सामाजिक आइने में गोवर्धन पूजा का लोक-दर्शन

दीपावली के उल्लास के बाद जब गांवों में गोवर्धन पूजा का पर्व आता है, तो उसके साथ भारतीय ग्रामीण जीवन की एक ऐसी परम्परा जीवंत हो उठती है, जिसकी जड़ें कृषि, पशुपालन, प्रकृति और लोकविश्वासों में गहरे तक समाई हुई हैं। शहरों की चमक-दमक से दूर गांवों में यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि धरती, अन्न, पशुधन और मनुष्य के बीच सदियों से चले आ रहे आत्मीय संबंधों का उत्सव है। गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाना, उसकी पूजा करना, अन्नकूट का भोग लगाना और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना- इन सभी परंपराओं के भीतर भारतीय समाज की एक ऐसी जीवन-दृष्टि छिपी है, जो आज के पर्यावरणीय संकट और टिकाऊ खेती की चुनौतियों के बीच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है।
गोवर्धन में जीवन
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा पर्व भगवान श्रीकृष्ण की उस लीला की स्मृति से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा दी। पौराणिक कथा में गोवर्धन पर्वत केवल एक पहाड़ी नहीं बल्कि उस प्राकृतिक परिवेश का प्रतीक है, जो मनुष्य को चारा, जल, वनस्पति और जीवन के दूसरे आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराता है। 
ग्रामीण भारत में इस धार्मिक आख्यान का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। किसान के लिए धरती और पशुधन दोनों जीवन के आधार हैं। खेत में अन्न उगाने से लेकर घर के चूल्हे तक और बैलों की सहायता से जुताई करने से लेकर गाय-भैंसों के दूध तक, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुओं की भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण रही है। ऐसे में गोवर्धन पूजा उस कृषि संस्कृति की अभिव्यक्ति बन जाती है, जिसमें मनुष्य अपनी समृद्धि को केवल अपने परिश्रम का परिणाम नहीं, बल्कि प्रकृति के सहयोग का प्रतिफल भी मानता है।
गोबर में लोकजीवन का विज्ञान
गोवर्धन पूजा के दिन ग्रामीण परिवार गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाते हैं। कहीं इसे आंगन में सजाया जाता है, तो कहीं इसके आसपास फूल, पत्तियां, दीपक और पारम्परिक प्रतीक रखे जाते हैं। परिवार के लोग पूजा-अर्चना करते हैं और अच्छी फसल, पशुधन के स्वास्थ्य तथा घर की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। आधुनिक दृष्टि से देखें तो गोबर को इस पर्व के केंद्र में रखने के पीछे एक उपयोगी ग्रामीण अनुभव भी दिखाई देता है। परम्परागत कृषि व्यवस्था में गोबर जैविक खाद का महत्त्वपूर्ण स्रोत रहा है। उचित तरीके से गलाकर तैयार की गई गोबर की खाद मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने, उसकी संरचना सुधारने और पोषक तत्त्वों की उपलब्धता में योगदान दे सकती है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता और कृषि की दीर्घकालीन उत्पादकता को लाभ मिल सकता है।
यहां एक अंतर समझना आवश्यक है। गोबर से पूजा करना और वैज्ञानिक तरीके से गोबर का उपयोग करना दो अलग बातें हैं, लेकिन इनके बीच सांस्कृतिक सेतु मौजूद है। पूजा की परंपरा गोबर के प्रति सम्मान पैदा करती है, जबकि कृषि विज्ञान बताता है कि उसका सुरक्षित और विवेकपूर्ण उपयोग खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में कैसे सहायक हो सकता है। इस अर्थ में गोवर्धन पूजा अतीत की किसी रूढ़ि का महज निर्वाह नहीं बल्कि पारम्परिक ज्ञान और आधुनिक पर्यावरणीय चेतना के बीच संवाद का अवसर भी है।
