल की बेटी या बेटा क्यों पाल रहा है? यह रिश्ता ‘जरूरत’ से शुरू हो, ‘वसूली’ पर खत्म होता है। नए कानून में 7 साल तक सज़ा का प्रावधान है, परन्तु ब्लैकमेल साबित करना बहुत मुश्किल क्योंकि महिला होने का फायदा मिलता है। ‘जब्री वसूली विरोधी हेल्पलाइन : 103 पर ‘सीनियर सिटीजन ब्लैकमेल’ अलग कैटेगरी है। होना यह चाहिए कि पीड़ित का नाम गुप्त रख तक तुरंत एफ आई आर दर्ज करके और फास्ट ट्रैक कोर्ट 6 महीने में ट्रायल हो जाना चाहिए।  बुजुर्गों को ध्यान रखना होगा कि हर जवान-बूढ़ी दोस्ती धोखाधड़ी नहीं पर ‘पापा बोलकर पेमेंट मांगने’ वाली दोस्ती नहीं। 
1947 में रिश्ता परिवार का दायरा बढ़ाता था, 2026 में मन की मज़र्ी है। 2047 तक 30 करोड़ बुजुर्ग होंगे, 15 करोड़ अकेले। वह कैसा भारत होगा? विकसित देशों और भारत में भी शादी टिकती ज्यादा है क्योंकि तोड़ना महंगा है। लिव-इन टूटता ज्यादा है क्योंकि निकास सस्ता होता है। सवाल लंबी उम्र का नहीं, खुश रहने का है। दोनों मॉडल में औरत फंसती है, बुजुर्ग को कुचला जा रहा है। पुलिस कहती है ‘सबूत लाओ’, ब्लैकमेलर इज़्ज़त खराब करने की धमकी देता है। यदि कानून सख्ती से लागू हो तो ठग ऐसा नहीं कर सकेंगे।

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