आम बजट बनाने की प्रक्रिया में किसान नज़रअंदाज़ क्यों ?


देश का आम बजट तैयार करने के लिए केन्द्र सरकार ने अपनी तैयारियां शुरू की हुई हैं। गत दिनों इस संदर्भ में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल में शामिल अहम मंत्रियों तथा वित्त मंत्रालय से संबंधित अधिकारियों ने देश के उद्योगपतियों तथा अर्थशास्त्रियों के साथ क्रमवार दो बैठकें की थी। दिलचस्प बात यह है कि इस संबंध में हुई पहली बैठक में वित्त मंत्री सीतारमण को शामिल ही नहीं किया गया था। चाहे संसद में बजट उनके द्वारा ही पेश किया जाना है। 
इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस समय जबकि कृषि बहुत बड़े संकट से गुजर रही है, और उसका कुल घरेलू उत्पादन में हिस्सा सिर्फ 14 प्रतिशत रह गया है। परन्तु देश की 60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढंग से अभी भी कृषि पर निर्भर है। कृषि संकट इतना गम्भीर है कि हर रोज देश के अलग-अलग हिस्सों से किसानों तथा खेत मज़दूरों द्वारा आत्महत्याएं करने के समाचार आ रहे हैं। ऋण के जाल में फंसे किसान ऋण राहत और कृषि के धंधे को लाभदायक बनाने के लिए देश भर में आंदोलन करने के लिए मजबूर हो रहे हैं, तो भी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और उनके सलाहकारों ने नया बजट बनाने की प्रक्रिया में किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को किसी भी स्तर पर शामिल करना आवश्यक नहीं समझा। 
2014 से लेकर 2019 तक किसान अपनी मांगों और समस्याओं को लेकर लगातार आंदोलन करते रहे हैं। तमिलनाडु के किसान महीनों तक दिल्ली आकर जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे रहे। इसी तरह महाराष्ट्र में ग्रामीण क्षेत्रों से किसानों द्वारा मुंबई की तरफ बड़े मार्च किए गए। दिल्ली में भी देश भर से आए अलग-अलग किसानों ने अनेक बार रैलियां कीं और धरने दिए। इसके बावजूद प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी सरकार के पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल के दौरान एक बार भी देश के किसान संगठनों को बुलाकर उनकी मुश्किलें सुनने के लिए समय नहीं निकाला। हां, चुनावों के अंत में आकर इतना अवश्य किया गया कि प्रधानमंत्री किसान योजना अधीन ऐलान करके किसानों के खातों में वार्षिक प्रति किसान पहले तीन हज़ार रुपए और बाद में बढ़ाकर 6 हज़ार रुपए डालने का फैसला लिया गया  ताकि चुनावों में भाजपा को किसानों के गुस्से का शिकार न होना पड़े। इस वर्ष गत दिनों इसकी एक और किश्त किसानों के खातों में डालने के अवसर पर कर्नाटक में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक बड़ी रैली को सम्बोधित करते हुए इस तरह जताया जैसे प्रति किसान 6 हज़ार रुपए की सहायता राशि से ही किसानों की सारी समस्याएं और कृषि संकट का हल हो गया है। एक तरह से यह किसानों को मूर्ख बनाने और देश में चल रहे गम्भीर कृषि संकट को नज़रअंदाज़ करने का घटिया प्रयास है। 
सरकार का देश के गम्भीर कृषि संकट के बारे में रवैया इतना असंवेदनशील है, इसका पता इस बात से चल जाता है कि देश भर में हर वर्ष कितने किसानों द्वारा आत्महत्याएं की जाती हैं। इस संबंध में सरकार के पास सिर्फ 2016 के ही आंकड़े हैं। 2017 से लेकर 2019 तक के आज तक नैशनल क्राईम ब्यूरो ने आंकड़े ही जमा नहीं किए। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने लोकसभा के पिछले सत्र के दौरान इस संबंध में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए यह बताया है कि 2016 में 11,379 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं। इन आंकड़ों के अनुसार लगभग हर महीने 948 किसानों ने आत्मत्याएं कीं और हर रोज़ 31 किसानों द्वारा आत्महत्याएं की गईं। 1995 से लेकर 2016 तक देश में कुल 3 लाख 33 हज़ार 407 किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। इस तरह की गम्भीर स्थिति के बावजूद न तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली पूर्व सरकारों ने और न ही अब श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार द्वारा कृषि संकट को गम्भीरता से लिया जा रहा है। केन्द्र सरकारें यह समझने से भी असमर्थ रही हैं कि जब भी देश में बाढ़ आती हैं या सूखा पड़ता है, तो सबसे अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में किसान ही प्रभावित होते हैं। उनको अपने परिवारों के जानी और माली नुक्सान के अलावा फसलों का भी भारी नुक्सान सहन करना पड़ता है। चाहे श्री नरेन्द्र मोदी की पूर्व सरकार ने फसली बीमा की योजना बहुत जोर-शोर से शुरू की थी परन्तु उस योजना का लाभ भी अधिकतर बीमा कम्पनियों को ही हुआ है, जबकि किसानों को फसलों के नुक्सान का पर्याप्त मुआवज़ा नहीं मिल सका।
