पंजाब के लिए निराशाजनक ही रहा आम बजट
मिज़र्ा गालिब का एक शे’अर है :
जब तवक्को ही उठ गई ़गालिब
क्यूं किसी का गिला करे कोई।
आज का लेख लिखते हुए यह शे’अर बार-बार मेरे मन में दस्तक देता रहा, क्योंकि केन्द्र सरकारों का पंजाब के प्रति रवैया लगातार ऐसा रहा है कि उससे कोई तवक्को (उम्मीद) करनी ही नहीं बनती। इसलिए उससे शिकायत करनी भी नहीं बनती, परन्तु शायद यह तवक्को, यह उम्मीद अभी भी ज़िंदा है और शायद यही कारण है कि मैं केन्द्रीय बजट में पंजाब को दृष्टिविगत करने की शिकायत किए बिना नहीं रह सका और फिर इसी विषय पर कलम-घिसाई कर रहा हूं।
वित्त मंत्री निर्र्मला सीतारमण ने 1 फरवरी, 2026 को 53 लाख 47 हज़ार 315 करोड़ रुपये का बजट पेश किया है। आश्चर्य की बात है कि इस पूरे बजट में मुझे तो एक बार कहीं भी पंजाब का नाम भी सुनाई नहीं दिया। बेशक यह बजट इस बात से ऐतिहासिक है कि यह बजट विकसित भारत बनाने के सपने को दृष्टिगत रख कर ही पेश किया गया है और कई वर्षों के बाद पहली बार रेवड़ियां अर्थात फ्रीबीज़ नहीं दी गईं या बहुत नाममात्र ही दी गई हैं। नि:संदेह पहले से जारी अनियमित मुफ्त के सामान का वितरण अभी जारी रहेगा, परन्तु इस बजट में पंजाब के साथ किया गया सौतेली मां जैसा व्यवहार स्पष्ट दिखाई देता है। वैसे हैरानी की बात है कि पंजाब के लिए यह वर्ष चुनावी वर्ष है और भाजपा पंजाब में अकेले सरकार बनाने के बड़े-बड़े दावे भी कर रही है, परन्तु बजट में पंजाब को कुछ भी ‘विशेष’ न देना तो इस आरोप को मज़बूत करता है कि भाजपा ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत के पैंतरे को सामने रखकर ही ऐसे कार्य ही कर रही है कि वह कांग्रेस के इतने वोट तोड़ ले कि पंजाब में कांग्रेस न जीत सके। वैसे तो कांग्रेसी नेताओं की पंजाब में आपसी फूट ही भाजपा के इस सपने को पूरा करने के लिए पर्याप्त है, परन्तु भाजपा द्वारा पंजाब के उन डेरों के प्रति सम्मान विशेष रूप में दिखाना जिनके श्रद्धालु आम तौर पर कांग्रेस की ओर झुकते हैं, अपनी कहानी स्वयं ही बयान कर रहा है।
़खैर, राजनीति आज का विषय नहीं है। आज तो यह देखना है कि पंजाब के एक सीमांत राज्य होने के बावजूद इस बार बाढ़ का बड़ा नुकसान सहने के बावजूद पंजाब के उद्योग के यहां से प्रवास के समाचार के बावजूद, तथा कृषि एवं पानी की बड़ी समस्याओं के बावजूद, पंजाब को कुछ भी विशेष नहीं दिया गया। पंजाब ने बाढ़ के नुकसान की पूर्ति तथा पुनर्निर्माण के लिए 12 हज़ार 905 करोड़ रुपये की मांग की थी जो नहीं दिए गए। कृषि क्षेत्र पूरी तरह दृष्टिविगत किया गया है। जीएसटी के नुकसान की पूर्ति की बात भी नहीं सुनी गई। पंजाब ने एमएसपी की कानूनी गारंटी, ऋण माफी, फसली विभिन्नता के लिए विशेष पैकेज आदि मांगे थे, परन्तु कहीं कुछ भी नहीं दिया गया। इसके विपरीत खादों पर सब्सिडी कम की गई है, जिससे कृषि आधारित पंजाब का सबसे अधिक नुकसान होगा। दक्षिणी राज्यों की फसलों नारियल, काजू-बादाम तथा चंदन की कृषि के लिए विशेष सुविधाएं घोषित की गईं, परन्तु पंजाब की फसलों को बिल्कुल भुला दिया गया है। पंजाब के भू-जल को बचाने के लिए कोई फंड नहीं दिए गए, जबकि पंजाब रेगिस्तान बनने की ओर बढ़ रहा है। पाकिस्तान से दुश्मनी के बहाने पंजाब के रास्ते अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर भी पाबंदी जारी है, जबकि समुद्री मार्ग से व्यापार जारी है। पंजाब से उद्योग पलायन कर रहे हैं, परन्तु केन्द्र पंजाब को बचाने के लिए कोई सहायता नहीं दे रहा।
