गंगा की अविरल धारा में आस्था का दीपोत्सव

गंगा की अविरल धारा में दीपावली की रात जब आस्था के दीप झिलमिलाते हैं, तो लगता है मानो जल की लहरों पर सदियों पुरानी सभ्यता अपनी स्वर्णिम स्मृतियां लिख रही है। दीपावली का उजास केवल घरों की देहरी और मंदिरों के आंगन तक सीमित नहीं रहता बल्कि उन सांस्कृतिक प्रवाहों में भी उतरता है, जिन्होंने भारत की आत्मा को आकार दिया है। गंगा इसी आत्मा की जीवंत प्रतीक है जहां धर्म, लोकजीवन से मिलता है, परम्परा प्रकृति से संवाद करती है और एक छोटा सा दीया अंधकार के विरुद्ध मानवता की शाश्वत आशा बनकर चमक उठता है। 
आस्था से सभ्यता तक का सफर
दीपावली के मौके पर ऋषिकेश से लेकर कोलकाता तक गंगा में अपनी-अपनी तरह से दीप उत्सव यानी गंगा में दीप दान होता है, जिसमें जलते हुए दीयों को गंगा के बहते हुए पानी में पंक्तिबद्ध ढंग से बहाने की कोशिश होती है। हिंदू परम्परा में गंगा को केवल नदी नहीं, मां का दर्जा दिया जाता है। माना जाता है कि गंगा में जलता हुआ दीप बहाने पुरखों को मुक्ति मिलती है। दिवाली के अवसर पर जब घरों में सफाई होती है, पूजा के लिए स्थान सजाया जाता है, दीप जला कर शुभता का स्वागत किया जाता है, तब भी इन गतिविधियों के पीछे पवित्रता और नये आरम्भ की भावना काम करती है। गंगा इसी भावना की व्यापक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। हालांकि दीपावली का धार्मिक महत्व अनेक परम्पराओं से निर्मित है और उसका गंगा से कोई अनिवार्य अनुष्ठानिक संबंध नहीं है। फिर भी गंगा इस पर्व के मूल भावों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। 
जल पर तैरती रोशनी
भारतीय संस्कृति में दीपक केवल मिट्टी, तेल और बाती से बना एक उपकरण भर नहीं होता, वह ज्ञान, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक होता है। जब यही दीपक नदी के घाटों पर जलता है या नदी की धारा में जलते हुए दीपक को प्रवाहित किया जाता है, तो रोशनी और जल का संगम एक अद्भुत सांस्कृतिक दृश्य रचता है। उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में विभिन्न नदियों और सरोवरों के किनारे भी दीप दान की परंपरा प्रचलित है। गंगा के घाटों पर दीपों की पंक्तियां अंधेरे को चीरती हुई दिखायी देती हैं। यह दृश्य मनुष्य और प्रकृति के बीच उस भावनात्मक संबंध की याद दिलाता है, जिसमें नदी को जीवनदायिनी और दीप को शुभता का संदेशवाहक माना गया है लेकिन यहां एक अंतर समझना ज़रूरी है। आम दीपावली का पर्व और देव दिवाली एक नहीं, दो अलग-अलग स्वरूप है। दीपावली कार्तिक अमावस्या को मनायी जाती है जबकि देव दिवाली कार्तिक पूर्णिमा को मनायी जाती है। इस दिन विशेष रूप से गंगा के घाटों पर असंख्य दीप जलाने की सदियों पुरानी परंपरा है। इस आयोजन ने गंगा, दीप दान और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संबंध को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलायी है। 
रोशनी के सांस्कृतिक सूत्र
दीपावली की सबसे प्रचलित धार्मिक कथा भगवान राम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने से जुड़ी है। लोकमान्यता है कि उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाये और नगर को प्रकाश से सजाया। यह कथा घर वापसी, सामाजिक एकता और न्यायपूर्ण जीवन की आशा का संदेश देती है। दूसरी ओर गंगा के तट पर स्थित काशी भारतीय आध्यात्मिकता, ज्ञान, दर्शन और सांस्कृतिक अनुष्ठानों का प्राचीन केंद्र रही है। हालांकि अयोध्या और काशी की परम्पराएं एक जैसी नहीं हैं लेकिन दोनों ही भारतीय सांस्कृतिक चेतना के ऐसे स्तंभ हैं, जिनके माध्यम से रोशनी, मुक्ति, धर्म और लोकविश्वास के विविध अर्थ सामने आते हैं। इस दृष्टि से गंगा को दीपावली की एकमात्र नदी कहना उचित नहीं होगा, लेकिन इसे इस पर्व की सांस्कृतिक व्याख्या का अग्रिम और सबसे प्रभावशाली प्रतीक माना जाता है। 
समृद्धि की कामना
दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा धन, वैभव और समृद्धि की कामना के लिए की जाती है। भारतीय समाज में समृद्धि की अवधारणा का संबंध केवल धर्म से नहीं बल्कि अन्न, जल, पशुधन, व्यापार और परिवार की खुशहाली से भी रहा है। गंगा का विशाल मैदान सदियों से कृषि, व्यापार, नगरों और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। नदी के जल ने खेतों को सींचा, बस्तियों को जीवनदान दिया और विभिन्न समुदायों के बीच सम्पर्क बढ़ाया। इ
स अर्थ में गंगा की समृद्धि केवल धार्मिक कल्पना नहीं, भारतीय आर्थिक और सामाजिक इतिहास का हिस्सा भी है। लेकिन आज आस्था का यह दीपोत्सव पर्यावरण की चेतना का भी प्रतीक है। नदियों में बढ़ रहा प्लास्टिक, रासायनिक रंग, पूजा-सामग्री तथा अन्य कचरा उसके पारिस्थितिकीय संतुलन को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए मिट्टी के दीपों का सीमित और जिम्मेदार उपयोग, कचरे का उचित निस्तारण तथा नदी के जल को प्रदूषण से बचाना है। दीपावली हमें अपने भीतर और आसपास के अंधकार को दूर करने की प्रेरणा देती है। यदि हम इस प्रेरणा को नदी संरक्षण से जोड़ सकें तो त्यौहार का संदेश और भी अधिक सार्थक हो जायेगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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