दालों का उत्पादन बढ़ाने में अहम योगदान दे सकती है मूंग
भारत को अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में पंजाब का प्रभावशाली योगदान रहा है। पंजाब दूसरे राज्यों की तुलना में केंद्रीय अनाज भंडार में गेहूं और चावल अधिक देता है। भारत अपनी खपत के लिए दालें बाहर से आयात करता है। पंजाब में गेहूं-धान का फसली चक्र प्रमुख होने के कारण सब्ज़ क्रांति के बाद दालों का उत्पादन कम होता गया। 1970-71 में पंजाब में दालों की काश्त का रकबा 413.7 हज़ार हेक्टेयर था, जो अब कम होकर 33.5 हज़ार हेक्टेयर पर आ गया है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश और कर्नाटक दालों के उत्पादन में अग्रणी राज्य हैं। पंजाब में मुख्य रूप से मूंग का उत्पादन होता है। थोड़े-से रकबे में मांह और अरहर की काश्त होती है। गेहूं-धान के फसली चक्र में कम समय लेने वाली गर्म ऋतु की मूंग की काश्त अधिक होने लग पड़ी है। चाहे इसकी बुआई का उचित समय 20 मार्च से 10 अप्रैल तक है, लेकिन किसान गेहूं की कटाई के बाद इसकी आजकल भी बुआई कर रहे हैं।
देर से बुआई का एकमात्र खतरा यह है कि अगर फसल पकने से पहले बरसात शुरू हो जाए तो पूरा उत्पादन नहीं मिलता। अमलोह के निकट धर्मगढ़ गांव के पीएयू सम्मानित प्रगतिशील किसान बलबीर सिंह जड़िया, जो कई वर्षों से गेहूं की कटाई के बाद गर्म ऋतु की मूंग की बुआई करते आए हैं, कहते हैं कि इस हालत में यह हरी खाद का काम करती है।
अगली धान-बासमती की फसल को यूरिया की कम ज़रूरत होती है। लगभग 25 फीसदी यूरिया की बचत होती है। अगर इस गर्म ऋतु की मूंग को आलू, गन्ना या मटर के बाद बोया जाए तो मूंग को कोई खाद डालने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं पड़ती। वैसे इसे 11 किलो यूरिया और 100 किलो सिंगल सुपरफॉस्फेट प्रति एकड़ की ज़रूरत होती है। पानी की बचत और मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए भी गर्म ऋतु की मूंग की काश्त फायदेमंद है। इसकी तुलना में यदि इसी समय के दौरान बसंत ऋतु की मक्की बोई जाए तो उसकी पानी की ज़रूरत बहुत ज्यादा है। मक्की को 13,500 क्यूबिक लीटर पानी की ज़रूरत होती है, जबकि गर्मी के मौसम की मूंग की सिंचाई के लिए 3000 क्यूबिक लीटर पानी की ज़रूरत होती है। अब पंजाब में हर वर्ष पानी का स्तर नीचे जा रहा है। इसलिए पानी बचाने के लिए गर्म ऋतु की मूंग की काश्त धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसें 3-5 बार पानी देने की ज़रूरत होती है। आखिरी पानी 50 दिन बाद देकर इसकी सिंचाई बंद कर देनी चाहिए। सही सिंचाई से मूंग का उत्पादन बढ़ेगा और फलियां एक समान पकेंगी। गर्म ऋतु की मूंग लगाने का एक फायदा यह भी है कि किसान 15-20 जून से पहले अगेता धान नहीं लगा सकेंगे। इससे पानी की बचत होगी। गर्म ऋतु की मूंग को पकने में 60-62 दिन लगते हैं।
पीएयू की सिफारिशों के अनुसार कम नमी की हालत में गेहूं के नाड़ वाले खेतों में मूंग को हैप्पी सीडर या स्मार्ट सीडर से बोने के बाद पानी लगाकर सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। अधिक नमी वाले खेतों में अगर गेहूं का नाड़ हो तो इसकी स्मार्ट सीडर या सुपरसीडर से बुआई की जा सकती है। धान-गेहूं के फसली चक्र में गर्म ऋतु की मूंग एक उचित फलीदार फसल है, जबकि इस मौसम में बोई जाने वाली अन्य फसलें जैसे सूरजमुखी, गन्ना और अन्य चारा फसलों आदि को इसके मुकाबले ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है। पीएयू द्वारा सिफारिश की गई एसएमएल-1827 किस्म का औसत उत्पादन 5 क्ंिवटल प्रति एकड़ है। इसके मुकाबले दूसरी सिफारिश की गई किस्मों टीएमबी-37 का उत्पादन 4.9 क्ंिवटल, एसएमएल-832 का 4.7 क्ंिवटल और एसएमएल-668 का उत्पादन 4.5 क्ंिवटल प्रति एकड़ है। अब मंडी में निजी कम्पनियों द्वारा विजेता गोल्डन, बंसी गोल्डन और सरताज-44 जैसी किस्मों का बीज भी बेचा जा रहा है। अधिक उपज लेने के लिए पंक्तियों के बीच की दूरी 22.5 से.मी. और पौधों के बीच की दूरी 7 से.मी. होनी चाहिए। जीरो-टिल ड्रिल या हैप्पी सीडर के साथ 4.6 से.मी. गहरी बुआई करनी चाहिए और प्रति एकड़ 12 किलो बीज का इस्तेमाल करना चाहिए। गेहूं की कटाई के बाद गर्म ऋतु की मूंग की बुआई के समय प्रति एकड़ 11 किलोग्राम यूरिया, 16 किलोग्राम फास्फोरस डालना चाहिए। आलू के बाद बोई जाने वाली मूंग की फसल को कोई खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती। मूंग में नदीनों की बड़ी समस्या आती है। फसल को नदीनों से मुक्त रखने के लिए एक या दो बार गुडाई करनी चाहिए। पहली गुडाई बुआई के चार सप्ताह बाद और दूसरी उसके दो सप्ताह बाद (यदि आवश्यक हो)। जब फसल की 80 प्रतिशत फलियां पक जाएं तो कटाई कर लेनी चाहिए।
पंजाब में दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए मूंग एक अहम फसल है। हवा से नाइट्रोजन लेकर यह भूमि की उपजाऊ शक्ति भी बढ़ाती है। अन्य दालों के मुकाबले अधिक गर्मी को सहन कर लेती है। गर्म ऋतु की इस फसल में थ्रिप, फली छेदक सुंडी, तम्बाकू सुंडी का हमला अधिक होता है। इन बीमारियों के हमलों को नियंत्रित करने के लिए पीएयू के विशेषज्ञों की सिफारिशों को अपनाना चाहिए।