नि:संदेह बजट में कुछ योजनाएं ऐसी हैं जिनमें पंजाब अप्रत्यक्ष रूप से लाभ ले सकता है। जैसे बजट में कैपिटल खर्च बढ़ा है, टाइप-1 तथा टाइप-2 शहरों के ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) का विकास होगा। लघु तथा मध्यम दर्जे के उद्योगों के लिए रखे गए अधिक फंडों में से पंजाब कुछ लाभ ले सकता है, परन्तु कुल मिला कर यह बजट पंजाब के लिए निराशाजनक बजट है तथा यह संघीय ढांचे के लिए राजनीतिक तथा आर्थिक तौर पर समस्या उभारने वाला बजट प्रतीत होता है। राज्यसभा सदस्य विक्रमजीत सिंह साहनी, लोकसभा सदस्य हरसिमरत कौर बादल, गुरजीत सिंह औजला तथा पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की टिप्पणियां इस बजट के पंजाब-पक्षीय न होने के प्रति बिल्कुल सटीक हैं और बिल्कुल ठीक व्याख्या प्रतीत होती है। हैदर अली आतिश के शब्दों में पंजाब की हालत ऐसी ही प्रतीत होती है :
दोस्तों से इस कद्र सदमे उठाये जान पर,
दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा।
(अदावत = दुश्मनी)
भारत-अमरीका व्यापार संधि तथा पंजाब
कुछ भी समझ में आये तो आये भला किसे,
दोनों तरफ से हो रहे दावे जुदा-जुदा।
वैसे तो विपक्ष चाहे यह आरोप लगाता रहे कि भारत सरकार ने अमरीका से समझौता अडानी को बचाने, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम एपस्टीन फाइलों में आने तथा राहुल गांधी द्वारा पूर्व सैन्य प्रमुख की किताब में चीन के टैंक भारतीय सीमा पर पहुंचने पर भी फैसला न ले सकने के आरोपों के प्रचार को कुंद करने के लिए जल्दबाज़ी में किया है, परन्तु यह आरोप कम सही प्रतीत होते हैं, क्योंकि यह समझौता महीनों से लटका हुआ था। यदि भारतीय प्रधानमंत्री के कहने से रातों-रात समझौता हो सकता था तो भारत लम्बा समय 50 प्रतिशत टैरिफ से अपने व्यापार में भारी नुकसान क्यों सहन करता। वैसे ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चीन तथा रूस की ओर जाने के संकेतों ने अमरीका को पुन: बातचीच के लिए सोचने को मजबूर किया है। भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अमरीका को यह भी कहा बताया जाता है कि हम इतने समर्थ हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का शासन खत्म होने तक इंतज़ार कर सकते हैं। फिर इस दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा ट्रम्प के बीच 4 बार फोन पर वार्ता भी हुई जिसने समझौते का मार्ग प्रशस्त किया। नि:संदेह भारत सरकार इस समझौते को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचारित करे, परन्तु वास्तविकता कुछ और ही प्रतीत होती है।
