किसानों की आय का स्थायी ज़रिया है बहेड़ा का पेड़

भारत में खेती आज मौसम की अनिश्चितता, बढ़ती लागत और बाजार के उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे दौर में किसान ऐसी फसलों और पेड़ों की तलाश में हैं, जो कम देखभाल और लागत के लंबे समय तक नियमित आय दे सकें। बहेड़ा का पेड़ इस तलाश का सही जवाब है। आयुर्वेद के विश्व प्रसिद्ध त्रिफला फार्मूले का प्रमुख घटक होने के कारण इसकी मांग देश के हर्बल और औषधीय उद्योग में लगातार बनी रहती है। कम पानी, रख-रखाव की कम ज़रूरत और दशकों तक नियमित फलते रहने की अपनी क्षमता के कारण बहेड़ा का पेड़ न केवल किसानों की अतिरिक्त आमदनी का एक स्थायी स्रोत बन सकता है बल्कि कृषि वानकी के माध्यम से यह कमाई का भी एक महत्वपूर्ण जरिया साबित हो सकता है। इसलिए बहेड़ा को महज औषधीय वृक्ष नहीं मानते बल्कि ग्रामीण समृद्धि और किसानों की आर्थिक सुरक्षा का इसे महत्वपूर्ण जवाब माना जाता है।
बहेड़ा एक विशाल पर्णपाती और औषधीय वृक्ष है। यह कॉम्ब्रेटेसी परिवार का सदस्य है और भारत के ज्यादातर भू-भाग में प्राकृतिक रूप से खुद ही उग आने वाला वृक्ष है। इसकी ऊंचाई 20 से 40 मीटर तक हो सकती है और इसका जीवनकाल 50 साल से लेकर 90 साल तक का आसानी से होता है। बहेड़ा एक औषधीय पेड़ है। यही कारण है कि आयुर्वेद में इसका विशेष महत्व है। दरअसल ये आयुर्वेद के सबसे मशहूर त्रिफला का एक महत्वपूर्ण घटक है। त्रिफला में बहेड़ा के अलावा हरड़ और आंवला होता है। चूंकि त्रिफला की आयुर्वेदिक उपचार पद्धति में बहुत मांग रहती है। इसलिए बहेड़ा के फल की आयुर्वेदिक उद्योग में लगातार मांग बनी रहती है। जहां तक इसके पाये जाने का सवाल है तो यह प्राकृतिक रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओड़िसा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु और राजस्थान के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। आमतौर पर यह प्राकृतिक रूप से उग आता है, लेकिन इसकी व्यापक मांग के कारण अब बकायदा इसकी व्यावसायिक वानकी होने लगी है। 
बहेड़ा की सबसे बड़ी खासियत इसके अनुकूलन क्षमता है। यह ऊष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में बहुत अच्छे तरीके से फलता-फूलता है। यह 20 से लेकर 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में सहज रहने वाला पेड़ है। इसके लिए औसतन 700 से 2000 मिली लीटर बारिश की ज़रूरत होती है। जहां तक मिट्टी का सवाल है तो यह दोमट, लाल हल्की पथरीली तथा समुचित जल निकास वाली जमीन में बहुत आसानी से लगता है। चूंकि यह पेड़ अपेक्षाकृत सूखा सहन कर सकता है, इसलिए इसे कम उपजाऊ जमीन में भी लगाकर कमाई की जा सकती है। जहां बहेड़ा की खेती का सवाल है तो इसे इसके बीज द्वारा उगाया जाता है और अगर पौधारोपण करना हो तो मानसून का समय सबसे उपयुक्त होता है। 
चूंकि बहेड़ा के कई औषधीय इस्तेमाल हैं, इसलिए आयुर्वेद, यूनानी और हर्बल चिकित्सा में बहेड़ा की हमेशा मांग बनी रहती है। इसलिए बहेड़ा किसानाें के लिए अतिरिक्त, नियमित और ठोस आय का आसानी से जरिया बन सकता है। क्योंकि ये कम लागत वाला पेड़ है, दशकों तक इससे कमाई की जा सकती है और इसके फलों की आयुर्वेदिक उद्योग में लगातार मांग बनी रहती है। देश की कई बड़ी आयुर्वेदिक कंपनियां जैसे पतंजलि आयुर्वेद, डाबर और वैद्यनाथ आदि काफी बड़ी तादाद में बहेड़ा का इस्तेमाल करती हैं। इसलिए ये कंपनियां किसानों को एडवांस में खरीदारी के पैसे देकर उनसे बहेड़े के पेड़ को लगाने और व्यावसायिक लाभ लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। बहेड़ा का पेड़ 5 से 6 साल के भीतर फल देना शुरु कर देता है और 10 से 12 साल की उम्र में वह पूरी तरह से परिपक्व हो जाता है तथा नियमित रूप से अच्छी पैदावार देने लगता है। क्योंकि बहेड़ा का एक पेड़ औसतन 50 से 80 किलो फल देता है। ऐसे में यदि एक किसान 100 बहेड़ा के पेड़ लगा ले तो वह हर साल औसतन 4 से 6.5 लाख रुपये तक आसानी से कमा सकता है। यदि किसान इसका प्रसंस्करण और ब्रीडिंग भी शुरु कर दे, तो उसकी आय कई गुना ज्यादा हो सकती है। वैल्यू एडिशन किये जाने पर बहेड़ा का पेड़ न केवल आर्थिक रूप से मददगार बल्कि शानदार कमाई का जरिया बन सकता है। 
याद रखें बहेड़ा का सूखा फल हरे फल से कहीं ज्यादा महंगा बिकता है और इसकी मांग भी काफी ज्यादा होती है। इसलिए किसान बहेड़ा के फलों को सुखाकर अच्छी खासी कमाई कर सकता है। हर्बल पाउडर, त्रिफला उत्पादन आदि के लिए बहेड़ा बहुत महत्वपूर्ण है। बहेड़ा को कई किसान अपनी खेत की मेड़ों पर, बंजर भूमि में और एग्रो फॉरेस्ट्री मॉडल के आधार पर लगा सकता है। बहेड़ा के साथ हल्दी, अदरक, दलहन और चारा फसलें भी प्राप्त की जा सकती हैं। इसलिए बहेड़ा अपने आपमें ही नहीं अपनी प्रकृति के कारण भी काफी लाभदायक है। ..और हां, अगर इस तरह की आर्थिक ज़रूरत न भी हो तो भी बहेड़ा का पेड़ किसानों का मित्र है, क्योंकि यह मिट्टी के संरक्षण को बढ़ाता है। इससे जैव विविधता बढ़ती है। यह कार्बन अवशेष करता है। इसलिए यह किसानों के लिए दीर्घकालिक समृद्धि का नियमित स्रोत बन सकता है।  -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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