पहाड़ी किसानों की आय बढ़ाने में मददगार है चिलगोजा का पेड़

चिलगोजा यानी पाइन नट भारत के सबसे मूल्यवान पेड़ों में से एक है। हालांकि यह सिर्फ हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए ही आर्थिक रूप से दीर्घकालिक आय का स्रोत है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसका उत्पादन भले कम होता हो, लेकिन इसका बाज़ार मूल्य चूंकि बहुत अधिक है। इसलिए अगर सही तरीके से इसका संरक्षण किया जाए, तो हिमालयी किसानों के लिए यह आर्थिक समृद्धि का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैज्ञानिक ढंग से इसकी अलग-अलग मौसमों के लिए किस्में तैयार की जाएं, तो भविष्य में इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और इससे अन्य क्षेत्रों के किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। बहरहाल यह एक सदाबहारी शंकुधारी पेड़ है। इसकी ऊंचाई 15 से 25 मीटर तक होती है और यह आसानी से 100 साल या उससे ज्यादा दिनों तक जिंदा रहता है। 
वैसे पाइन नट कोई एक पेड़ नहीं होता, इसकी कई प्रजातियां होती हैं यानी यह कई किस्म के चीड़ के पेड़ों का समूह है और इन चीड़ के कई तरह के पेड़ों में जो सबसे कीमती पेड़ है, वह चिलगोजा का पेड़ है। क्योंकि इसके बीज बहुत कीमती होते हैं। चिलगोजा के पेड़ मूलत: हिमाचल के किन्नौर ज़िले में खूब पाये जाते हैं। इसी तरह जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र में भी ये खूब मिलते हैं। किन्नौर ही भारत में चिलगोजा के उत्पादन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। आमतौर पर यह पहाड़ी पेड़ 1800 से 3300 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। इसके लिए ठंडी और शुष्क पर्वतीय जलवायु उपयुक्त होती है। पथरीली और ढालदार भूमि तथा कम वर्षा चिलगोजा के पेड़ के लिए बेहद उपयुक्त है। हालांकि अभी तक यह मैदानी भागों में नहीं पाया जाता, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इसकी मैदानी भागों के अनुकूल किस्में विकसित कर ली जाएं, तो बहुत आसानी से इसे उगाया जा सकता है। क्योंकि चिलगोजा के बीज या चिलगोजा की गिरी 4000 से 8000 रुपये प्रति किलो तक बिकती है। यह दुनिया का सबसे महंगा सूखा मेवा होता है। इसलिए जाहिर है पहाड़ी क्षेत्र में किसी किसान के पास अगर पांच चिलगोजा के पेड़ हों और उनसे वह कम से कम 10 किलो प्रति पेड़ भी सालाना चिलगोजा हासिल कर लेता है, तो मालामाल हो सकता है।
जहां तक इसकी इतनी ज्यादा कीमत होने का सवाल है तो उसका कारण यही है कि उसका उत्पादन बहुत कम है। जबकि इसकी मांग बहुत ज्यादा है, देश-विदेश हर जगह। क्याेंकि चीड़ के पेड़ तो दुनिया में बहुत जगह पाये जाते हैं, पर चिलगोजा वाली किस्म का चीड़ का पेड़ आमतौर पर भारत में ही मिलता है। हालांकि कुछ देशों में कुछ अलग प्रजातियों के चिलगोजा के पेड़ भी पाये जाते हैं। किसानों को इससे लाभ, ड्राइ फ्रूट की बिक्री से होता है और सबसे ज्यादा इसकी मांग मध्यपूर्व तथा यूरोप के देशों में है। हेल्थ स्नैक और प्रीमियम गिफ्ट पैक के रूप में इसे प्रसंस्कृत करके भारी कीमत वसूली जाती है। इसकी खेती बड़ी चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि इसके पेड़ को परिपक्व होने में कई वर्ष लग जाते हैं। इसलिए यह तुरंत-फुरत में लाभ देने वाला पेड़ नहीं है। इसका पेड़ तैयार भी हो जाए तो उसके शंकु बनने और परिपक्व होने में समय लगता है और सबसे बड़ी बात यह है कि प्राकृतिक रूप से चिलगोजा पाने के लिए हिमालयी जलवायु भी चाहिए। 
भारत में इसकी खेती बढ़ायी जा सकती है। हां, इसका रूप और स्वाद थोड़ा बदल सकता है, पर मूल गुण ज्यादा नहीं बदलेगा। वैज्ञानिकों ने इस पर कई प्रयोग करके देखे हैं कि इसे हिमालयी क्षेत्र के मैदानी भागों में उगाया जा सकता है और इससे किसानों को लाभ मिल सकता है। मगर फिलहाल यह हिमाचल, कश्मीर और लद्दाख के जिन क्षेत्रों में पाया जाता है, वहां के किसानों के लिए उपयोगी हैं। वो अगर सजगता से इस पर निवेश करें तो कई पीढ़ियों तक इसका लाभ मिल सकता है। हां, यह ऐसा आर्थिक पेड़ नहीं है कि लगाने के कुछ ही सालों बाद किसानों को इसका आर्थिक लाभ मिलना शुरु हो जाए। क्योंकि यह एक दुर्लभ ड्राई फ्रूट है, इसलिए इसकी पैदावार भी कम और मुश्किल से होती है और शायद इसलिए इसकी कीमत भी बहुत ज्यादा है। अगर जिन क्षेत्रों में यह पाया जाता है या इसकी जलवायु के आसपास के जो दूसरे क्षेत्र है, वहां भी इसे कोशिश करके पैदा कर लिया जाए तो इसके लाभ लिए जा सकते हैं।
लेकिन ऐसा सिर्फ किसानों के कारण नहीं हो सकता, चिलगोजा या पाइन नट का पेड़ किसानों के लिए मित्र तभी साबित हो सकता है, जब भारत सरकार इस पर कोई बड़ी योजना लेकर आए और उस योजना में कम से कम 20 साल का एक वृहद प्रोग्राम बनाकर काम किया जाए। मगर जब तक यह संभव नहीं है, तब तक यह जहां है और जिस तरह की प्रजाति का है, उसके तो लाभ लिए ही जा सकते हैं।  -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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