होर्मुज की नाकाबंदी से तेल की भांति गहरा सकता है खाद संकट
होर्मुज पूरी तरह कब खुलेगा, पता नहीं। दुनिया ऊर्जा और तेल संकट का दुखड़ा रो रही है जबकि संयुक्त राष्ट्र के ‘विश्व खाद्य कार्यक्रम’ ने चेतावनी दी है कि अगर दो महीने में होर्मुज जलडमरूमध्य नहीं खुला, तो विश्व के 30 करोड़ लोग जो पहले से ही दाने-दाने को मोहताज हैं, उनमें साढ़े चार करोड़ लोग और जुड़ जाएंगे। पश्चिम एशिया का यह संघर्ष युद्ध क्षेत्र से बाहर एक धीमी रफ्तार वाली तबाही का खतरा निर्मित कर रहा है। एक थिंक टैंक, काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के माइकल वेज़र् के अनुसार यह ‘धीमी गति से चलने वाली अकाल मशीन’ है। उस पारंपरिक अकाल के विपरीत, जिसमें भूख किसी एक देश या खास जगह तक ही सीमित रहती है, इस बार यह तकरीबन पूरी दुनिया को चपेट में लेगी। जर्मनी के एक थिंक-टैंक कील इंस्टीच्यूट के जूलियन हिंज़ के मुताबिक भले ही युद्ध कल समाप्त हो जाए, होर्मुज खुल जाए, तब भी बहुत ज्यादा नुकसान पहले ही हो चुका है। संयुक्त राष्ट्र के ‘विश्व खाद्य कार्यक्रम’ का अनुमान है कि होर्मुज के रास्ते में इतनी खाद्य सामग्री फंसी हुई है, जिससे 40 लाख लोगों का एक महीने तक पेट भरा जा सकता है। चिंता इस खाद्य सामग्री से कहीं ज्यादा बड़ी और आगे की है।
दुनिया के उर्वरक व्यापार का तकरीबन 30 प्रतिशत होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुज़रता है। डेटा उपलब्ध कराने वाली कम्पनी केप्लर कहती है कि होर्मुज में जो लगभग 20 लाख टन उर्वरक फंसा हुआ है, वह 2024 में इस रास्ते भेजे गए कुल उर्वरक का 12 प्रतिशत है। यूरिया के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का 30-35 प्रतिशत और अमोनिया का लगभग 20-30 प्रतिशत हिस्सा यहीं से आता है। ये दोनों ही बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले उर्वरक हैं। यही नहीं, कतर की सरकारी फर्टिलाइजर कंपनी जो अकेले दुनिया का 14 प्रतिशत यूरिया बनाती है, एक महीने से ज्यादा समय से बंद पड़ी है। दूसरे आपूर्तिकर्ता इस कमी को पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं। संसार का दूसरा सबसे बड़ा खाद निर्यातक देश चीन अपनी घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए निर्यात में कटौती कर चुका है। नेचुरल गैस की कमी के चलते कई देशों में उर्वरक उत्पादकों को अपना उत्पादन कम करना पड़ रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से यूरिया और अमोनिया की कीमतें वैश्विक स्तर पर क्रमश: 40 से 65 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। उत्तरी गोलार्ध और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इस समय बुवाई का मौसम चल रहा है। वहां त्राहिमाम मचा हुआ है।