गत कई दशकों से कृषि के क्षेत्र में इस तरह की स्थितियां बनी हुई हैं कि किसानों को उनकी फसलों के लाभदायक मूल्य नहीं मिलते रहे, जबकि कृषि उत्पादन में काम आने वाली चीजों/वस्तुओं के मूल्य लगातार बढ़ते रहे हैं। जिस कारण किसानों की लागत तो लगातार बढ़ती रही परन्तु उनको बढ़ी हुई लागतों के अनुसार मूल्य नहीं मिले। चाहे श्री नरेन्द्र मोदी की पूर्व सरकार द्वारा यह दावा किया गया था कि उनकी सरकार स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार किसानों को उनकी लागत से डेढ़ गुणा अधिक मूल्य दे रही है, परन्तु व्यवहारिक रूप में यह दावा सही साबित नहीं हुआ था। कृषि अर्थशास्त्रियों ने तथ्यों सहित इस बात का खंडन कर दिया था कि किसानों को अभी भी उनकी लागत के अनुसार लाभदायक मूल्य नहीं मिल रहे। 
देश के बहुत सारे प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों ने यह चेतावनी दी है कि यदि कृषि का धंधा लगातार घाटे वाला बना रहता है तो देश खाद्य के मामले में भी आत्मनिर्भर नहीं रह सकेगा। उसको अनाज तथा अन्य खाद्य वस्तुएं भी बाहर से मंगवानी पड़ेंगी, जिस तरह कि कुछ दशक पूर्व देश मंगवाने के लिए मजबूर होता रहा है। हमारी राय के अनुसार कृषि का क्षेत्र सेना से भी अधिक महत्व रखता है। यह सही है कि सेना देश को भूगौलिक सुरक्षा मुहैया करती है, परन्तु सेना भी देश की सीमाओं पर तब ही पहरेदारी कर सकती है, यदि सेना के हर सिपाही को खाने के लिए पर्याप्त भोजन प्राप्त हो। कहने का तात्पर्य यह है कि भोजन के बिना सेना भी सीमाओं पर नहीं लड़ सकती। देश भर के लोगों को भोजन किसानों द्वारा ही मुहैया करवाया जाता है। इस ढंग से कृषि और किसान सेना से भी अधिक महत्व रखते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी किसी देश में खाद्य वस्तुओं की कमी हो जाती है तो लोग सड़कों पर उतर आते हैं। तोड़फोड़ तथा आगजनी की कार्रवाइयां शुरू हो जाती हैं। सरकारें तक बदल जाती हैं। अपने देश की ही बात ले लें तो प्याज और टमाटरों के मूल्य बढ़ने से ही देश में हंगामा खड़ा हो जाता है। 
अंग्रेज़ों के शासन के समय भी अनेक बार देश में अकाल पड़ते रहे थे और इन अकालों में लाखों लोगों की जानें चली जाती थीं। इसका श्रेय सरकारों के प्रयासों के साथ-साथ मुख्य तौर पर देश के किसानों को जाता है, जिन्होंने आज़ादी के बाद देश को खाद्य के मामले में आत्मनिर्भर बनाया। परन्तु यदि अब केन्द्रीय और राज्य सरकारों ने कृषि तथा किसानों को लगातार नज़रअंदाज़ किये रखा तो खाद्य के क्षेत्र में भारत का आत्मनिर्भर बने रहना मुश्किल हो जायेगा। सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि देश में जो इस समय आर्थिक मंदी चल रही है, उसका मुख्य कारण भी कृषि का संकट ही है। कृषि संकट के कारण ही ग्रामीण क्षेत्रों से वस्तुओं की मांग कम हुई है, और इसने आर्थिक मंदी को जन्म दिया है। 
इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि कृषि को पुन: लाभदायक धंधा बनाने और किसानों के संबंध में नीतियां बनाने के समय सरकारें उसी तरह किसानों के प्रतिनिधियों को विश्वास में लें, जिस तरह वह बड़े उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों तथा देश के अन्य अहम वर्गों को विश्वास में लेती हैं। अभी भी मोदी सरकार के पास समय है, वह तत्काल तौर पर देश के किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को दिल्ली बुलाए। कृषि और किसान संकट पर गम्भीरता से विचार-चर्चा की जाए तथा इस चर्चा के आधार पर ही आने वाले आम बजट में कृषि और किसान की बेहतरी के लिए फंड आरक्षित रखे जाएं।