अन्नकूट : समृद्धि की कामना का पर्व
गोवर्धन पूजा का एक प्रमुख आकर्षण अन्नकूट है। विभिन्न प्रकार के अनाज, दालों, सब्जियों और दूसरे खाद्य पदार्थों से तैयार व्यंजन भगवान को अर्पित किए जाते हैं। मंदिरों में अन्नकूट के भोग और ग्रामीण घरों में पारंपरिक पकवानों की अपनी अलग छटा होती है। इस अनुष्ठान का लोक सांस्कृतिक अर्थ केवल भोजन की विविधता तक सीमित नहीं है। भारतीय कृषि संस्कृति में अन्न किसान के श्रम, मौसम के सहयोग, मिट्टी की उर्वरता और पशुधन से मिलने वाले संसाधनों का सम्मिलित परिणाम है। अन्नकूट इसी सामूहिक समृद्धि का प्रतीक बनता है। जब प्रसाद लोगों में बांटा जाता है, तो वह साझेदारी और सामुदायिकता की भावना को भी मजबूत करता है। ग्रामीण समाज में त्योहारों के अवसर पर पड़ोसियों, रिश्तेदारों और जरूरतमंद लोगों के साथ भोजन साझा करने की परम्परा सामाजिक संबंधों को जीवंत बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।
आज जब खाद्य अपव्यय, मिट्टी की घटती गुणवत्ता और खेती की बढ़ती लागत जैसी चुनौतियां सामने हैं, तब अन्नकूट का संदेश और व्यापक हो जाता है अर्थात अन्न का सम्मान कीजिए, किसान के श्रम का मूल्य समझिए और भोजन को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, जीवन के साझा आधार के रूप में देखिए।
पशुधन के प्रति कृतज्ञता
ग्रामीण भारत में गोवर्धन पूजा के साथ कई क्षेत्रों में गाय-बैलों और दूसरे पशुओं को स्नान कराने, सजाने तथा उनकी पूजा करने की परम्परा भी जुड़ी है। कृषि के मशीनीकरण ने खेती के अनेक तौर-तरीके बदल दिए हैं, लेकिन पशुधन का महत्त्व दूध, जैविक खाद और ग्रामीण आजीविका के संदर्भ में आज भी बना हुआ है। गोवर्धन पूजा हमें यह सोचने का अवसर देती है कि समृद्धि केवल उत्पादन बढ़ाने में नहीं, बल्कि उन सभी जीवों और प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल में भी निहित है, जिन पर हमारा जीवन निर्भर करता है।
परम्परा से भविष्य की ओर
गोवर्धन पूजा की वास्तविक शक्ति उसके धार्मिक अनुष्ठानों और ग्रामीण जीवन के व्यावहारिक अनुभवों के मेल में है। गोबर से बनी आकृति हमें प्रकृति के प्रति श्रद्धा का संदेश देती है, अन्नकूट सामूहिक समृद्धि की याद दिलाता है और पशुधन की पूजा जीव-जगत के प्रति कृतज्ञता का भाव जगाती है। आज आवश्यकता इस पर्व को अतीत की स्मृति बनाकर रखने की नहीं बल्कि उसके मूल संदेश को भविष्य की ज़रूरतों से जोड़ने की है। गांवों में जैविक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, मिट्टी की सेहत की रक्षा, जल संरक्षण, पशुओं की बेहतर देखभाल और किसान के श्रम का सम्मान-ये सभी ऐसे संकल्प हैं, जिनसे गोवर्धन पूजा की भावना को व्यवहार में उतारा जा सकता है। इसलिए गोवर्धन पूजा केवल गोबर की पूजा नहीं, बल्कि उस जीवन-व्यवस्था का उत्सव है जिसमें मिट्टी, पशु, अन्न और मनुष्य एक-दूसरे के पूरक हैं। यही इसकी लोकसांस्कृतिक विरासत है और यही आधुनिक समय में इसकी सबसे सकारात्मक तथा प्रासंगिक व्याख्या भी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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