नादर शाह का भारत पर हमला

मोड़ीं बाबा कच्छ वालिया, रन्न बसरे नूं गई।
बाबा तेरियां घुमा दिओ गुड्डियां, वेखी सई।
नादर शाह के हमले के समय भारत का बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला और लाहौर का सूबेदार ज़करिया खान (़खान बाहादुर) था। सन् 1721 से 1 जुलाई, 1740 तक ज़करिया खान लाहौर का सूबेदार रहा।
ज़करिया खान के पिता जरनैल समद खान ने 10,000 सेना जिसमें पहाड़ी और राजस्थान के राजाओं और मुगलों की सेना भी शामिल थी, के साथ गुरदास नंगल की गढ़ी को घेर लिया। घेरे के 9 माह बाद गढ़ी में रसद खत्म हो गई। बाबा बंदा सिंह ने गढ़ी का गेट खोल कर सेना का मुकाबला किया। कई दिनों से भूखे सिंह लड़ाई करते हुए बेहोश होकर गिर जाते। समद खान की सेना ने 100 सिंहों को कैद करके खिचड़ी खिलाई। कमजोर और रोगी सिंहों का कत्ल करके उनके सिर नेजों पर टांग कर बाबा बंदा सिंह, उनकी धर्म पत्नी और तीन साल के लड़के और कैदी सिंहों को गड्डों पर लादकर लाहौर ले गए। बादशाह फरुखशीयर ने समद खान को लाहौर का सूबेदार बनाकर खान बहादुर के खिताब से सम्मानित किया। समद खान की मौत के बाद उसका बेटा ज़करिया खान लाहौर का सूबेदार बन गया। ज़करिया खान को भी खान बहादुर ही कहा जाता था।  
सिंहों पर विपदा : ज़करिया खान ने सभी चौधरियों, जिनमें से प्रमुख रामा रंधावा घनीये, करमा गांव छीना, लालू भिक्खी विंड, सियामे शाह खत्री, दियानत राय, अकल दास जंडियाला, कजला रंधावा बटाला, भीमा ढिल्लों कसूर, पीर मोहम्मद चट्ठा, इस्माइल खान सियालकोट को एक दिन लाहौर बुलाकर पहले उनको पीटा, फिर पूछा, ‘आप कहते हैं, हमारे इलाके में कोई भी सिंह नहीं, फिर आपके यह जमाई कहां से आ गये? मस्से का सिर काटकर कौन ले गये? जालन्धर के हाकम कुतुबद्दीन की हत्या कर दिल्ली जाने वाले 40 घोड़े किस ने लूटे? सियालकोट का सूबेदार ताहर अली 180 घोड़े और 30 घुड़सवारों के साथ सरहिंद जा रहा था। ताहर अली और 30 घुड़सवारों की हत्या कर 210 घोड़े कौन ले गया? इन खूनी कातिलों को मेरे सामने पेश करो। सिंहों को खत्म करो और ईनाम प्राप्त करो।’
नादर शाह का हमला : नादर शाह ने काबुल जीतकर 1738 ई. को 80,000 सैनिकों और तोपों से भारत पर हमला कर दिया। हमले की खबर सुनकर सिंहों पर अत्याचार क्या होने थे, सरकार को और विपदा पड़ गई। ज़करिया खान ने अटक के निकट जाकर नादर शाह की बात मान ली। नादर  शाह लाहौर आ गया। खान बहादुर ने 21 लाख रुपये, 11 किश्तियां और 50 हाथी देकर नादर शाह से पीछा छुड़ाया। नादर शाह ने 21 जनवरी, 1739 को दिल्ली जाने के लिए कूच कर दिया। अहमद शाह अब्दाली भी नादर  शाह की सेना में जरनैल था।
