पंजाब की मिट्टी को नई ज़िंदगी देता गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर का विज़न 

आज विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष

लुधियाना की उस महिला में, जिसने दुबई का सुख-सुविधाओं से भरा जीवन छोड़कर अपने बचपन के स्वप्न को साकार किया, और उस पूर्व मर्चेंट नेवी कप्तान परमवीर सिंह में क्या समानता है, जिन्हें ‘मिलिनेयर फार्मर ऑफ इंडिया’ सम्मान प्राप्त हुआ? इन दोनों को जोड़ता है एक ऐसा आंदोलन, जिसकी शुरुआत आज से 45 वर्ष पूर्व हुई थी।
जब लुधियाना के अधिकांश लोग सुबह की चाय पी रहे होते हैं, तब तक 56 वर्षीय डिमिंदर कौर कपूर अपनी ज़मीन पर एक घंटे से अधिक समय बिता चुकी होती हैं जो कभी बंजर और सूखी हुई थी। इस 2.5 एकड़ भूमि पर वह सूरज के उगने से पहले ही नींबू के वृक्षों और अरहर के नये निकले पौधों के बीच काम करती दिखाई देती हैं।
होशियारपुर में इसी ज़मीन पर 43 वर्षीय कैप्टन परमवीर सिंह भी दिन चढ़ने से पहले अपने 15 एकड़ के खेत में जुट जाते हैं। वर्ष के छह माह वे मर्चेंट नेवी के कप्तान के रूप में समुद्र की कठिन और मानसिक चुनौतियों का सामना करते हैं और शेष छह माह अपनी धरती की सेवा में समर्पित रहते हैं।
वह कहते हैं- ‘हमारी खेती पुश्तैनी है,’ किन्तु उनके लिए यह केवल परम्परा नहीं, एक पवित्र आह्वान भी है, जिसे वह हर समुद्री यात्रा जितनी ही गम्भीरता से निभाते हैं।
ये दो भिन्न जीवन-कथाएं हैं, परन्तु एक सूत्र में बंधी हुईं हैं। वह सूत्र है आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन द्वारा प्रेरित प्राकृतिक खेती का वह अभियान, जिसने अब तक तीस लाख से अधिक किसानों के जीवन को स्पर्श किया है।
मूल संकट और समाधान : भारत की हरित क्रांति का जनक पंजाब, आज उसी कृषि पद्धति के कारण गंभीर संकट से जूझ रहा है, जिसने कभी उसे समृद्ध बनाया था। राज्य के लगभग 75 प्रतिशत ब्लॉक भूजल दोहन की दृष्टि से अति-शोषित घोषित किए जा चुके हैं, और जलस्तर निरंतर नीचे जा रहा है।
पर्यावरणीय संकट के साथ-साथ जनस्वास्थ्य की चिंताएं भी गहरी हैं। पंजाब के मालवा क्षेत्र के अनेक भागों में कैंसर की दर प्रति एक लाख जनसंख्या पर 100-110 तक दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। विभिन्न अध्ययनों में इसका संबंध रासायनिक खेती और प्रदूषित जल के दीर्घकालिक प्रभावों से जोड़ा गया है। अनेक ज़िलों के भू-जल में नाइट्रेट, आर्सेनिक तथा भारी धातुओं की मात्रा स्वीकृत सीमा से अधिक पाई गई है।
कृषि स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। बढ़ती हुई लागत, मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, घटती उपज तथा खाद-रसायनों पर बढ़ती निर्भरता ने अनेक किसानों को ऋण-जाल में धकेल दिया है। गेहूं-धान की एकरूपी खेती, जो भू-जल दोहन और रासायनिक निवेश पर आधारित है, अब अस्थिर सिद्ध हो रही है।
ऐसे समय में गुरुदेव श्री श्री रविशंकर तथा आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा दशकों से किया जा रहा किसानोन्मुख कार्य एक आवश्यक सुधार के रूप में सामने आता है। संस्था की पहल का केन्द्र है, इनपुट लागत में कमी, भूमि की उर्वरता की पुनर्स्थापना, और प्राकृतिक उपायों का प्रसार। इसके अंतर्गत जीवामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र जैसे घरेलू जैविक घोल, बहु-स्तरीय खेती तथा अंतरफसली पद्धति जैसे प्रकृति-सम्मत उपाय अपनाए जाते हैं। यह बात विशेष रूप से पंजाब में प्रासंगिक है, जहां अधिक इनपुट वाली खेती ने मुनाफे और मिट्टी की उर्वरता, दोनों को ही कमज़ोर कर दिया है।
गुरुदेव ने कहा है- ‘जो किसान यह मानते थे कि भरपूर उपज केवल यूरिया और कीटनाशकों से ही संभव है, उन्होंने अब अनुभव किया है कि वही भूमि इनके बिना भी पुनर्जीवित होकर लाभकारी बन सकती है।’
आज ये विधियां भारत भर में तीस लाख से अधिक किसानों तक पहुंच चुकी हैं। साथ ही 75 से अधिक नदियों और सहायक नदियों का पुनर्जीवन तथा विश्वभर में 10 करोड़ वृक्षारोपण भी इस अभियान का अंग है।
जब प्राकृतिक खेती का स्वप्न साकार हुआ
डिमिंदर कौर कपूर ने सदैव प्रकृति के निकट जीवन जीने का स्वप्न देखा था। दुबई और मस्कट में अध्यापन करते हुए यह इच्छा वर्षों तक उनके मन में ही रही।
वह कहती हैं- ‘उस पाठ्यक्रम ने मेरे स्वप्न को दिशा और गति दी। तभी हमने भूमि खरीदने का निर्णय लिया।’
वह बेंग्लुरु स्थित आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम गईं। वहां व्यावहारिक प्रशिक्षण लिया। फिर लुधियाना लौट कर भूमि खरीदी। परिजन और पड़ोसी संशय में थे, किन्तु उन्होंने अपना मार्ग नहीं छोड़ा।
कैप्टन परमवीर सिंह की यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही। लगभग 2016 में प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण के साथ उन्होंने बेंग्लुरु स्थित आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर में सुदर्शन क्रिया सीखी। भीतर का यह परिवर्तन और खेती का रूपांतरण साथ-साथ आगे बढ़े।
परिश्रम का फल- कपूर की खेती के आरम्भिक दिन सरल नहीं थे। खरपतवार, वर्षा और तेज़ हवा से फसलें नष्ट हुईं। छोटे-छोटे भागों में खेती करने से हानि सीमित हुई और सही समय पर खेती करने से नुकसान कम हुआ। भूमि विवाद ने भी उनकी कठिनाई को बढ़ाया।
चार वर्षों में जहां कभी सूखी भूमि थी, वहां अब पांच सौ से अधिक वृक्ष खड़े हैं, जिनमें सौ से अधिक नींबू के वृक्ष हैं। साथ ही अमरूद, अनार, अंजीर, आलूबुखारा और नाशपाती भी हैं। वे गेहूँ, बाजरा, चना, मूंग, अरहर और मौसमी सब्जियां उगाती हैं। स्वयं कोल्ड-प्रेस्ड सरसों का तेल बनाती हैं और पिछले वर्ष पहली बार धान की फसल भी उगायी जिसमें रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का कोई उपयोग नहीं किया। वह कहती हैं ‘स्वाद अधिक प्राकृतिक है, थोड़ा मधुर भी।’

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