कच्च्े, पके, मीठे फल और शाखा से टपके भंगू
वर्तमान कच्चे तथा पके हुए फल देख कर आड़ू, आलुबुखारा, जामुन, सेब तथा आम की बरकत याद करने को मन कर आया। खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है, जैसे मुहावरे भी। हरे, काले, पीले या नीले हों, इस ओर ध्यान ही नहीं जाता। ‘गोरे रंग नूं झरीटां पाइयां, बेरियां दे बेर खाणिये,’ तो बहुत दूर की बात है। मौसम बदल रहा है और मौसम द्वारा अपना रंग दिखाना भी जारी है। ऊपर वाले की कंजूसी या मेहरबल सहित जिसे हरबंस गिल ऐसे पेश करती हैं :
रब्ब भरोसे दुनिया वसदी
खिड़ीयां ने गुलज़ारां
अम्बर धरती सभ ने उहदे
जिस विच्च रंग हज़ारां
कुदरत दा वी मालक रब्ब है
सभ दा आप रचेता
मौसम रुत्तां हुनर ने उसदे
की दरिया की रेता
ओ बंदिया तूं बंदा बन जा
छड्ड के चौर चढ़ावे
किस कम्म तैनूं रब्ब ने घल्लिया
समझ ना तैनूं आवे
दो अक्खरां तों रब्ब है बनदा
बब्बे पहलों रारा
पढ़न-लिखन विच्च छोटा लग्गे
पर भारे तों भारा
रब्ब बारे मैं पुछिया जिस तों
जो आई सो कहि गिया
पंडत, मुल्ला, भाई, आपनी
पोथी लै के बहि गिया
रब्ब नूं यार बना लै बंदिया
कर ना रोज़ बुराइयां
उसदा लड़ तूं फड़ लै बीबा
छड्ड के सब चतुराइयां
गिल्ल होवे जद रहमत उसदी
हो जावे रज्ज दिल दा
उस तों विछड़ियां हर बंदा
उसनूं है जा मिलदा
मैं पके हुए फलों की बात कर रहा था तो मीडिया में एक स्वर्ण सिंह भंगू का ज़िक्र आ गया जिसने मुझे उससे बीस वर्ष बड़ा स्वर्ण सिंह भंगू याद करवा दिया है। वह मेरे सगे मामा थे और मुझ से 15-18 दिन बड़े। यह बात अलग है कि वह लेखक नहीं थे, परन्तु किसी और की लिखित कविता को मंच पर इस तरह पेश करते थे कि लिखने वाला खड़ा होकर प्रशंसा करने के लिए मजबूर हो जाता था।
एक और अंतर यह भी था कि मेरे मामा के पूर्वज बाबा मेहताब सिंह भंगू ने भाई सुक्खा सिंह को साथ लेकर मस्सा रंगड़ की हत्या की थी। कारण यह कि मस्सा रंगड़ श्री हरिमंदिर साहिब में नाच देखते हुए हुक्का भी पीता था। आज दोनों स्वर्ण सिंह भंगू स्वर्गवास हो चुके हैं। उनमें से बड़े का परिवार जर्मनी के शहर हैमबर्ग में रहता है, जहां उनके तीन बेटों के शरीक-ए-हयात रहते हैं। वह उस शहर में मीरांकोटिये के रूप में जाने जाते हैं। मैं उनके पास जाता रहता हूं और उनमें से मौंटू भंगू की पत्नी सुखचैन कौर उर्फ सुक्खी दो सप्ताह पहले मेरे चंडीगढ़ वाले घर मिल कर गई हैं। इसलिए भी कि उनके चंडीगढ़ वाले घर की चाबियां मेरे पास होती हैं। छोटा भंगू भुच्चो मंडी के निकट अपना घर छोड़ कर चमकौर साहिब चला गया जिसके के पास चैरिटेबल शैक्षणिक संस्था का वह संस्थापक था। लिखने वाले लिखते और अपने परिवार को पूरी तरह स्वीकार्य हैं कि वह बेहद मेल-मिलाप रखने वाला था और दुख-सुख को एक समझने वाला। मिज़र्ा गालिब के अनुसार ‘नगमा-ए-़गम को भी ऐ दिल गनीमत जानिये बे-सदा हो जाएगा ये साज़-ए-हस्ती एक दिन जाते-जाते।’ यह भी बता दूं कि मैं तथा स्वर्ण खन्ना मंडी के आर्य स्कूल में पढ़े हैं और कागज़ों में दोनों की जन्म-तिति एक ही है—27 फरवरी, 1951। असल तिथि इससे 11-12 महीने ज़्यादा थी। असल जन्म तिथि बारे बताने वाले मेरे पिता थे। चाहे हम दोनों मेरे ननिहाल गांव में जन्मे थे, परन्तु मैं अपनी माता का पहला बच्चा था और स्वर्ण मेरी नानी का अंतिम बच्चा। और पूछते हैं तो मेरे सगे मामा, परन्तु नकली जन्म दिन वाले दिन चार वर्ष पहले खाते-पीते चले गए थे। बड़े भंगू की तस्वीर मेरे पास ऐसे स्थान पर रखी गई है, जो इस समय मिल नहीं रही। दोनों भंगू ज़िन्दाबाद।
अंतिका
—सियाणपां (क)—
ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है
मुर्दादिल किया खाक जिया करते हैं।

