शरारत भरी कार्रवाई
भारत अपने महत्त्वपूर्ण पड़ोसी देश चीन के साथ संबंध सुधारने के लिए लगातार गम्भीरता से यत्न करता रहता है, परन्तु दूसरी तरफ चीन की ओर से समय-समय पर कुछ न कुछ ऐसा किया जाता है, जिससे भारत में चीन के इरादों के प्रति पुन: अविश्वास पैदा हो जाता है।
ऐसा ही एक बार फिर घटित हुआ है। चीन ने भारत के प्रदेश अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताते हुए 23 और स्थानों के नाम बदल दिए हैं। इस संबंध में भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा गया है कि यह शरारत भरी कार्रवाई है। इससे यह वास्तविकता नहीं बदलेगी कि अरुणचल प्रदेश भारत का एक अभिन्न अंग है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने यह भी कहा कि चीन की ऐसी कार्रवाइयां दोनों देशों के तेज़ी से सुधर रहे संबंधों में खटास पैदा करने वाली हैं। यहां वर्णनीय है कि विगत लम्बी अवधि से चीन की ओर से बार-बार अरुणाचल प्रदेश के भिन्न-भिन्न पहाड़ों, नदियों, शहरों और कस्बों के नाम बदलने संबंधी सूचियां जारी की जा रही हैं। यह सिलसिला चीन द्वारा 2017 में शुरू किया गया था। इसके बाद 2021,2023, 2024 और 2025 में भी अरुणाचल प्रदेश के स्थानों के नाम बदलने वाली ऐसी ही सूचियां जारी की गई थीं। चीन भारतीय क्षेत्र त्वांग सहित पूरे अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा पेश करता आ रहा है और इसे दक्षिण तिब्बत का हिस्सा मानता है और इसे उसने चीनी नाम ‘ज़ंगनान’ भी दिया हुआ है। भारत की ओर से चीन की ऐसी शरारतों और दावों का हमेशा ही कड़ा जवाब दिया जाता रहा है। यहां यह भी वर्णनीय है कि 1962 के युद्ध के समय भी चीन ने भारतीय क्षेत्र लद्दाख के 28 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था और इसमें विशेष रूप से अक्साई चिन का क्षेत्र भी शामिल है। समय-समय पर चीन की ओर से अपने तौर पर भारत के साथ लगती सीमाएं तबदील करने के उद्देश्य से भारतीय क्षेत्रों में घुसपैठ भी की जाती रही है, जिससे दोनों देशों में तनाव भी बढ़ता रहा है। गलवान घाटी में इसी कारण 2020 में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच टकराव बढ़ गया था।
भारत और चीन के संबंधों का दूसरा पहलू यह भी है कि दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार लगातार बढ़ता जा रहा है। 2025 के आंकड़ों के अनुसार दोनों देशों का व्यापार 155 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। 2025 में ही इसमें 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। भारत का भी चीन को निर्यात बढ़ रहा है, चाहे कि चीन के साथ भारत का समूचा व्यापार घाटे वाला है। भारत चीन से अधिक वस्तुएं लेता है,जबकि भारत से चीन को कम वस्तुएं भेजी जाती हैं। पिछले वर्ष भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ त्यानजिन में हुई भेंट के बाद दोनों देशों के संबंधों में काफी सुधार देखा गया है। भारत और चीन के बीच सीधी हवाई उड़ानें शुरू करने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। चीनी कम्पनियों को भारत में निवेश करने की भी भारत द्वारा छूट दी जा रही है। कई सीमांत दर्रों से सीधा व्यापार शुरू करने संबंधी बातचीत भी चल रही है, परन्तु इस सब कुछ के बावजूद चीन दोनों बड़े पड़ोसी देशों के बीच सुधर रहे संबंधों के महत्त्व को समझने के स्थान पर अविश्वास बढ़ाने वाली कार्रवाइयां करके सुधर रहे संबंधों को भारी आघात पहुंचा रहा है।
इस समय जबकि अमरीका-इज़रायल के ईरान के साथ संबंध बेहद खराब चल रहे हैं और इसी कारण पूरे विश्व में तेल और गैस की किल्लत पैदा हो रही है, पूरे विश्व में महंगाई बढ़ती जा रही है। उधर रूस और यूक्रेन के बीच भी लगातार युद्ध चल रहा है तो ऐसे हालात में यह बेहद ज़रूरी है कि चीन जैसा बड़ा देश न केवल अपने पड़ोसी देशों के साथ अपितु विश्व स्तर के युद्धों को रोकने और भिन्न-भिन्न देशों के संबंधों में स्थिरता और सुधार लाने के लिए सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए आगे आए। महा-शक्तियां सिर्फ अपने आर्थिक बल और हथियारों के दम पर नहीं बनतीं, अपितु महा-शक्तियों को सही अर्थ में विश्व भर में अमन-सद्भावना और आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के लिए अहम भूमिका अदा करनी चाहिए। इस प्रकार ही कोई बड़ा देश विश्व स्तर पर अपनी सकारात्मक छवि बना सकता है।

