चौरस कुर्सियों पर गोल लोग
हो सकता है, आपको यह शीर्षक समझ न आया हो, लेकिन हमें तो आज की दुनिया का यह चलन ही समझ में नहीं आया। हर ओर लगता है कि जिन्हें जहां नहीं होना चाहिए, वे वहां पर ही कब्ज़ा जमाये बैठे हैं। अपने आपको महान लोकतांत्रिक कहते हैं, लेकिन उनका व्यवहार ऐसा है कि जिससे हिटलर शाही भी शरमा जाये। उनका व्यवहार और बातें आदर्शवादिता से भरी हुई हैं। वे जनता को अपना शासक कहते हैं, लेकिन जनता की तरक्की की पगडंडी उनके पद-दलन से ही हो कर जाती है। बन्द गलियों के आखिरी मकानों तक वे ज़िन्दगी की नई रौशनी को पहुंचा देने का दावा करते हैं, लेकिन रौशनी की तलाश और इंतज़ार करते हुए ये आखिरी मकान आज भी उसी तरह अंधेरे में डूबे हुए हैं। नई पुरानी रौशनियों का पूरा आधिपत्य उन्हीं बहुमंज़िला इमारतों तक सिमट कर रह गया है, जिन्होंने निजी क्षेत्र के त्वरित विकास के नाम पर कल के सामन्तवादियों के भव्य प्रासादों की जगह ले ली है।
ये कुर्सियां तो चौरस हैं, योग्य को उन तक पहुंच सकने का हर दम आमन्त्रण देती हुईं, लेकिन उन पर गोल चेहरों वाले मठाधीश चोर सुरंगों से विजय प्राप्त करके आये, और जम कर बैठ गये। सत्ता के विकेन्द्रीकरण के नारे लगाने के बावजूद उनका कोई इरादा इस विकन्द्रीकरण की सार्थकता को अपने कुनबे से आगे जाने देने का नहीं है। राजनीति से लेकर सामाजिक जीवन तक ये नये खून की आमद के स्वागत का इरादा करते हैं, क्योंकि उन्हें अपने बेटे, नाती, पौत्र जवान होते हुए दिखाई देते हैं, और वे हर दम इनका स्वागत करने की प्रेरणा जनता जनार्दन को देते रहते हैं। उनका दावा है कि शासन की योग्यता शासक के खून में होती है, और भीख मांगने की योग्यता भिखारी के खून में। इसलिए जो भिखारी है, उसकी सन्तान को महा-भिखारी हो जाने दो, और दो-चार शासन पारियों के बाद उनकी रगों में तो शासक का खून दौड़ने लगा है, इसलिए युवा राधिर की तलाश में उनकी सन्ततियों को ही एकमात्र विकल्प मानिये। उन्हें उनके बाद इन चौरस कुर्सियों पर स्थापित कीजिये। लेकिन खबरदार, अगर इसे परिवारवाद कहा। ऐसी मध्यवर्गीय चिन्ता की भाषा वंचितों, प्रवंचितों तक ही रहने दो। स्थापित लोगों की भाषा अलग होती है, और उनका जीवन दर्शन भी अलग, जिसे इस देश के अधिकांश फुटपाथी लोग कभी समझ नहीं सकते।
सच, इनके व्यवहार को हम कभी समझ नहीं पाएंगे। विश्व स्तर पर देख लीजिये। अपने आपको दुनिया के सबसे सभ्य, अमीर और शांति का मसीहा बनने की इच्छा रखने वाला एक ताकतवर मसीहा कमज़ोर देश पर बम बरसा कर शान्ति के पैगाम भेजता है, और उसके लिए नोबल पुरस्कार मांगता है। सत्ता की चौरस कुर्सी पर इस गोल व्यक्तित्व का व्यवहार चाहे एक सड़क छाप गुण्डे का है, लेकिन वह इसे अपनी बुद्धि की पराकाष्ठा कह कर आपसे सिर झुकाने की आशा करता है। युद्ध करता है तो वह शांति वार्ता के पैगाम भेजता है, लेकिन अपनी ओर से बारूदी मिसाइल चलाते हुए।
आपकी मौत और तबाही उसके शांति प्रयासों की पहचान है। हर पल उसे अपनी जीत की घोषणा करनी है, और आपको उसकी उस डील को स्वीकार करना है, जिस पर शीर्षक है, ‘चित्त भी मेरी और पट्ट भी मेरी।’ आपको डील स्वीकार नहीं तो आप मानवता के हत्यारे हैं और तबाही के ज़िम्मेदार हैं। भुगतिये नतीजा! हम तो आपके बाद अपने शांति अभियान का विस्तार करते ही रहेंगे। कमज़ोर परन्तु प्राकृतिक धन से भरपूर देशों को अपनी राजगद्दी के समक्ष समर्पण का सन्देश देंगे। नहीं माने तो फिर उनके भाग्य में तबाही है। भले, भाग्य का लिखा कोई मिटा नहीं सकता, चित्रगुप्त की लेखनी छीन कर तेरा अभागा भाग्य लिखते हुए हम कहते हैं।
लेकिन चित्रगुप्त की लेखनी छीन कर आपका अंधेरा भाग्य क्या महाबली देश ही लिखते हैं? आपके देश, समाज, नगर, मोहल्ले के महाबली भी तो दिन-रात यही करते हैं। यहां सब चौरस कुर्सियों पर इन गोल व्यक्तित्वों का पुश्तैनी अधिकार है। थाना-कचहरी से लेकर, निगम कमिश्नरी तक इन्हीं लोगों का एकाधिकार है, जो हर सुविधा केन्द्र को आपके लिए असुविधा केन्द्र बना देते हैं, और फिर चिल्लाते हैं, ‘देखो हमने इनके लिए लालफीताशाही को खत्म कर दिया।’ अपनी हरी कलमों के नज़रानों को ज़िन्दा कर दिया, अब ये भी नज़राने के बिना चलती नहीं।
हमारे जीवन संघर्ष का अब एक ही उद्देश्य है कि हम अपने शासन में भ्रष्टाचार को शून्य स्तर पर भी सहन नहीं करेंगे। तभी तो देखो, हमारे देश ने अभी भी महा-भ्रष्टाचारी होने का रुतबा नहीं खोया। हमारा शासन सफलता की एक अनुकरणीय कहानी है। तभी तो इतनी जल्दी हमने महंगाई पर नियन्त्रण कर लिया कि लोग अब गैस का सिलेण्डर प्रयोग करने की जगह लकड़ियों और उपलों से खाना बनाने की ओर वापस लौट गये हैं। हमने बेकारों में सस्ता लंगर बांट कर बेकारी की समस्या खत्म कर दी है। अब बेकारी समस्या का निदान करने वाली खिड़कियों पर भीड़ नहीं लगती। सस्ती रेवड़ियां और राशन बांटने वाली दुकानों पर भीड़ लगती है। यह अनन्त काल तक लगेगी। विश्वास रखिये, क्यों कि हम परम्पराओं का पालन करने वाला देश हैं, और हमारे देश की संस्कृति में उदारता एक मूल धारणा है।