नादर  शाह की पृष्ठभूमि : नादर  शाह ईरान में कैस्पियन सागर किनारे गरीब आयली का पुत्र था। उसका जन्म 13 नवम्बर, 1688 को हुआ था। 12 वर्ष की आयु में पिता की मृत्यु हो गई। जंगल से लक्कड़ काटकर और बेचकर घर का गुज़ारा किया। बड़ा हुआ, फिर किस्मत ने साथ दिया। सन् 1717 में धाड़वियों का सरदार बन गया। 1725 ई. को पठानों ने ईरान पर हमला कर दिया। नादर शाह ने 5,000 धाड़वियों के साथ, बादशाह की ओर से लड़ते हुए पठानों को देश से निकाल दिया। बादशाह ने नादर शाह को सेना का बख्शी बना दिया। बादशाह की मौत के बाद सन् 1736 में नादर  शाह ईरान का बादशाह बन गया। नादर शाह ने हेरात और कंधार को जीत कर काबुल पर कब्ज़ा करके भारत पर हमला कर दिया। हमले को गनीमत समझ कर जंगल में से बाहर आकर जिन चौधरियों ने सिंहों और हिन्दुओं पर अत्याचार किए थे, उनको चुन-चुन कर मार दिया।
लड़ाई शुरू हो गई : मुगल 2,00,000 सैनिक, 1,500 हाथी और 800 तोपें लेकर दिल्ली से करनाल तक 59 मील दो माह में पहुंचे। नादर शाह लाहौर से करनाल तक एक माह में ही पहुंच गया। मुगलों का तोपखाना आने से पहले ही 24 फरवरी, 1739 को लड़ाई शुरू हो गई। 3 घंटे में ही मुगलों के 20,000 से अधिक सैनिक मारे गये। मोहम्मद शाह हार मानकर अपने मंत्रियों के साथ नादर शाह के पांव में गिर गया। नादर शाह और मोहम्मद शाह 13 मार्च, 1739 को लाल किला पहुंच गये और नादर शाह तख्त-ए-ताऊस पर बैठ गया। अगले दिन मस्जिद में नादर शाह के नाम का ़खतबा (धन्यवाद) पढ़ा गया। मौत का ़खतबा समझकर, किसी ने नादर शाह की हत्या की खबर फैला दी। दिल्ली में नादर शाह के 700 सैनिकों का कत्ल कर दिया गया। खबर सुनकर नादर शाह ने म्यान से एक चप्पा तलवार निकाल ली। 6 घंटे में नादर शाह की सेना ने दिल्ली में 33,000 हिन्दुओं और मुसलमानों, महिलाओं, पुरुषों और बच्चों का कत्ल कर दिया। मोहम्मद शाह ने हाथ जोड़कर नादर शाह के आगे खड़े होकर निवेदन किया। नादर शाह ने पुन: तलवार म्यान में जाल दी, और जरनैलों ने कत्लेआम रोक दिया।
तख्त-ए-ताऊस
सिंहों ने नादर शाह को सबक सिखाया : नादर शाह 58 दिन दिल्ली में रहा। अहमद शाह अब्दाली ने मथुरा तक लूटपाट की। अब्दाली धन-दौलत और हिन्दू लड़कियों को कैद करके दिल्ली भेज देता और नादर शाह लड़कियों और धन को गड्डों, हाथी, घोड़े और खच्चरों पर लादकर आदेश देकर काबुल की ओर भेज देता। यह सूचना सिंहों को भी मिल गई। स. जस्सा सिंह आहलूवालिया, स. जस्सा सिंह रामगढ़िया, नवाब कपूर सिंह और अन्य जत्थेदारों ने सिंहों के जत्थे कुरुक्षेत्र से अटक तक जरनैली सड़क के दोनों तरफ 15 से 20 मील तक जंगलों में बिठा दिए। घुड़सवार दो सिंह सूचना देते रहे और जत्थे के सिंह हमला करके लड़कियों को छुड़ाकर लूटा हुआ माल और रसद छीन लेते। सैनिक पीछा करते तो सिंह उनको मार देते। जत्थेदार लड़कियों को उनके घर भेज देते और लूटा हुआ माल ज़रूरतमंदों को बांट देते। सैनिकों ने खाली हाथ दिल्ली जाकर सारा हाल नादर शाह को बताया। नादर शाह के सैनिकों की मार काट करके सिंहों ने काबुल भेजकर भारत माता की इज्जत बचाई।