पहले अमरीका में भारतीय सामान पर 2.4 से 3.4 प्रतिशत टैरिफ ही लगता था और भारत अमरीकी सामान पर औसतन 17 प्रतिशत तथा कृषि वस्तुओं पर 39 प्रतिशत टैरिफ लगाता था, परन्तु अब सुई 180 डिग्री उल्ट घूम गई है। इस समझौते का जो हिस्सा सामने आया है, उसके अनुसार अब भारतीय सामान पर अमरीका में 18 प्रतिशत टैरिफ लगेगा तथा अमरीकी सामान भारत में शून्य प्रतिशत टैक्स दर पर आएगा। चाहे विश्व की आर्थिक स्थिति तथा अमरीका की दादागिरी के चलते यह भी भारत की आर्थिकता के पक्ष में ही है, परन्तु कृषि एवं डेयरी सैक्टर को लेकर अभी भी असमंजस पड़ा हुआ है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प, अमरीकी व्यापार प्रतिनिधि जैसमीन ग्रीयर तथा अमरीकी विदेश सचिव (मंत्री) ब्रून लैस्ली इस समझौते को भारतीय बाज़ारों को अमरीकी कृषि तथा डेयरी उत्पादों के लिए खोलने वाला करार दे रहे हैं, जबकि भारत के व्यापार एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल भारतीय कृषि हितों को सुरक्षित रखने की बात कर रहे हैं। ये बयान बिल्कुल ही परसपर विरोधी हैं, परन्तु यदि सचमुच ही कृषि तथा डेयरी क्षेत्र अमरीकी वस्तुओं के लिए खोल दिया गया तो इसका सबसे अधिक नुकसान पंजाब को होगा। बेशक हमें अपनी सरकार के आश्वासन पर विश्वास करना चाहिए, परन्तु अच्छी बात तो यही है कि भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी स्वयं इस समझौते का मसौदा लोगों के सामने ऑनलाइन पेश कर दें ताकि किसी तरह की पर्देदारी के आरोप न लगें और चिन्ता खत्म हो।
बे-़खुदी बे-सबब नहीं ़गालिब,
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है।
-मिज़र्ा ़गालिब
बंगा की पाकिस्तान यात्रा
भारतीय मूल के सिख विश्व बैंक के प्रमुख अजयपाल सिंह बंगा की पाकिस्तान यात्रा ने विश्व का ध्यान आकर्षित किया है। उनका दौरा आधिकारिक तथा निजी मामलों का मिश्रण था। बंगा के साथ उनकी पत्नी रितु बंगा भी थीं। पाकिस्तानी पंजाब के मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा उनके साथ रहे। उन्होंने पाकिस्तान को 20 मिलियन के सम्भावित ऋण के मामले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ तथा अन्य उच्चाधिकारियों से मुलाकात भी की, परन्तु जिस प्रकार उन्होंने निजी तौर पर एक सिख के रूप में गुरुद्वारों में माथा टेका और अपने पैतृक गांव गए, उसने विश्व भर के सिखों का सिर ऊंचा किया है। जिस तरह का स्वागत बंगा का पाकिस्तान में हुआ, वह उनके प्रभाव का प्रतीक है। उनके पैतृक गांव खुशाब के गुरुद्वारा साहिब का नवीकरण किया गया, उनके पैतृक घर का भी नवीकरण किया गया। पाकिस्तान में सिखों की संख्या तो लगभग 20 हज़ार है और हिन्दू शायद लगभग 45 लाख हैं, ईसाई भी 33 लाख तथा अहमदिया की संख्या 62 लाख के करीब है। प्रत्येक सिख गुरु नानक देव जी के सरबत दे भले के सिद्धांत को समर्पित है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को काफी समस्याएं हैं। अच्छा हो यदि अजयपाल सिंह बंगा पाकिस्तान में अपना प्रभाव इस्तेमाल करके अल्पसंख्यकों की समस्याओं को कम करने के लिए कोई पहलकदमी करें।
क्या अजब लोग थे गुज़रे हैं बड़ी शान के साथ,
रास्ते चुप हैं मगर नक्श-ए-कदम बोलते हैं।
(तारिक कमर)
-मो. 92168-60000



