मूल्यांकन : कभी दुनिया में बजता था भारतीय फुटबॉल का डंका


फुटबॉल में महाशक्ति से पिछड़ते गए। कहा जाता है कि भारतीय खिलाड़ी शारीरिक तौर पर कमजोर हैं। खैर, कुछ हद तक यह तर्क ठीक भी है लेकिन भारतीय सुपर लीग (आई.एस.एल.) के बाद ऐसा नहीं कहा जा सकता। भारतीय फुटबॉलर विदेशी खिलाड़ियों के साथ खेल रहे हैं, यहां तक कि उन खिलाड़ियों के साथ जो विश्व की बड़ी लीगों सहित विश्व कप में भी खेलते हैं। यहां यह तर्क कुछ हद तक बेमानी लगता है।
दरअसल फुटबॉल में किसी देश की पहचान उसकी खेलने वाली शैली के कारण होती है। हालैंड टोटल फुटबॉल के लिए जाना जाता है, इटली टीम का डिफैंस पर ज़ोर होता है। स्पेन टिकी टाक शैली अपनाता है, जो शार्ट पास और बहुत सारे मूवमैंट पर केन्द्रित होती है। ब्राज़ील पूर्व स्टाइल का बादशाह है। भारत की फुटबॉल में एक खास पहचान थी। 1951 से 1962 तक भारत एशिया में सर्वश्रेष्ठ था और भारतीय टीम को ‘ब्राज़ील ऑफ एशिया’ कह कर जाना जाता था। क्योंकि टीम के खिलाड़ी शार्ट पास में निपुण थे और उनको ड्रिबलिंग में कुशलता हासिल थी। बाद में खेल के स्तर में गिरावट के साथ ही भारतीय फुटबॉल विदेशी कोचों के हाथ चढ़ गया। पिछले कई दशकों से भारतीय फुटबॉल ने विदेशी कोचों के सामने समर्पण कर दिया। विदेशी कोचों की निजी ख्वाहिशों के चलते भारतीय फुटबॉल शैली पहचान खोती गई। जिस खेल में हम शिखर पर थे और अब टॉप 100 देशों की सूची में भारत आखिरी आंकड़ों पर है। दो वर्ष पूर्व तो भारत विश्व दर्जा बंदी में लगभग 150वें स्थान से भी पीछे था।
दरअसल भारत फुटबॉल के लिए वह माहौल भी तैयार नहीं कर सका, जिससे हम फिर मजबूती से पैर जमा सकें। 1983 के क्रिकेट कप के बाद तो तस्वीर ही बदल गई। भारत में यह खेल धर्म बन गया और क्रिकेट भगवान की तरह पूजे जाने लगा। क्रिकेट अब पूरी तरह जन-मानस पर छा गया है, विश्वनाथन आनंद, अभिनव बिंद्रा, पंकज अडवानी, साइना नेहवाल, पी.वी. सिंधू आदि जैसे खिलाड़ी आगे आए और अपनी खेल के सैल्फ एम्बैस्डर बन गए। फुटबॉल में बाईचुंग भूटिया से शुरू हो कर सुनील छेतरी तक दो ही नाम हमारे जहन में आते हैं। इसी के साथ ही फुटबॉल अपनी प्राथमिकता से बाहर हो गया।जानकारों का मानना है कि भारतीय फुटबॉल को अपना खोया रुतबा हासिल करने के लिए चीन वाला मॉडल अपनाना चाहिए। पड़ोसी देश ने जिस तरह फुटबॉल का योजनाबद्ध ढांचा खड़ा किया और खेल में निवेश भी किया, परिणाम धीरे-धीरे सामने आ रहा है। आज भारतीय टीम विश्व रैंकिंग में लगभग 100वें नम्बर पर हैं, कुछ समय पहले तो बहुत पिछड़ गए थे।फीफा के पूर्व मुख्य सैप ब्लाटर ने भारत को ‘फुटबॉल की सोई हुई शक्ति’ बताया था। विदेशी कोच बाब हाटन जब भारतीय टीम के कोच थे तो वह कहा करते थे कि इस खेल के प्रति भारत में किसी को भी चिंता नहीं है, उनके अनुसार क्या महाशक्ति को उठाने में काफी समय लगेगा? आखिर कब टूटेगी यह गहरी नींद?