युद्ध के भंवर से बाहर निकलें कैसे
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान पर हमला तो कर दिया परन्तु वर्तमान दौर में जब उनके फंस जाने की स्थिति सामने आ रही है और उनके अपने देश अमरीका में भी इस युद्ध को बेवजह की मुसीबत माना जाने लगा था, तो चाहकर भी उनका युद्ध से बाहर निकलना कठिन होता चला जा रहा है।
आज युद्ध की सूरत और सीरत पूरी तरह बदल चुकी है। पहले दिनों में संघर्ष की बुनियाद दो ही चीज़ों पर थी- शांति या युद्ध, विजय या पराजय। अब यह धारणा विलीन होती जा रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध में अभी तक न कोई जीता, न कोई हारा। आज के युद्ध शायद ही मुकम्मल जीत तक पहुंच पाते हैं। इसकी जगह देश या दूसरे नॉन स्टेट समूह संघर्ष से स्थिति जन्य मुनाफा, रणनीतिक बढ़त और मानसिक दबाव बनाने की कोशिश में रहते हैं। विनाश के लिए भी एक सीमा तक जाते हैं, उसे पार इसलिए नहीं करते कि फिर सम्भलना मुश्किल हो सकता है। ईरान युद्ध में यह सब आसानी से देखा जा सकता है। अस्पष्टता है परन्तु इसे भी हथियार बनाया जा रहा है। ट्रम्प तो हर दिन बयान बदल लेते हैं, जिसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि वह भ्रम में रखना चाहते हैं। अस्पष्टता जैसे सोचा समझा हथियार हो। इस बदलाव के पीछे संरचनात्मक तथ्य देखे जा रहे हैं। परमाणु हथियारों के कारण शक्तियों को सावधानी से चलना पड़ता है। आपसी आर्थिक निर्भरता भी एक कारण हो सकता है। सूचना विस्फोट के कारण सोशल मीडिया युद्ध का मैदान हो जाता है। तकनीकी विकास की युद्ध में अपनी भूमिका हो गई है। पारम्परिक युद्ध में अधिकांश सीमित अर्थवता का घेराव होता था- जैसे साइबर घुसपैठ, प्रॉक्सी वार (जैसे पाकिस्तान ने भारत को उलझाये रखने की कोशिश की), आर्थिक दबाव, विश्व स्तर पर निंदा प्रस्ताव (जो पाकिस्तान करता रहा है) लेकिन अब तक भारी बदलाव आ चुका है।
मौजूदा दौर में स्पष्ट जीत प्राप्त करना कठिन लगता है। आप रूस-यूक्रेन युद्ध की हालत देख लें। यह युद्ध अभी तक पारम्परिक सैन्य टकराव के बावजूद परमाणु धमकियों, प्रतिबंधों, साइबर अपराधों से बनते व्यापक स्थिर ज़ोन में असर हुआ है। कोई भी देश पूरी सफलता का दावा नहीं पेश कर पाया। गाज़ा, लेबनान और यमन के संघर्षों मेें यही कहानी नज़र आएगी। इज़रायल ज़बरदस्त सैन्य उच्चता का देश है लेकिन अभी तक निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच पाया, क्योंकि हूती जैसे ग्रुप सस्ते ड्रोन और मिसाइल के हमलों से लाल सागर के मुख्य समुद्री रास्तों को बाधित कर रहे हैं। अब कमज़ोर प्रतिद्वंद्वी पूरी जीत का जश्न नहीं मना रहे। वे टिके रहने, बाधा बनते रहने में ही अपनी जीत समझने लगे हैं।
कमज़ोर देशों ने भी अब तकनीक के प्रसार और प्रॉक्सी वार करने की क्षमता को हासिल कर लिया है। ड्रोन प्रहार, साइबर टुल्ज़, स्टीक मार करने वाली मिसाइलों के दम पर क्षमताओं को विस्तार दिया है। उन्हें भी पता है कि युद्ध जीत सकने की क्षमता-ताकत उनमें नहीं है, परन्तु वे मजबूत प्रतिद्वंद्वियों को एक सफल परिणाम तक पहुंचने में बाधक तो बने रह सकते हैं। इस सबसे एक नई रणनीतिक स्थिति पैदा हुई जान पड़ती है-बिना जीत हासिल किये दूसरे को न जीतने देना।



