फुरसतिया की लुगाई का कपड़ा
बड़ी विकट स्थिति में सुबह उठते ही फुरसतिया ने स्वयं को पाया था। उसकी औरत गर्मागर्म चाय की प्याली लिए सिरहाने खड़ी थी और प्यार से उसके केश-विहीन सिर पर उंगलियां घुमा रही थी। शायद तबला बजाने की मंशा रही होगी... खैर, हर इच्छा कब पूरी होती है!
‘इस दीवाली नया कपड़ा चाहिए।’
‘क्यों, लक्ष्मी मैया ने सपना दिया कि नया कपड़ा ही पहनना है... नहीं तो रूठ जाऊँगी?’
फुरसतिया ने खंदक की लड़ाई शुरू करते हुए कहा, ‘वैसे भी हाथ तंग चल रहा है, उस पर ससुरी महँगाई... इस बार तो पुराने से ही काम चला लो। अगले साल पक्का नया ला दूँगा।’
मेहरू की भृकुटि तन गई। ‘देखो, कहे देते हैं... सरकार की बुराई बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे। कैसे फटाफट हमारे खातों में पैसा आता है और फिर सेवक जी कहे रहे हैं कि हमारी जीडीपी आसमान को छू रही है। मगर फूफा को तो फू...फा ही करना है, सो करते रहें। किसी दिन दिन-दहाड़े उठा लिए जाओगे... हम नहीं किसी से कुछ कहने वाले’ फिर मरता क्या न करता! कोई और ऑप्शन न देखते हुए फुरसतिया विज्ञापनों के चक्रव्यूह में घुस गये।
तरह-तरह के ऑफर! कहीं पचास प्रतिशत डिस्काउंट, कहीं एक्सचेंज ऑफर-पुराना लाओ, नया ले जाओ। अच्छा हुआ कि पतियों का एक्सचेंज ऑफर अभी तक नहीं आया... नहीं तो औरतों की निकल पड़ती!
दिमाग के घोड़े मारे डर के दौड़ नहीं रहे थे। ऑप्शन तो बहुत थे, मगर वह दुविधा में पड़े मतदाता की तरह था-किसे चुनूँ? नए के नाम पर पुराना माल न मिल जाए फिर से!
पर निर्णय तो लेना ही था। सो, लुगाई का पुराना कपड़ा लिया और कोलम्बस की तरह निकल पड़ा छोटा और सरल रास्ता ढूँढने। कहीं कुछ भी संभव होता न देख फुरसतिया को मनसुखिया फॉर्मूला आशा की किरण की तरह दिखाई दिया, जैसे हताश विपक्ष को अचानक कोई मौका नज़र आ जाए। वह भी मौके को भुनाने निकल पड़ा।
कपड़ा किराये पर लेने का विचार उसके दिमाग में कौंधा। पीला गोटेदार कपड़ा मिलते ही फुरसतिया यूं खुश हुआ, मानो विपक्ष को सरकार के विरुद्ध कोई बहुत बड़ा सबूत मिल गया हो।
अब असली चुनौती थी- घरवाली को पता न चले कि कपड़ा किराये का है। आखिरी समय पर ऐसा धमाका करना था कि उसे सोचने तक का मौका न मिले।
फुरसतिया ने किसी जज की तरह फैसला तो ले लिया था लेकिन सुनाया नहीं था। बस उचित समय की प्रतीक्षा थी, ताकि फैसले के विरुद्ध घरवाली कहीं कोई अपील न कर सके।
आखिर वह सुअवसर आ ही गया। किराये का कपड़ा उसने अपनी जोरू के सामने यूँ रखा, मानो सरकार ने गरीबों के उद्धार के लिए कोई नई योजना लॉन्च कर दी हो। फिर गर्वीले अंदाज में लुगाई को देखा।
उसका चेहरा सपाट था। उसने धीरे से अपने घोड़े की ढाई घर की चाल चल दी।
‘छुटकी इस बार दीवाली हमारे साथ मनाएगी।’
फुरसतिया का बादशाह लुगाई के इक्के से मात खा गया था।
छुटकी फुरसतिया की अनब्याही सुंदर साली थी, जिसके सामने फुरसतिया के हाथों के तोते उड़ जाया करते थे। सो, उड़ गए। सारी चाणक्यगिरी धरी की धरी रह गई। साली कोई जेन-जी से कम थोड़ी थी!
फुरसतिया भी खिसक लिया। रहता घर में ही, मगर ड्रॉइंग रूम में नहीं आता। अपने ही कमरे में वह भला और उसका सपना भला।
वैसे भी इस दीवाली पर पैसा बचाने की उसकी योजना को पलीता लग गया था। उसकी योजना जर्जर बहुमंजिला भवन की तरह ढह गई थी और उसके सपने उसके मलबे में दबे पड़े थे, जबकि घरवाले साली साहिबा के साथ कैटवॉक कर रहे थे।
अभी फुरसतिया इस दोहरे प्रहार से संभल भी नहीं पाया था कि खबर मिली-छुटकी को वो कपड़ा इतना भा गया कि वह उसे अपने साथ ही ले गई।
अब किराया तो देना ही था, ऊपर से कपड़े की कीमत भी!
फुरसतिया ने मन ही मन हिसाब लगाया। फिर आसमान की ओर देखा। शायद लक्ष्मी जी से पूछना चाहता था कि आखिर यह कैसी कृपा है!
बेचारा फुरसतिया गया था चौबे जी बनने, दूबे जी भी नहीं रहा। (सुमन सागर)