नादर शाह का काबुल जाना : नादर शाह ने तख्त-ए-ताऊस, एक जोड़ी लालों की (इनका रोशनी में बादशाह रात को कुरान पढ़ता था), एक गुलाबी हीरा (इसकी रौशनी से कमरा गुलाबी हो जाता था) कोहेनूर हीरा और बेगमों के जेवर और बेशुमार दौलत लूट कर पहाड़ी रास्ते से सैनिकों के साथ काबुल जाने के लिए कूच कर दिया। सिंहों ने दरिया ब्यास जाने से पहले तख्त-ए-ताऊस और लूटा हुआ माल नादर शाह से छीन लिया। जत्थेदारों ने तख्त को तोड़कर सोना आपस में बांट लिया।
तख्त-ए-ताऊस पर बादशाह शाहजहां ने 32 मन सोना और कई कीमती हीरे और मोती लगाए। इस तख्त को लाल किले के दीवान-ए-खास में ही रखा गया था।
नादर शाह का सूबेदार से सिंहों के बारे में पूछना : वापसी के समय नादर शाह ने ज़करिया खान को अखनूर बुलाकर पूछा, ‘वे कौन हैं जिन्होंने मेरी दौलत लूटी है? मेरा नाम ज़ालिम नादर शाह है। उन्होंने शेर के मुंह से मांस छीना है! मैं उनको तबाह करके उनका नामो-निशान मिटा दूंगा’।
ज़करिया खान ने कहा, जहांपनाह, यह सिंह नामक खालसा पंथ है। इनका घर-घाट, गांव, देश कोई नहीं है। बरसात की खुम्बों तरह की तरह युवा होते ही अपने आप पंथ में आ जाते हैं। यह तो खुदा का करिश्मा ही समझो। हम उनको मारते हुए हार गये हैं, यह खत्म ही नहीं होते। मौत से डरते नहीं। 500 के साथ 5 ही लड़ जाते हैं। सिर पर पगड़ी, बदन पर कछहरा, खेस की बुक्कल और अपने पास हथियार रखते हैं। चलते-फिरते ही सो जाते हैं, घोड़े की काठी इनका पलंग है। एक जैसा बांटकर खाते हैं। बिना नमक-मिर्च, कच्चा-पक्का, गाजर, मूली, रूखा-सूखा खाकर भी भगवान का शुक्रिया करते हैं। हम हिन्दुओं को मारना सवाब समझते हैं, यह अत्याचार का नाश करना धर्म समझते हैं। ज़रूरतमंदों की ज़रूरत भी पूरी करते हैं।
नादर शाह ने कहा, ‘यदि यह कौम इस प्रकार की है, कभी न कभी यह पंथ देश का मालिक बन जाएगा। इनके साथ विरोध न करो। यह हमारे तुम्हारे मारने से खत्म नहीं होंगे।’ ज़करिया खान सिंहों की बहादुरी पर खुश था. फिर भी डर था कि जो सिख नादर शाह से नहीं डरे, हमारा राज तो नहीं छीन लेंगे! सिंहों का वजूद ही मिटाना चाहिए। ज़करिया खान ने सिंहों को संदेश भेजा, नादर शाह के लूटे हुए माल में से आधा मुझे दे दें। सिंह नहीं माने। उसने सिहों पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। ज़करिया खान ने भाई तारू सिंह, भाई मनी सिंह, भाई शाहबेग सिंह और भाई शाहबाज़ सिंह तथा अन्य हज़ारों सिंह शहीद कर दिए। कई सिंहों का पता बताने पर ईनाम रखे। जत्थे बनाकर सिख जंगलों में चले गए तथा अन्य जत्थे राजस्थान चले गये।
पापी को सज़ा मिली :  ज़करिया खान के आदेश के साथ 4 जून, 1740 को भाई तारू सिंह की खोपड़ी उतारी गई थी। तारू  सिंह ने ज़करिया खान को कहा, ‘मैं ज़रूर तड़प-तड़प कर मरूंगा, परन्तु तुझे अपनी जूती के साथ लेकर जाऊंगा।’ तारू सिंह की सेवा एक बढ़ई सिंह ने की। खान बहादुर को पेट में बन्न पड़ गया और भाई तारू सिंह की जूती अपने सिर में खाते हुए 1 जुलाई, 1740 को मर गया। भाई तारू सिंह ने भी 1 जुलाई, 1740 को प्राण त्याग दिए।

-गांव हयात नगर, गुरदासपुर
मो. 8872946612

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