स्कूलों में डम्मी एडमीशन पर रोक लगाने हेतु शिक्षा विभाग ने दिखावे के तौर पर फिर किया पत्र जारी


संगरूर, 13 जून (धीरज पशौरिया): देश में मैडीक्ल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई भाव डाक्टर और इंजीनीयर बनने के लिए ली जाती चुनाव परीक्षाओं में मुकाबला बहुत सख्त होने के कारण देश में ज्यादातर विद्यार्थी 11वीं और 12वीं की पढ़ाई के लिए कोचिंग का सहारा लेते हैं। दिन में पांच छ घंटे इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ाई करने वाले यह विद्यार्थी एक जगह ही जा सकेंगे या स्कूल या कोचिंग सैंटर, क्याेंकि मैडीक्ल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिला लेने के लिए होती परीक्षाओं के लिए मैडीकल और दान मैडीक्ल गु्रप में बाहरवीं की परीक्षा किसी मानता प्राप्त बोर्ड से पास करनी जरूरी होती है। मैडीक्ल या नान मैडीक्ल में बाहरवीं रैगूलर ही हो सकती है। इसलिए इन शर्तो को पृरी करने के लिए डाक्टर और इंजीनियर बनने के चाहवान विद्यार्थियों के माता-पिता इन विद्यार्थियों के दाखिले स्कूलों खास कर कुछ निजी स्कूलों में करवाते है जहां इनको वार्षिक परीक्षा देने के लिए ही जाना पड़ता है। इस प्रक्रिया को डम्मी एडमिशन कहा जाता है जो शिक्षा प्रणाली की अब प्रथा बन चुकी है जिसको रोकने के लिए शिक्षा विभाग द्वारा 2013 से राज के ज़िला शिक्षा अधिकारियाें को एक पत्र जारी किया जा रहा है जिसमें कहा जाता है कि ज़िला शिक्षा अधिकारी अपने अधीन आते सभी स्कूलों को आदेश जारी करें कि विद्यार्थियों को डम्मी एडमिशन देने से पूर्ण पाबंदी है। इसलिए इंस्पैक्टशन कमेटियां बनाकर स्कूलों में भेजा जाए ताकि स्कूलों में चैक करने कि दाखिल विद्यार्थी रैगूलर आ रहे है या नहीं।  उल्लंघना करने वाले स्कूल मुख्य खिलाफ कार्रवाई की जाए। असल में यह पत्र सिर्फ दिखावे के तौर पर जारी की जाती है अमली तौर पर कुछ भी नहीं होता। इस बारे में जब शिक्षा विभाग के एक जिम्मेवारी अधिकारी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि किसी भी सरकारी स्कूलों में डम्मी एडमिशन करने का कोई भी पिं्रसीपल रिस्क नहीं लेता, जो डम्मी एडमिशन होते है वह निजी स्कूलों में ही होते है जो एक प्रथा बना चुकी है जिसको रोकना असंभव है। एक स्कूल के प्रिंसीपल का इस संबंधी कहना है कि मैडीक्ल और इंजी: कॉलेजों के दाखिले के लिए जो उच्च स्तर की परिक्षाए लगाई जाती उनके लिए विद्यार्थियों को योग बनाने के लिए राज के ज्यादातर निजी और सरकारी स्कूलों के पास प्रबंध ही नहीं, परणिम स्वरूप माता-पिता को एडमिशनों का सहारा लेकर बच्चों को महंगे कोचिंग सैंटरों में भेजना पड़ता है।