अति घृणित कृत्य

पंजाब के महानगर जालन्धर में विगत दिवस एक अवयस्क 13 वर्षीय बच्ची के साथ एक अधेड़ व्यक्ति द्वारा दुष्कर्म जैसे प्रयास के विफल रह जाने पर, गला घोंट कर उसकी हत्या कर दिये जाने की घटना ने न केवल पूरे पंजाब के लोगों को दहलाया है, अपितु पूरे देश में इस घटना के विरुद्ध जन-रोष-स्वर की गूंज भी सुनाई दी है। इस एक अतीव घृणित एवं निन्दनीय घटना ने वर्षों पहले देश की राजधानी दिल्ली में घटित हुए निर्भया कांड की याद ताज़ा कर दी है, अपितु सरकारों खास तौर पर केन्द्र सरकार को एक ऐसा अवसर दिया है कि वह इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए न केवल मौजूदा कानूनों को और अधिक कठोरता से लागू करे, अपितु इस उद्देश्य हेतु जन-जागृति पैदा करने के लिए नये क्रम से नये निर्देश जारी किए जाएं। नि:संदेह इस एक घटना ने निर्ममता, निर्दयता और क्रूरता की तमामतर हदें पार कर दी हैं। कैसे सितम की बात है कि एक पड़ोसी ने ही विलासिता के वशीभूत हो कर, अपने पड़ोसी और अपनी ही बेटी की हम-उम्र उस की सहेली को, अपने ही घर में बुलाकर न केवल  उसका यौन-शोषण किया, अपितु उस के विरोध करने पर उसने उसका गला दबा कर हत्या भी कर दी। सितमज़रीफी की हद यह भी है कि उसकी अपनी, इतनी ही उम्र की दो बेटियां हैं।
राजधानी दिल्ली के निर्भया कांड के बाद बेशक केन्द्र सरकार ने इस संदर्भ में काफी कड़े कानून बना कर फांसी तक के दण्ड का प्रावधान किया था। इस कानून के तहत पहले-पहले देश की सरकारों ने बहुत सख्ती भी दर्शायी थी। मौजूदा मामले में भी पंजाब सरकार और ज़िला पुलिस प्रमुख ने बहुत जल्दी और बहुत बड़ा फैसला लेते हुए, इस मामले की जांच में अनगहली बरते जाने वाले पुलिस अधिकारी को न केवल बर्खास्त कर दिया, अपितु अपना दायित्व सही ढंग से न निभाने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की कड़ी प्रताड़ना भी की।  तथापि, इस घटना से पुलिस तंत्र की छवि धूमिल तो हुई है। जालन्धर वाली घटना की पीड़िता की मां द्वारा पुलिस कर्मचारियों पर दबाव डालने का आरोप भी पुलिस कार्रवाई पर प्रश्न-चिन्ह लगाता है। नि:संदेह इतने कड़े कानून और इतनी कड़ी कार्रवाई के बावजूद इस प्रकार की घटनाओं पर अंकुश न लगा पाना समाज में रिश्तों, मानवीयता और सामाजिक संबंधों के धरातल पर कैक्टसों के उग आने का भी संकेत है। इस एक घटना की तीव्र प्रतिक्रिया के बावजूद आपराधिक वृत्ति के लोगों में भय व्याप्त न होना, बेशक कानून का ढीलापान प्रतीत होता है। इस घटना के दो ही दिन बाद जालन्धर ज़िला के कस्बा लोहियां में एक ईंट-भट्ठा पर रहती एक मां-बेटी के साथ चार-चार लोगों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म की घटना भी किसी भीषण सनसनी से कम नहीं। तथापि, यहां यह एक तथ्य सचमुच समाज को निरुत्साहित होने से बचाता है कि ऐसी घटनाओं के विरुद्ध अदालती संरक्षण बाकायदा आस की किरण बना है। आज से 15 वर्ष पूर्व एक सीरियल हत्यारे द्वारा एम.बी.ए. की छात्रा की दुष्कर्म-हत्या को अदालत द्वारा न्यायिक अंजाम तक पहुंचाना अदालती सक्रियता का ही एक प्रमाण है। इस घटना से जहां देश और समाज के एक बड़े वर्ग के लोगों के पांवों की तल्लियां लहू-लुहान हुई हैं, वहीं आपराधिक एवं दूषित मानसिकता वाले लोगों द्वारा किये जाते दुष्कर्मों की संख्या भी निरन्तर बढ़ी है। देश के कई भागों से इस प्रकार की घटनाओं का जारी रहना जहां देश और राज्यों के प्रशासनिक तंत्र के चेहरे पर एक बड़े द़ाग के समान है, वहीं देश के जन-मानस की मानसिकता के परिष्कार की बड़ी आवश्यकता भी महसूस की जा रही है। खास तौर पर देश के धार्मिक एवं सामाजिक नेताओं, घर-परिवारों के बड़े लोगों द्वारा अपने-अपने समय की भावी सन्तानों को ऐसे जघन्य अपराधों के प्रति जागृत एवं जानकार बनाये जाने की बड़ी आवश्यकता है।
हम समझते हैं कि नि:संदेह इस प्रकार के निर्भया कांडों के निरन्तर जारी रहने से जहां प्रशासनिक तंत्र और खास कर पुलिस व्यवस्था पर उंगली उठती है, वहीं सामाजिक धरातल की कमज़ोरी भी उबर कर सामने आती है। देश के कई राज्यों के पुलिस तंत्र की ओवर-हालिंग की बड़ी आवश्यकता है, यह इस मामले की प्राथमिक जांच करने वाले ए.एस.आई. को बर्खास्त किये जाने पर ही पता चल जाता है। तथापि हम समझते हैं कि इस प्रकार की प्रशासनिक सक्रियता और सामाजिक जागरूकता जितनी शीघ्र हासिल की जाएगी, उतना ही इस देश, समाज और खास तौर पर देश की बेटियों के भविष्य के लिए बेहतर होगा।

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