पशु पालन संस्कृति का उत्सव है नागौर का पशु मेला
नागौर का पशु मेला सिर्फ पशुओं के व्यापार तक सीमित नहीं है बल्कि यह समूची पशु पालक संस्कृति का उत्सव है। जहां राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश के पशु पालक सिर्फ पशुओं की खरीद-फरोख्त भर के लिए नहीं आते और न ही हजारों दूसरे पर्यटक यहां पशु व्यापार को देखने भर आते हैं बल्कि ये सब पशुपालन संस्कृति का जश्न मनाने आते हैं। इस मेले में सजे-धजे ऊंट, साबुन से धुले और सीगों में तेल लगाए बैल और करीने से सुज्जित घोड़े उत्सव की एक अलग ही छटा बिखेरते हैं, लेकिन यह सब व्यापार के लिए नहीं होता बल्कि पूर्वजों के सौंदर्यबोध और जीवन संस्कृति का उत्सव मनाने के लिए भी यह मेला लगता है। वास्तव में नागौर का पशु मेला सिर्फ राजस्थान का नहीं बल्कि देश के समूची पशुपालन सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है। मेले के दौरान यहां सैकड़ों तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। ढोल, नगाड़े, खड़ताल और अलगोजे की गूंज हर तरफ सुनाई देती है। कालबेलिया, घूमर और तेरहताली जैसे लोकनृत्यों की प्रवीणता का भी यह उत्सव है। एक से बढ़कर एक लोकनर्तक अपनी नृत्य कला से दर्शकों और पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। जहां लोक कलाकारों के लिए मेला पहचान और अजीविका का साधन है, वहीं देश-विदेश से आये हजारों पर्यटकों के लिए यह आत्मा के विरेचन का जरिया है। लोग यहां सिर्फ घूमने नहीं बल्कि तन और मन से तरोताजा होने के लिए आते हैं।
राजस्थानी पहनावे का प्रदर्शन
नागौर मेले में राजस्थानी पहनावे का मुग्धकारी प्रदर्शन होता है। यह मेला एक तरह से राजस्थानी पारंपरिक वस्त्रों के आकर्षक संसार की तरह है। इस मेले में पुरुषों के सिर पर कम से कम 100 से ज्यादा तरह की रंगबिरंगी पगड़ियां सजी मिल जाएंगी। राजस्थानी अंगरखा, धोती, महिलाओं की घाघरा-चोली, ओढ़नी और चांदी सहित दूसरी पारंपरिक धातुओं के प्राचीन गहने, इस मेले को सांस्कृतिक संग्रहालय का रूप दे देते हैं। नागौर मेला राजस्थानी पोशाक संस्कृति का महाकाव्य है। पोशाकों की जितनी विविधता और बहुरंगी छटा यहां देखने को मिलती है, शायद ही किसी दूसरे मेले में यह मिले। इसके अलावा नागौर मेला, पशुओं की सौंदर्य प्रतियोगिताओं के लिए भी मशहूर है। यहां ऊंटों को नव-ब्याहताओं की तरह सजाया जाता है। पर्यटक रोमांचक ऊंट दौड़ का भी लुत्फ लेते हैं और इस मेले में पारंपरिक ग्रामीण खेल जैसे रस्साकशी, बैल और ऊंट गाड़ी की दौड़ प्रतियोगिताएं भी होती हैं। यही कारण है कि नागौर का पशु मेला भले पशुओं के नाम पर जाना जाता हो, लेकिन यह समूचे पशु पालक समुदाय की सभ्यता का उत्सव है।
ग्रामीण भारत की असली झलक
अगर आपसे पूछा जाए कि आखिर नागौर मेले को लोग इतना ज्यादा क्यों पसंद करते हैं, तो इसका सही जवाब यही होगा कि नागौर मेले में समूचे भारत की झलक देखने मिलती है। दूसरे शहरी मेलों के विपरीत नागौर मेला अभी भी चमक-दमक और बाजार की दिखावट का शिकार नहीं हुआ। इस मेले में अभी भी ग्रामीण सादगी हर तरफ बिखरी मिलती है। यहां आने वाला व्यक्ति राजस्थान के ग्रामीण जीवन को बहुत नजदीक से देख पाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह व्यापार और उत्सव का साझा संगम होता है। यहां पशु खरीद बिक्री के साथ गीत-संगीत, खानपान और मनोरंजन का उत्सव भी अनवरत चलता है। इस मेले का अपना एक धार्मिक कनेक्शन या आस्था का पक्ष भी है। यह मेला वास्तव में लोक देवता रामदेव जी की पहचान से भी जुड़ा है। यहां लाखों की तादाद में उनके भक्त आते हैं, जिस कारण मेले का एक रंग आध्यात्मिक भी हो जाता है। नागौर मेला वास्तव में राजस्थान की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करता है। लोकगीत, लोकनृत्य, लोकबोलियां और लोकपरंपराएं इस बहुरंगी अनुष्ठान के जरिये सहजता से संरक्षित होती हैं। नागौर जैसे मेले वास्तव में ऐसी गतिविधियां होती हैं, जिन्हें किसी पर्दे या किताबों से पूरी तरह महसूस नहीं किया जा सकता।
पशु पालन अर्थव्यवस्था का आधार
यह मेला राजस्थान के पशुपालन अतीत की खुली किताब है। यह अतीत की उस अर्थव्यवस्था को लोगों के सामने पुनर्जीवित करता है, जो कभी पशुओं पर आधारित जीवन के चलते यहां की मूल जीवनशैली थी। आज के आधुनिक और यांत्रिक युग में यह संस्कृति जीवंत रूप में ऐसे आयोजनों में ही देखी और जी जा सकती है। नागौर मेला इसलिए खास है, क्योंकि यह इस विशेष संस्कृति को जीवंत बनाये हुए है। आज भी इस मेले में पहुंचकर हम पशुओं की उपयोगिता, उनकी नस्ली विशिष्टता, उनके कारोबार का तौर तरीका देख सकते हैं, वह भी बिल्कुल जीवंत स्थिति में वरना कागजों और पर्दे में तो सबकुछ आभासी ही दिखता है। यही कारण है कि नागौर मेला को देखने के लिए देश-विदेश से हर साल हजारों पर्यटक आते हैं बल्कि कहना चाहिए वे लोग इस उत्सव को जीने आते हैं। विदेशी पर्यटकों के लिए खास तौर पर नागौर मेला एक अनोखा अनुभव होता है। जहां ऊंटों की कतारें, लोकवाद्य की धुनें और मरुस्थलीय जीवन की लय, एक साथ सुर ताल में संगत करते मिलती है। ऐसे मेले सिर्फ जीवनयापन की गतिविधियों को ही नहीं संस्कृति को भी संरक्षित करते हैं। इसलिए नागौर का वार्षिक पशु मेला अब विशिष्ट सांस्कृतिक मेले के रूप में जाना जाता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



