ट्रम्प की युद्ध-लिप्सा में डूब गया दुनिया का पर्यटन उद्योग
ईरान-अमरीका-इज़रायल के युद्ध पर बहस विवाद, युद्ध के दिनों से सैंकड़ो गुना अधिक दिन चलेगा कि किसकी जीत हुई और कौन हारा? परन्तु इस सबके बीच पूरी तरह पर्यटन की दुनिया मिसाइलों तथा बमों से इस कदर झुलस गई कि उसे पटरी पर आने में कम से कम एक साल तो लगेगा ही। भारत का पर्यटन उद्योग ही प्रभावित हुआ है, ऐसा नहीं है। दुबई, अमरीका, सऊदी अरब, कतर, ओमान, बहरीन, कुवैत ऐसे खाड़ी देश हैं, जहां पर खासा नुकसान हुआ है। ईरान का पर्यटन उद्योग तो चौपट ही हो गया है। इसके साथ ही वह देश जो इन देशों के आसपास या इनकी वायुसीमा मार्ग में आते हैं, वे भी युद्ध की आग में झुलस गए हैं। सिर्फ घरेलू पर्यटन पर असर आया है, जी नहीं। धार्मिक पर्यटन के साथ ही उन देशों को भी हानि हुई है जहां पर मैडीकल टूरिज्म या वाटर टूरिज्म के लिए पर्यटक जाते थे।
भारत में अप्रैल से लेकर अगस्त तक धार्मिक टूरिज्म का जबदर्रस्त सीजन होता है। यहां पर चारधाम यात्रा के साथ ही दूसरी यात्राएं होती हैं। दूसरे देशों से हजारों मरीज अपना उपचार कराने आते हैं और यहां पर्यटन का भी आनंद लेते हैं। यूक्रेन-रूस के युद्ध के कारण वहां का पर्यटन और एजुकेशन टूरिज्म तो पहले ही से गंभीर संकट में था। अब खाड़ी युद्ध ने वहां पर स्थितियां और विकट कर दी हैं। जिन देशों के पर्यटन पर युद्ध का प्रत्यक्ष असर नहीं हुआ है, उन देशों पर होर्मुज के कारण ऐसी स्थिति हो गई है कि वहां पर पहले तो खुद ही पर्यटक नहीं जा रहे और जहां की पूछताछ भी है, वहां पर पर्यटन एजेंसियां खुद ही बुकिंग से बचने के उपाय तलाश रही हैं। इन देशों में श्रीलंका तथा नेपाल खास हैं। पाकिस्तान में ऐसे ही पर्यटक नहीं जाते हैं और जो जाते भी थे, वह वहां पर फैली अफवाहों के कारण जाने की सोच भी नहीं रहे हैं। श्रीलंका की हालात इस बात से समझी जा सकती है कि उसकी सरकार को भारत सरकार ने मांगने पर 38 हजार मीट्रिक टन पेट्रोलियम पदार्थों की सप्लाई की। यहां पर जब आम ज़रूरत का ही तेल आदि नहीं है, तो पर्यटन की क्या स्थिति होगी, खुद समझा जा सकता है।
खाड़ी युद्ध का सबसे बुरा असर दुबई पर हुआ है। यहां पर हर वर्ष कम से कम 15 मिलियन पर्यटक जाते थे, लेकिन अब यहां पर सन्नाटा नज़र आ रहा है। भले ही युद्ध थम गया है और माना जा रहा है कि टाइम पूरा होने के बाद यह दुबारा आरंभ नहीं होगा। पर अभी के हालात बहुत गंभीर हैं। एयर ट्रैफिक के कारण यहां पर 50 प्रतिशत से अधिक पर्यटन स्थलों पर सन्नाटा है और युद्ध के चालीस दिनों में दो लाख से अधिक की बुकिंग रद्द हुई हैं। अभी के हालात ये हैं कि जो दो हफ्ते का युद्धविराम हुआ है, वह भी पर्यटकों में इस बात के लिए उत्साह नहीं ला पा रहा है कि वह फिर से पर्यटन का मन बनाएं। डर इस बात का है कि कहीं युद्ध फिर भड़का तो क्या होगा? इन परिस्थितियों में कोई भी पर्यटक या पर्यटन एजेंसी खतरा नहीं