समाज के लिए बड़ा खतरा हैं एआई निर्मित फर्जी समाचार

एक समय था जब अफवाहें गांव की चौपाल या शहर की गलियों तक सीमित रहती थीं। उनका प्रभाव व्यापक नहीं होता था। लेकिन सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को सूचना का प्रसारक बना दिया है। आज कोई भी बिना किसी सत्यापन के फोटो, वीडियो या संदेश लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ऐसे में फज़र्ी समाचार (फेक न्यूज़) अब केवल अफवाह नहीं रही। यह अक्सर सुनियोजित अभियान का हिस्सा होती है। राजनीतिक लाभ, धार्मिक ध्रुवीकरण, आर्थिक फायदा, किसी संस्था की छवि खराब करना, अधिक लाइक प्राप्त करना और विज्ञापन हासिल करना, इनमें से कोई भी मकसद इसके पीछे हो सकता है। चिंताजनक बात यह है कि लोग अक्सर उसी सूचना पर जल्दी विश्वास करते हैं जो उनकी पहले से बनी सोच की पुष्टि करती हो। मनोविज्ञान इसे पुष्टि पूर्वाग्रह (कन्फर्मेशन बायस) कहता है। यही वजह है कि झूठ, यदि वह लोगों की पसंद के अनुरूप हो, तो कई बार सच से भी तेज दौड़ता है।
फेक न्यूज़ में तो फिर भी शब्दों के ज़रिए पहुंचा जा सकता था। लेकिन डीपफेक ने तस्वीर ही बदल दी है। अब एआई किसी भी व्यक्ति की आवाज़, चेहरे के हावभाव और बोलने की शैली की हूबहू नकल कर सकता है। कुछ मिनट के वीडियो और ऑडियो के आधार पर ऐसा सामग्री (कंटेंट) तैयार की जा सकती है जिसे देखकर विशेषज्ञ भी पहली नज़र में धोखा खा जाएं। उदाहरण को तौर पर चुनाव से ठीक एक दिन पहले किसी बड़े नेता का वीडियो वायरल होता है जिसमें वह किसी समुदाय के खिलाफ  विवादित बयान देता दिखता है। बाद में पता चलता है कि वीडियो नकली था, लेकिन तब तक लाखों लोग उसे देख चुके होते हैं। वोट पड़ चुके होते हैं। नुकसान हो चुका होता है। इसी कारण डीपफेक को सबसे बड़ा खतरा माना जाता है। दुनिया के कई देशों में चुनावों के दौरान फर्जी वीडियो, नकली ऑडियो और भ्रामक पोस्ट का इस्तेमाल देखा गया है। कभी नेताओं के बयान बदले गए, कभी विरोधियों को बदनाम करने के लिए नकली दृश्य बनाए गए और कभी मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए झूठी सूचनाएं फैलाई गईं।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां करोड़ों मतदाता सोशल मीडिया से सूचना प्राप्त करते हैं। ऐसे में यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म झूठ का माध्यम बन जाएं तो चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है। ऐसे में चुनाव आयोग, राजनीतिक दल, मीडिया और तकनीकी कंपनियों की ज़िम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ गई है। डीपफेक का सबसे बड़ा नुकसान यही है कि यह केवल झूठ नहीं फैलाता बल्कि सच को लेकर भी संदेह पैदा कर देता है। भविष्य में ऐसा समय भी आ सकता है जब कोई वास्तविक वीडियो सामने आए और लोग कह दे  कि यह भी शायद डीपफेक होगा। मुख्यधारा का मीडिया भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। पहले समाचार संस्थानों के पास खबर की पुष्टि के लिए पर्याप्त समय होता था। अब सोशल मीडिया पर खबर पहले वायरल होती है और बाद में उसकी जांच होती है। यदि मीडिया भी बिना सत्यापन के वायरल सामग्री प्रकाशित करने लगे तो उसकी विश्वसनीयता कमजोर होगी। 
सोशल मीडिया कंपनियां लंबे समय तक खुद को केवल प्लेटफॉर्म बताकर ज़िम्मेदारी से बचती रहीं, लेकिन अब यह तर्क कमज़ोर पड़ रहा है। यदि एल्गोरिद्म यह तय करते हैं कि कौन-सी पोस्ट लाखों लोगों तक पहुंचेगी, तो उनकी सामाजिक ज़िम्मेदारी भी तय होगी। कई कंपनियां एआई आधारित पहचान प्रणाली विकसित कर रही हैं जो डीपफेक वीडियो पकड़ सके। कुछ प्लेटफॉर्म संदिग्ध सामग्री पर चेतावनी भी लगाने लगे हैं। लेकिन चुनौती यह है कि जितनी तेज़ी से पहचान करने वाली तकनीक विकसित होती है, उससे कहीं तेज़ गति से नकली सामग्री बनाने वाली तकनीक भी आगे बढ़ रही है।
भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन सामग्री को लेकर विभिन्न कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। भविष्य में डीपफेक से निपटने के लिए और स्पष्ट नियम भी बन सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल कानून इस समस्या का समाधान कर देगा? शायद नहीं। दरअसल, हर झूठी पोस्ट पर मुकद्दमा दर्ज करना संभव नहीं है। हर वायरल वीडियो को अदालत तक ले जाना भी व्यावहारिक नहीं है। कानून ज़रूरी है, लेकिन उससे पहले आवश्यक है डिजिटल ज़िम्मेदारी। यहीं सबसे कठिन सवाल खड़ा होता है। यदि सरकार फेक न्यूज़ रोकने के नाम पर सख्ती करे तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। यदि बिल्कुल सख्ती न हो तो झूठ और नफरत बिना रोक-टोक फैल सकती है। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक हैं। (युवराज)

#समाज के लिए बड़ा खतरा हैं एआई निर्मित फर्जी समाचार