दीपावली के उजास में रिश्तों के विश्वास का पर्व है भाई दूज

भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार मानवीय रिश्तों की गरिमा, पारिवारिक एकता, सामाजिक सद्भाव और जीवन-मूल्यों को सहेजने के सशक्त माध्यम हैं। इन्हीं विशिष्ट पर्वों में भाई दूज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। दीपावली के उल्लासमय पांच दिवसीय उत्सव का समापन करने वाला यह पर्व भाई-बहन के निश्छल प्रेम, अटूट विश्वास, आत्मीयता व परस्पर जिम्मेदारी का अनुपम प्रतीक है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार यम द्वितीया, भ्रातृ द्वितीया और भाई टीका जैसे नामों से भी जाना जाता है। इस वर्ष भाई दूज 11 नवम्बर को मनाई जाएगी। इस वर्ष भाई दूज की तिथि को लेकर कुछ भ्रम इसलिए उत्पन्न हो रहा है क्योंकि कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि दो कैलेंडर तिथियों में व्याप्त है। पंचांग के अनुसार द्वितीया तिथि 10 नवम्बर को दोपहर 2 बजे प्रारंभ होकर 11 नवम्बर को दोपहर 3 बजकर 53 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि और अपराह्न काल में द्वितीया की उपस्थिति को ध्यान में रखते हुए 11 नवम्बर को भाई दूज मनाना उचित माना गया है।
यह पर्व भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में भाई-बहन के रिश्ते की विशिष्टता को रेखांकित करता है। रक्षाबंधन में जहां बहन भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधकर उसकी मंगलकामना करती है, वहीं भाई दूज पर वह अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगाकर उसके स्वस्थ, दीर्घायु और सुखमय जीवन की कामना करती है। भाई भी बहन को उपहार देकर उसके प्रति अपने स्नेह, सम्मान और सहयोग का भाव प्रकट करता है। यह रिश्ता किसी औपचारिक वचन अथवा सामाजिक बंधन से नहीं बल्कि बचपन की साझा स्मृतियों, निश्छल भावनाओं, परस्पर विश्वास और जीवनभर एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बने रहने की भावना से निर्मित होता है। यही कारण है कि भाई दूज का उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति में रिश्तों की भावनात्मक गहराई का जीवंत उत्सव है।
भाई दूज के पीछे अनेक पौराणिक कथाएं और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इसकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा सूर्यदेव और उनकी पत्नी संज्ञा की संतानों यमराज तथा यमुना से जुड़ी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यमुना अपने भाई यमराज से अत्यंत स्नेह करती थीं और उन्हें बार-बार अपने घर आने का निमंत्रण देती थी। अंतत: कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमराज अपनी बहन के घर पहुंचे। यमुना ने उनका आत्मीय स्वागत किया, मस्तक पर तिलक लगाया, आरती उतारी और स्वादिष्ट भोजन कराकर सत्कार किया। बहन के प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। यमुना ने प्रार्थना की कि इस दिन जो भाई अपनी बहन के घर जाकर तिलक करवाए और उसका आतिथ्य स्वीकार करे, उसे अकाल मृत्यु का भय न सताए। यमराज ने यह वरदान प्रदान किया। तभी से यह पर्व यम द्वितीया के नाम से प्रसिद्ध हुआ। एक अन्य धार्मिक मान्यता भगवान श्रीकृष्ण और उनकी बहन सुभद्रा से जुड़ी है। कहा जाता है कि नरकासुर का वध करने के बाद श्रीकृष्ण जब सुभद्रा के पास पहुंचे तो उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित करए तिलक लगाकर और आरती उतारकर उनका स्वागत किया तथा उनकी मंगलकामना की। इस प्रसंग को भी भाई दूज की तिलक परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
इस दिन यमुना स्नान का भी विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना नदी में स्नान करने और यमराज की पूजा-अर्चना करने से मनुष्य को यम के भय से मुक्ति तथा पुण्यफल की प्राप्ति होती है। इस परंपरा में यमुना केवल एक पवित्र नदी नहीं बल्कि जीवनदायिनी शक्ति, पवित्रता, करुणा और भाई-बहन के दिव्य स्नेह की प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। भाई दूज का एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पक्ष यमराज की पूजा के साथ-साथ चित्रगुप्त आराधना से भी जुड़ा है। यमराज को मृत्यु और न्याय का देवता माना जाता है जबकि भगवान चित्रगुप्त को मनुष्य के कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाला देवता बताया गया है। विशेष रूप से कायस्थ समाज में कार्तिक शुक्ल द्वितीया को चित्रगुप्त पूजा और लेखनी-दवात पूजन की परंपरा है। इस अवसर पर नई बही-खातों और लेखन सामग्री की पूजा की जाती है। इसका आध्यात्मिक संदेश अत्यंत गहरा है कि मनुष्य को अपने प्रत्येक कर्म के प्रति सजग रहना चाहिए क्योंकि उसके कर्म ही उसके जीवन की दिशा और भविष्य का निर्धारण करते हैं।
भाई दूज की परंपराएं भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और सांस्कृतिक स्वरूपों में दिखाई देती हैं। महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में इसे ‘भाऊ बीज’ कहा जाता है। पश्चिम बंगाल में यह ‘भाई फोंटा’ के नाम से प्रसिद्ध है, जहां बहनें विशेष विधि से चंदन, दही और काजल आदि से भाई के मस्तक पर फोंटा लगाती हैं। नेपाल में यह पर्व ‘भाई टीका’ के रूप में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। वहां बहनें भाइयों के माथे पर सप्तरंगी टीका लगाती हैं और उनके दीर्घ जीवन की कामना करती हैं। इन सभी परंपराओं में धार्मिक विधियों की भिन्नता के बावजूद भाई-बहन के प्रेम और मंगलकामना का मूल भाव समान है। यह विविधता भारतीय संस्कृति की उस विशेषता को दर्शाती है, जिसमें अलग-अलग भाषाओं, रीति-रिवाजों और क्षेत्रीय परंपराओं के बावजूद पारिवारिक मूल्यों की एकता बनी रहती है।

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