मध्यम वर्गीय जीव की उच्च वर्गीय व्यथा

जिस प्रकार मंगल और बृहस्पति के बीच चक्कर लगाते हुए किसी क्षुद्रग्रह का पूरा जीवन निकल जाता है, उसी प्रकार मध्यम वर्गीय व्यक्ति भी अमीरी और गरीबी रेखा के बीच अपनी कक्षा तय करता रहता है। न वह पूरी तरह चमक पाता है, न ही खुलकर टकरा सकता है-बस संतुलन साधते हुए घूमता रहता है।
सामाजिक संरचना में भी बीच वाले का यही हाल है। ज्येष्ठ पुत्र को पिता का उत्तराधिकारी माना जाता है, कनिष्ठ को मां की ममता का विशेषाधिकार प्राप्त होता है, जबकि मंझौला जन्म लेते ही उपेक्षा की स्थायी सदस्यता ले लेता है। महाभारत काल में भी मध्यम पुत्र भीम को ही जंगल भेजकर बकासुर से निपटने की ज़िम्मेदारी दी गई। महात्मा बुद्ध ने कठोरता और कमजोरी के बीच संतुलन के लिए मध्यम मार्ग का उपदेश दिया था लेकिन वर्तमान व्यवस्था ने इस लचीलेपन को ऐसा मोड़ दिया कि संतुलन की जगह सारी ज़िम्मेदारियों की गठरी ही मध्यम वर्ग के कंधों पर लाद दी गई। अब वह न त्यागी रह पाया, न भोगी-बस ईएमआई में लिपटा एक गृहस्थ भिक्षु बनकर चल रहा है। कुर्बानी के लिए सबसे पहले बीच वाले को ही चुना गया। यही परंपरा आज तक जारी है। मध्यम वर्ग जीवन भर रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने में ही अपनी ऊर्जा खर्च कर देता है और जीवन ‘एडजस्टमेंट’ करते-करते बीत जाता है। 
सरकारी योजनाएं गरीबों के उत्थान के लिए बनती हैं। राशन, शौचालय, बिजली और चिकित्सा सब उनके नाम। अमीरों और उद्योगपतियों को व्यापार के लिए ज़मीन, छूट और सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है। मध्यम वर्ग के हिस्से केवल टैक्स, जीएसटी, ईएमआई और महंगाई आती है। उसके जीवन में ज़िम्मेदारियां शनि की साढ़ेसाती की तरह स्थायी रूप से डेरा डाले रहती हैं।
परिवार का पालन-पोषण, वृद्ध माता-पिता की बीमारी, बच्चों की स्कूल फीस, मकान के नाम पर लिया गया बैंक लोन और बेटी का विवाह। इन सबके बीच मध्यम वर्गीय व्यक्ति ऐसे डोलता रहता है, जैसे जीवन कोई स्थायी भंवर हो। कबीर के ‘साईं इतना दीजिए...’ की तज़र् पर आमदनी और खर्च का ऐसा संतुलन बनता है कि महीने के अंत में बचत शून्य और अनुभव अनंत रह जाता है।
मध्यम वर्गीय साहित्यकार की स्थिति भी किसी अदृश्य प्रजाति से कम नहीं है। बड़े और बहुप्रसारित पत्र-पत्रिकाओं में पहले से आरक्षित स्थापित नाम सहज ही छप जाते हैं, दूसरी ओर नवोदित लेखक ई-पत्रिका में प्रकाशित होकर संतोष कर लेते हैं। बीच का साहित्यकार अच्छा लिखने के बावजूद चयन सूची और पाठक-दोनों के बीच भटकता रहता है। उसकी रचनाएं कभी छपती हैं, तो कभी संपादकीय मेल बॉक्स में ही दम तोड़ देती हैं।
मध्यम वर्गीय सोशल मीडिया उपभोक्ता का दर्द भी कमोबेश यही होता है। सभी मित्रों को टैग कर, हाइलाइट लगाकर और दिल से लिखी गई पोस्ट साझा करने के बाद भी लाइक और कमेंट दहाई अंक तक नहीं पहुँचते। उधर उच्च वर्गीय इंफ्लुएंसर की साधारण-सी पोस्ट घंटे भर में मिलियन छू लेती है। निम्न वर्गीय सोशल मीडिया जीव शून्य रीच का अनुमान लगाकर आत्मसंयम बरत लेते हैं, जबकि मध्यम वर्गीय यूज़र उम्मीद और निराशा के बीच रिफ्रेश बटन दबाता रह जाता है।
कुल मिलाकर कहें तो मध्यम वर्ग की स्थिति ऐसी है, कि न घर का होता है, न घाट का। न वह हाथ पूरी तरह फैला पाता है, न समेट पाता है-बस चेहरे पर एक मध्यम मुस्कान ओढ़े, जीवन की किस्तें भरता रहता है।

-महेशखूंट बाजार ज़िला-खगड़िया 
मो. 7765954969

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