कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना

देखते ही देखते जीवन वही रहा, जीवन दर्शन के शीर्षक वही रहे, लेकिन उसके तले जीवन का व्यवहार, दर्शन का विषय वस्तु बदल गया। मज़े की बात यह है कि जो समय की चाल बदलने के साथ-साथ अपनी चाल बदल गया, वही सफल है। जो नहीं बदल पाया, और सनातनी मूल्यों को आत्मसात करने के नाम पर परम्परा और आदर्शों के साथ चिपका रहा, उस जैसा आजकल कोई घोर अयर्थावादी है नहीं। ऐसे लोगों की नियति हाशिये से बाहर हो जाना होती है, लेकिन उनके वाकपटुता के करिश्मे होते हैं, साहिब! ज़िन्दगी के चलन्त व्यवहार के वृत्त से बाहर हो जाने पर अपनी असफलता को ये लोग रोमांटिक बना उसे त्याग और बलिदान का नाम दे देते हैं। बदलते युग का महाभौतिकवाद आपसे सधा नहीं। इसलिए नहीं कि आप आध्यात्मिक थे, बल्कि इसलिए क्योंकि आप टुच्चा या काईयां हो जाने की प्रक्रिया में वे ऊंचाइयां नहीं छू सके जो अपेक्षित थीं और अब अपने पीछे छूट जाने के पराजय बोध को अकेलेपन के महिमा-मण्डन से बदल रहे हैं।
सच में चाहते तो आप भी वही सब थे, लेकिन नहीं पा सके, इसलिये अब अपने पिछड़ जाने या कतार से बहार हो जाने को ‘अकेले चलो रे’ का नाम देकर रवीन्द्र बाबू का प्रशस्ति गायन कर रहे हो।
‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’ आज बदलते युग का नया सत्य बन गया है। लोक जीवन और लोक भाषा से प्रतिबद्धता का नाम लेते हो, लेकिन आपके दैनिक बोलचाल में दूसरों के लिए गालियों का प्रिय कर्म क्यों सरक आया है? रोते हैं यारों के लिए और नाम लेते हैं बिछड़ गये भाइयों का। नाम लेते हैं सामाजिक और दैनिक जीवन में भ्रष्टाचार को शून्य स्तर पर सहने का, लेकिन सहें तो उसे जो आप के ऊपर कोई बाहरी आघात हो। जब भ्रष्टाचार मिथ्या भाषण, और अपनी महानता का भ्रम आपके व्यक्तित्व का हिस्सा ही बन गया, तो भला इसे एक आघात बना कर उससे मुक्ति का प्रयास करने का नाटक क्यों करें?
है कोई, ऐसा जिसने अपनी नेतागिरी में भ्रष्टाचार को शून्य स्तर पर भी न सहने की घोषणा न की हो? और जब उसका प्रभामण्डल घट जाने के बाद उसके घर जाने पर बदली सत्ता के छापे पड़े हों, तो घर के गुप्त कोनों से भ्रष्ट धन के बण्डल न मिले हों? और यूं भ्रष्ट धन जब्त करवाने के बाद जब उसकी एफ.आई.आर. दर्ज हो तो वह उसे बदलाखोरी का नाम न दे?
़खैर आपके नाम पर एफ.आई.आर. दर्ज हो जाये तो यह भी आज के राजनीतिक कर्म में अपमान नहीं, सम्मान की बात होती है। हिरासत में चले गये। पुलिस रिमांड मिले तो थाने की मेहमान नवाज़ी पाई, और फिर जल्द ही न्यायिक रिमांड के नाम पर जेल बनाम सुधार गृह में तशरीफ ले आये।
अब महीनों अदालत में आपका वह मुकद्दमा चलेगा, कि जिसे चलाने वाले महीनों आपका केस कम सबूतों के पेश नहीं कर पाएंगे। महीने सालों में न बदल जायें, इसलिए न्यायपालिका अगर आपको जमानत पर रिहा कर दे, तो इसे एक महा-उपलब्धि बता देना अब आपके गुर्गों का काम है। आपके जमानत पर छूट जाने को एक विजयोत्सव में बदल दिया जाता है। हिरासत गृह से खुली सड़क पर वापसी को शोभायात्रा में बदल देने के लिए किराये के लोग जुटाये जाते हैं, और इसके बाद आरोपित व्यक्ति अपराधी न कहलाने की छूट का लाभ उठाते हुए धन-बल की सहायता से निगम से लेकर संसद तक का चुनाव लड़ने का हौसला कर लेता है। जीत गये तो गम्भीर अपराधों के आरोपों से दागदार हुए अपने दामन के साथ निगम से लेकर संसद तक से किसी एक कुर्सी का चुनाव जीत उसका प्रांगण अपनी भीड़ से भर देंगे, और छद्म तो नहीं बल्कि आरोपित क्रांतिकारियों की ये भीड़ देश निर्माण का फैसला करने वाले इन परिसरों की प्रामाणिक भीड़ बन जाएगी।
नया सत्य है, देश की विकास गति बढ़ाने के नाम पर अपनी गति बढ़ाइए। एक झोंपड़ी से प्रासाद हो जाइए, और इसे देश और समाज की उपलब्धि बता अपने अभियान की इतिश्री मान लीजिये, लेकिन याद रखिये यहां घोषित अभियान ही नेता जी की आदत बनते हैं, प्रसारित/ मिथ्या आंकड़ों की सहायता से पाई सफलता से। जीते कारवांओं की वह जीवन यात्रा बनती है, कि जिसमें एक अधूरे अभियान की पूर्णता की घोषणा के बाद नये अभियान घोषित कर दिये जाते हैं। 
घोषणाएं और सफलता के दावे भी आज की हमारी ज़िन्दगी के कर्णधारों का जीवन सार बन गये हैं। उनके इस जीवन सार और सड़कें तोड़ नई सड़क बनाने की ठेकेदारी करने वालों में कोई विशेष अन्तर नहीं पाते हैं। ठेकेदार भी बनी सड़क को तोड़ पुन: सड़क को नया बनाने का ठेका ले लेता है। फिर उस सड़क की तोड़-फोड़ को आधा-अधूरा छोड़ कर नई सड़क बनाने का ठेका स्वीकार कर लेना ही अगर इसका धंधा है, तो आज की राजनीति भी इससे वंचित कहां? वह भी तो नित्य नये अभियान के दावों के साथ खण्डित सपनों के मीनार छोड़ कर किसी नई घोषणा का मीनार खड़ा करने में लग गई है। फिर अपने असफल रह जाने का रोना या अपने यार की मौत को अपने कुकृत्य नुमां भाइयों की मौत का रोना रोने में तबदील कर देती है। बात नारी सशक्तिकरण की होती है, और शक्ति पार्षद पतियों को मिलती है। जी नहीं, नारी शक्ति का विस्तार हो रहा है। अब वह विधायक पतियों या सांसद पतियों को मिलेगी।

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