अफगानिस्तान ने यूरिया के बैग की बढ़ती कीमत के चलते उसका इस्तेमाल ही छोड़ दिया है। अमरीका में अधिकतर किसान ज्यादा खाद की ज़रूरत वाले मक्का को छोड़कर कम उर्वरक की आवश्यकता वाले सोयाबीन उपजाने की सोच रहे हैं। यूरोप की खेती में भी इसी तरह का बदलाव दिख रहा है। जाहिर है। होर्मुज में फंसी 20 लाख टन खाद जल्द बाहर नहीं निकली, तो फसलों को सही वक्त पर पोषण नहीं मिल पाएगा। पैदावार गिर जाएगी, कीमतें बढ़ेंगी और शहरों में रहने वाले गरीब खाली पेट रह जाएंगे। हमारे देश के अधिकतर किसान मानसून के बाद अगली फसल की बुवाई करेंगे, तो उर्वरक की मांग चरम पर होगी। किल्लत और कालाबाजारी दोनों का खतरा है। सो फास्फेट, यूरिया, अमोनिया इत्यादि की आपूर्ति बाधित होना तय है। किसान खाद का इस्तेमाल एक तय समय में करता है। उस समय वह उपलब्ध न हुई तो मामला बिगड़ जायेगा। तेल की तरह, उर्वरक के भंडार की कोई वैश्विक व्यवस्था मौजूद नहीं है। हम आम तौर पर दो महीने का उर्वरक स्टॉक रखते हैं, पर आपात स्थिति में कालाबाजारी इस राहत को सांसत में बदल देगी।
फिर लंबे संकट के लिए यह सुरक्षा कवच बहुत कमजोर है। असल में हमारी निर्भरता इस क्षेत्र पर चिंताजनक रूप से अधिक है। हम वार्षिक लगभग 20 करोड़ टन उर्वरक का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें यूरिया, डीएपी, एनपीके आदि शामिल हैं। हम यूरिया उत्पादन ठीक ठाक मात्रा में करते हैं। फिर भी अपनी ज़रूरत के उर्वरक का 40 प्रतिशत बाहर से ही मंगाते हैं। फॉस्फेट और पोटाश के मामले में हमारी आयात निर्भरता 80 से 90 प्रतिशत तक है। इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब, कतर, ओमान द्वारा होर्मुज मार्ग से ही आता है। यहां तक कि 50 से 60 प्रतिशत आयातित उर्वरक या उसका कच्चा माल इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। देश में बनने वाले उर्वरकों के लिए जो कच्चा माल चाहिये जैसे फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया, एलएनजी, वह भी आयातित होता है। मतलब उर्वरक और खास तौर पर यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भर दिखने के बावजूद इनपुट स्तर पर हम दूसरों पर निर्भर हैं। यूरिया बनाने के लिए बाहर से एलएनजी न मिले तो सब ठप्प।
होर्मुज में व्यवधान से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में उर्वरकों और उसके घटकों के दाम ड्योढ़े हो चुके हैं। जैसे राज्यों के चुनावों के नतीजे तक तेल के दाम को नहीं छेड़ा गया है, उसी तरह सरकार से उम्मीद है कि वह सब्सिडी को जारी रखते हुए इसकी खुदरा कीमतें नियंत्रित रखे, लेकिन वास्तविक लागत को बढ़ने से वह रोक नहीं सकेगी। तिस पर अगर डीजल के दाम बढ़े तो यह खेती के लिए और भी दुष्प्रभावी होगा। संकट लंबा खिंचा तो खरीफ सीजन के दौरान खाद की कीमतें सवाया हो सकती हैं या फिर सरकार को भारी सब्सिडी का बोझ उठाना पड़ेगा।
संभव है कि उर्वरक महंगे या उनका मिलना मुश्किल हो तो किसान कम उर्वरक वाली फसलों जैसे दालें, मोटे अनाज की बुवाई ज्यादा कर सकते हैं। यह बदलाव दीर्घकाल में सकारात्मक हो सकता है, लेकिन तात्कालिक तौर पर गेहूं, चावल जैसी मुख्य फसलों की उपज 5 से 10 प्रतिशत तक गिरी तो हमें कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और ब्राजील से दालों या तिलहन का आयात बढ़ाना पड़ेगा। संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है यूरोप, अफ्रीका और एशिया के कई देश जो खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर हैं, समान दबाव झेल रहे हैं तो आयात भी महंगा होने वाला है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



