ऐसे मिला भारतीय गणराज्य को अपना राष्ट्रीय पशु बाघ
जब भी 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस आता है, तो परेड की कदमताल के साथ भारत की एक अदृश्य परेड भी साथ-साथ चलती है और यह परेड होती है, हमारी पहचान की। तिरंगा, संविधान, अशोक स्तंभ, राष्ट्रगान और फिर उन प्रतीकों की लंबी कतार, जिन्हें देखकर भारत को भारत के रूप में पहचाना जाता है। इन्हीं प्रतीकों में से एक ऐसा प्रतीक भी है, जो बोलता नहीं है, लेकिन उसकी मौजूदगी में पूरा जंगल डोल उठता है और यह है-बाघ। हमारा राष्ट्रीय पशु। भारत के गणराज्य की प्रतिनिधि पहचान यानी रॉयल बंगाल टाइगर, वास्तव में भारत के राष्ट्रीय पशु की कहानी केवल एक जानवर के राष्ट्रीय प्रतिनिधि चुने जाने की कहानी नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जब भारत ने समझा कि गणराज्य सिर्फ संसद और चुनाव नहीं होते। गणराज्य का आत्मसम्मान उसके जंगलों, नदियों और जीवों में भी धड़कता है।
बाघ-भारतीयता का स्वभाव है
भारत ने जब बाघ को अपना राष्ट्रीय यानी प्रतिनिधि यानी राष्ट्रीय पशु चुना तो इस चयन में हमने अनजाने ही अपने राष्ट्रीय स्वभाव के कुछ सबसे चमकीले गुण चुन लिए। ये गुण थे- साहस के, गरिमा के, ताकत की, अकेलेपन की और आक्रमण नहीं अपने सीमा के संरक्षण के। दरअसल बाघ बिना शोर शराबे हमारे साहस का प्रतीक होता है। यह बिना दिखावे के हमारी गरिमा को दर्शाता है। बाघ शक्तिशाली होता है, लेकिन क्रूर नहीं। वास्तव में हम एक सम्प्रभु गणराज्य के तौर पर अपने इन्हीं गुणों को दर्शाना चाहते हैं, जो हमारे राष्ट्रीय पशु बाघ के मूल गुण हैं।
बाघ क्यों? शेर क्यों नहीं?
यह प्रश्न अकसर किया जाता है कि कई देशों ने शेर को राष्ट्रीय पशु बनाया है। भारत के पास भी शेर है, गुजरात के गिर के जंगलों में, तो फिर हमने अपने राष्ट्रीय पशु के रूप में शेर को क्यों नहीं चुना, हमने बाघ को क्यों चुना। कारण सीधा था बाघ भारत की प्राकृतिक पहचान भारत के साथ जुड़ा था। बाघ भारत के भूगोल में फैला हुआ था। पहाड़, तराई, मध्य भारत, पूर्वोत्तर और सुंदरवन आदि। इसका दूसरा कारण था कि बाघ संकट में था। शिकारियों द्वारा अंधाधुंध शिकार के कारण, जंगलों की कटाई के कारण, अवैध तस्करी के कारण, भारत में बाघ की संख्या धीरे-धीरे खतरनाक ढंग से घट रही थी। ऐसे में प्रतीक चुनना सिर्फ गर्व की बात नहीं थी, जिम्मेदारी का भी सबब था यानी भारत ने एक सोच, समझकर कदम उठाया, जिसे सबसे ज्यादा बचाने की ज़रूरत थी, उसी को अपना राष्ट्रीय प्रतिनिधि चुना।
हमें प्रतीक चुनने की ज़रूरत क्यों पड़ी?
भारत 1950 में गणराज्य बन गया था। मगर गणराज्य बन जाना और गणराज्य की पहचान बन जाना, ये दो अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए भारत पहले गणराज्य बना और फिर धीरे-धीरे गणराज्य की पहचान में ढला। इसी क्रम में भारत ने अपने प्रतीक तय किये। राष्ट्रध्वज, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय पशु। राष्ट्रीय पशु का अर्थ था कि हम यह घोषित कर रहे थे कि हमारी धरती सिर्फ हमारे शहरों की नहीं, हमारे जंगलों की भी है और उस धरती की रक्षा केवल सीमाओं पर नहीं सीमाओं के भीतर भी होती है।
और ये बना टर्निंग प्वाइंट
बाघ को राष्ट्रीय पशु की पदवी 1972-73 में मिली। 1972 में इस विषय में सोचा गया और 1973 में निर्णय कर लिया गया और इसी के साथ अपने राष्ट्रीय प्रतीक पशु बचाने के लिए हमने शुरु किया, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ यह सचमुच एक असाधारण क्षण था। जब भारत ने पहली बार दुनिया को यह बताया कि विकास और वन्यजीव एक-दूसरे के दुश्मन नहीं बल्कि राष्ट्र के दो पहरेदार हैं और इस तरह प्रोजेक्ट टाइगर हमारी नीति-निर्णय का प्रतीक भी बन गया। बाघ को प्रतीक बना देने की बात एक थी, बाघ को बचाने के लिए नीतियां, रिजर्व, सुरक्षा ढांचा और जन भागीदारी बनाना असली गणराज्य का धर्म था। प्रोजेक्ट टाइगर के बाद बाघ पोस्ट पर छपा फोटो भर नहीं रहा बल्कि भारत के पर्यावरण शासन का केन्द्र बन गया। टाइगर रिजर्व, निगरानी, शिकार रोधी व्यवस्था, वन्यजीव संरक्षण कानूनों की शक्ति इन सबका चेहरा बन गया। एक अर्थ में भारत ने कहा, ‘हमारा राष्ट्रीय पशु, हमारी जिम्मेदारी है’।
संस्कृति से नाता
बाघ केवल वन्यजीव भर नहीं है। इसका हमारी सांस्कृतिक विरासत से गहरा नाता है। यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति में रचा-बसा शक्ति स्रोत है। लोककथाओं, जनश्रुतियों में, हमारी कहावतों में, राज दरबारों में, दीवारों में, आदिवासी घरों में बनाये जाने वाले चित्रों में हर जगह बाघ की मौजूदगी है। बाघ का डर जंगल को मर्यादित करता है और मर्यादा जंगल को जंगल बनाती है। शायद इसलिए भारत की पंरपरा में बाघ खौफ का नहीं, सम्मान का पात्र रहा है और इसे हम आतंक नहीं, अनुशासन से चिन्हित करते रहे हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा संविधान यानी कानून का डर नहीं, कानून का अनुशासन। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