लेना चाहती। टूरिज्म विशेषज्ञ समझ रहे हैं कि यदि युद्ध समाप्त घोषित नहीं होता है तो खाड़ी देशों को कम से कम 40 से 55 अरब डालर तक का नुकसान उठाना पड़ेगा। चूंकि होर्मुज मार्ग विवाद का नया केन्द्र बन गया है इसलिए सर्वाधिक मारामारी ईंधन की है और भारत ही नहीं, सभी देशों पर इसका सीधा असर आया है, जिससे हवाई किराए में उछाल आया है। छोटी से छोटी हवाई यात्रा की टिकट में कई हजार रुपए की वृद्धि दिख रही है।
सोचिए, श्रीलंका जैसा देश जहां पर पर्यटक हनीमून के साथ ही भगवान राम से जुड़े तीर्थों को भी देखने जाते थे, वहां पर मार्च माह में अर्थात पूरे युद्ध काल में करीब 18 प्रतिशत की कमी हुई है। यह यहां की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा है। दुबई, श्रीलंका की बात जाने दें, भारत को देखें। यहां पर पर्यटन सीजन आरंभ हो चुका है और जून में जब मानसून आ जाएगा। तब तक का जो सीजन है वह काफी डिस्टर्ब हो गया है। वर्ष 2025 में ऑपरेशन सिंदूर, प्राकृतिक आपदाओं ने यहां के मुख्य पर्यटक राज्य उत्तराखंड तथा जे एंड के में पर्यटकों को जाने से रोका था। इस बार गैस की बहुप्रचारित किल्लत ने होटल-ढाबों को ही नहीं, उन लोगों को भी चिंता में डाल दिया है, जो उत्तराखंड, चारधाम तथा आदि कैलाश यात्रा के लिए जाते थे। सरकारी सूचना के अनुसार शुरुआती रजिस्ट्रेशन के दिनों में रजिस्ट्रेशन की संख्या में चालीस प्रतिशत की गिरावट आई है।
भारत में गत वर्ष कश्मीर में पहलगाम के बाद जिस तरह की स्थितियां थीं, अब पूरे विश्व में वही हालात हैं। पर्यटक और पयर्टन कारोबारी इस बात पर विश्वास कर ही नहीं पा रहे हैं कि युद्ध पूरी तरह से थम गया है। इसके पीछे कारण ट्रम्प का बात पलटने में महारथ हासिल कर लेना माना जा रहा है। पर्यटक इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि युद्ध काल में जब भारत से बाहर रहने वाले भारतीय जो भारत वापस आना चाहते थे वे चाहकर भी नहीं आ पाए थे। फिर अगर वे पर्यटन के दौरान फंस गए तो क्या होगा? भारत में आगरा, जयपुर, दिल्ली जैसे शहरों में जहां पर विदेशी पर्यटक हमेशा आते थे, वहां पर भी पर्यटकों का टोटा है और होटल, ट्रैवल एजेंसियों में फांका मारने जैसी स्थिति है। कश्मीर, नार्थ ईस्ट, लेह-लद्दाख, नैनीताल, मनाली, शिमला जैसे शहर जो गर्मियों के लिए अप्रैल में ही बुकिंग के कारण उफनाने लगते थे, वहां पर एक बार सोशल मीडिया पर पैकेज खोज करने के बाद सैंकड़ों आफर आ रहे हैं। पर्यटन की दुनिया की स्थिति इसी से समझी जा सकती है कि जब घरों में समर वैकेंस के लिए योजनाएं बनती थीं तब इस बात पर बहस हो रही है कि ट्रम्प की सनक ने पूरी दुनिया को घरों में कैद होने को मजबूर कर दिया है। बच्चे उन्हें पर्यटन के कोरोना अंकल भी कहने लगे हैं, जो उनकी सोशल छवि और पर्यटन के भविष्य के लिए फिलहाल अच्छा नहीं कहा जा सकता।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



