गणतंत्र दिवस की छुट्टी

गणतंत्र दिवस की सुबह हल्की धुंध और सर्दी में लिपटकर आयी थी। राष्ट्रीय चैनलों पर परेड शुरू हो चुकी थी। दूर-दूर तक फैली सड़कों, झंडों और अनुशासन में चलती टुकड़ियों की तस्वीरें स्क्रीन पर चमक रही थीं। हर चैनल पर देशभक्ति के गीत और हर घर में तिरंगा लहरा रहा था-कहीं मैदानों में, बालकनी में, कहीं बागीचे में, कहीं दरवाज़े पर तो कहीं बच्चों की टोपी में।
यमुना अपने छोटी सी रसोई में उबलते हुए चाय को बेचैनी से देख रही थी। जैसे हीं दूसरा उबाल आया, उसने चूल्हे पर रखी चाय की केतली उतारी और जल्दी-जल्दी साड़ी का पल्लू ठीक किया।
आज भी उसे काम पर जाना था।
उसने घड़ी देखी साढ़े सात बज रहे थे, पहले घर में उसे आठ बजे तक पहुंचना था। गणतंत्र दिवस उसकी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं लाता था, बस रास्ते में सफेद कपड़ों में, सीने पर तिरंगे के बैज लगाए बहुत सारे बच्चे मिलते थे। जब वो पास की गली से गुजरी तो उसकी नज़र बगल वाले स्कूल के गेट पर पड़ी। स्कूल के बच्चे लाइन में खड़े होकर राष्ट्रगान का अभ्यास कर रहे थे।
‘जन गण मन...’
यमुना थोड़ा ठिठक गयी, पर फिर अपने झोले को कसकर पकड़ा और बढ़ गयी। देर हो जाती तो मालकिन गुस्सा करती। पहले घर में टी.वी. जोरों से चल रहा था, मालकिन भी वही ड्राइंगरूम में सोफे पर बैठकर मोबाइल चला रहा थी। यमुना ने चुपचाप झाड़ू उठाया और सफाई करने लगी। टीवी पर किसी नेता की आवाज़ गूंज रही थी,
‘हमारा संविधान हमें समानता का अधिकार देता है...’
यमुना के हाथ एक पल को रुक गए और कानों में गूंजा,
‘समानता’
शब्द तो बहुत आकर्षक था पर उसके हिस्से में आते-आते संकीर्ण हो जाता था। तभी मालकिन की आवाज गुंजी,
‘यमुना, आज काम जल्दी-जल्दी निबटा ले, मेहमान आएंगे।’
यमुना ने बस हामी भर दी। पानी पीने के लिए उसने गिलास उठाया, लेकिन बैठने की आदत तो कब की छूट चुकी थी। खड़े-खड़े पानी पीते हुए उसके मन में एक सवाल उभरा,
‘अगर सब बराबर हैं, तो थकान सबकी एक-सी क्यों नहीं मानी जाती?’
यमुना अब दूसरे घर में थी, यहां बच्चों का शोर था। घर का छोटा बेटा भाषण रट रहा था,
‘भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं।’
बर्तन मांजती हुई यमुना मुस्कुरा उठी। हाँ, लोकतंत्र में उसका नाम भी तो था, मतदाता सूची में। वो हर साल वोट देती है, देश चुनती है, पर क्या देश उसे चुनता है? झाग भरे सिंक को निहारते हुए उसे अपने पिता की बात याद आयी,
‘बेटा, ये देश सबका है। मेहनत करने वाला कभी छोटा नहीं होता।’
पर पिता अब रहे नहीं और देश...। वो आज भी है, बस उसे दिखता नहीं, जैसे उसके और देश के बीच कोई अदृश्य दीवार हो। 
तीसरा घर सबसे अलग था। और यमुना को पसंद भी था यहां उसे कामवाली से कुछ ज्यादा इंसान समझा जाता था। यहां बच्चे बहुत बोलते थे, उससे भी ज्यादा सवाल पूछते थे। यहां भी टी.वी. तेज़ आवाज में चल रही थी, अभी अभी परेड खत्म हुई थी, और राष्ट्र गान शुरू होने वाला था। घर के बच्चे खड़े हो गए, बड़ों ने सिखाया था राष्ट्रगान के समय खड़े होना है। यमुना ने भी झाड़ू को एक तरफ रखा और दरवाजे के पास खड़ी हो गयी। हमेशा की तरह, थोड़ी दूरी बनाते हुए। तभी एक आवाज ने उसे खींचा,
‘आंटी’
यमुना ने चौंकते हुए देखा, छोटी बच्ची उसकी ओर देख रही थी। उसने यमुना से पूछा,
‘आप इधर क्यों खड़ी हो? राष्ट्रगान शुरू होने वाला है।’
यमुना को कुछ समझ नहीं आया वो क्या कहे, तभी वो बच्ची दौड़कर उसके पास आयी और उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,
‘इधर आओ नाए हमारे साथ।’
वो हाथ नन्हा सा था, पर उस पकड़ में अजीब-सा भरोसा था। वो यमुना को  टीवी के सामने ले आई। और फिर राष्ट्रगान शुरू हुआ।
यमुना पहली बार सीधे खड़ी थी। ना झुकी हुई, और ना हीं अलग। उसकी आंखें तो स्क्रीन पर थी पर नज़रें भीतर कहीं टिक गई थीं।
‘जन गण मन अधिनायक जय हे....’
उसकी आंखों के सामने उसका पूरा जीवन घूम गया, सुबह-सुबह घर से निकलना, दिन भर काम, कभी डाँट, कभी अनदेखी और हर शाम थककर लौटना, फिर अगली सुबह के लिए।
राष्ट्रगान खत्म हुआ और कमरे में कुछ पल का सन्नाटा छा गया। बच्ची ने ताली बजाई और मुस्कुराकर बोली, ‘आंटी, आपको राष्ट्रगान आता है।’
यमुना की आंखें भर आयीं, हां उसे राष्ट्रगान आता है, उसे देश से प्यार भी है। पर आजतक किसी ने पूछा हीं नहीं था। 
काम निपटाकर जब वह बाहर निकली, तो सूरज थोड़ा और चढ़ चुका था। सड़क किनारे लगे तिरंगे हवा में लहरा रहे थे। यमुना ने एक पल को रुककर ऊपर की ओर देखा। आज पहली बार झंडा उसे दूर का नहीं लगाए और ना ही सिर्फ अमीर घरों की सजावट की तरह दिखा। छुट्टी तो उसे आज भी नहीं मिली थी, वो कल की तरह हीं अगले घर की तरफ बढ़ चली, लेकिन भीतर कुछ बदल गया था। आज उसने सिर्फ काम नहीं किया था, बल्कि आज उसने गणतंत्र को थोड़ा-सा महसूस भी किया था।
-दरभंगा, बिहार

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