जीवन के शाश्वत सत्य का उत्सव है ऋतु बसंत
प्रकृति के विराट महाकाव्य में बसंत वह सर्ग है, जहां शब्द मौन हो जाते हैं और रंग, गंध, स्पर्श तथा स्वर स्वयं अर्थ रचने लगते हैं। यह केवल ऋतुओं का परिवर्तन नहीं बल्कि पृथ्वी का आत्मोत्सव है, जड़ता पर चेतना की विजय का उत्सव, मौन पर संगीत की प्रतिष्ठा और निस्तब्धता पर जीवन की उद्घोषणा। शिशिर की ठिठुरन जब अपनी अंतिम सांसें गिनने लगती है और सूर्य की किरणें अपनी ऊष्मा में कोमलता घोलकर धरती को छूती हैं, तब चराचर जगत में एक ऐसी सिहरन दौड़ती है, जिसे आंखों से नहीं, केवल हृदय से महसूस किया जा सकता है। बसंत किसी सम्राट की तरह ढोल-नगाड़ों के साथ नहीं आता, वह तो किसी प्रेमी की भांति दबे पांव आता है, सोई हुई कलियों को चूमकर जगाता हुआ, थकी हुई धरती की नब्ज़ पर हाथ रखकर उसे फिर से धड़कना सिखाता हुआ।
बसंत को ‘ऋतुराज’ कहना कोई औपचारिक अलंकरण नहीं बल्कि उस सार्वभौमिक सत्य की स्वीकृति है कि इस काल में प्रकृति अपनी संपूर्ण कलात्मकता और सृजनशीलता के साथ उपस्थित होती है। बसंत की विशेषता उसके संतुलन में निहित है। न इसमें ग्रीष्म का संताप है, न वर्षा का बोझिल कीचड़, न शिशिर की जड़ निष्क्रियता और न शरद की एकाकी उदासी। यह वह मध्य बिंदु है, जहां जीवन अपनी पूरी प्रखरता और सौंदर्य के साथ मुस्कुराता है। इस ऋतु में वायु मात्र केवल भौतिक तत्व नहीं रह जाती बल्कि मलयानिल बनकर चंदन की सुगंध, पुष्पों का पराग और नवजीवन का संदेश लेकर बहती है। आम्र-मंजरियों की मादक महक में डूबी कोयल की कूक जब नीरवता को चीरती है तो वह केवल पक्षी का कलरव नहीं बल्कि प्रेम और विरह की वह आदिम पुकार लगती है, जो सदियों से काव्य का आधार रही है। पलाश के जंगलों में जब आग की लपटों जैसे लाल फूल खिलते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो धरती ने अपनी दीर्घ तपस्या का फल पा लिया हो और वह आनंद की अग्नि में प्रज्वलित हो उठी हो।
भारतीय साहित्य में बसंत केवल एक ऋतु नहीं बल्कि एक अनुभूति, एक दर्शन और एक जीवंत प्रतीक रहा है। महाकवि कालिदास के लिए बसंत श्रृंगार का पर्याय था। ‘ऋतुसंहार’ में बसंत उनके यहां एक ऐसे योद्धा के रूप में उपस्थित होता है, जिसके धनुष की डोरी भौरों की कतार है और जिसके बाण आम के बौर हैं। यह योद्धा कामदेव की शक्ति बनकर चराचर जगत को सम्मोहित कर देता है। उनके काव्य में बसंत आते ही नारी सौंदर्य अधिक प्रखर हो उठता है, प्रकृति स्वयं का श्रृंगार करती है और प्रेम एक अनिवार्य नियति बन जाता है। कालिदास के बसंत में काम और सौंदर्य कोई वासना नहीं बल्कि सृष्टि के मूल प्रवाह का उत्सव हैं। इसके विपरीत, गोस्वामी तुलसीदास के यहां बसंत सात्विकता और भक्ति का विस्तार है। रामचरितमानस में प्रकृति का उल्लास भक्त के हृदय में उठने वाले आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक बन जाता है। उनके लिए बसंत केवल बाह्य सौंदर्य नहीं, ईश्वर की लीला का दृश्य रूप है, जहां वृक्ष, लता, पुष्प और पवन सभी मिलकर प्रभु की महिमा का गान करते हैं। यहां बसंत आत्मशुद्धि और भक्ति की पवित्र भूमि बन जाता है।
आधुनिक हिंदी कविता में बसंत एक नए अर्थ और नए स्वर के साथ प्रकट होता है। आधुनिक हिंदी कविता के स्तम्भ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के लिए बसंत केवल श्रृंगार नहीं, यौवन का विद्रोह, जीवन की जिजीविषा और नव-जागरण का शंखनाद है। ‘अभी न होगा मेरा अंत, अभी-अभी ही तो आया है, मेरे वन में मृदुल बसंत’ जैसी पंक्तियां मृत्यु, अवसाद और निराशा के बीच खड़े मनुष्य को जीवन की अटूट संभावना का विश्वास दिलाती हैं। निराला का बसंत पुरानी जर्जर मान्यताओं को तोड़ता है, रूढ़ियों को झाड़ता है और नई कोपलों के लिए स्थान बनाता है। यह बसंत संघर्षशील मनुष्य का साथी है, जो उसे गिरकर उठने की शक्ति देता है। वहीं सुमित्रानंदन पंत के काव्य में बसंत प्रकृति की कोमलता और सूक्ष्म सौंदर्य का उत्सव बन जाता है। उनके यहां बसंत एक सुकुमार बालक है, जो प्रकृति की गोद में खेलता हुआ अपनी निश्छल मुस्कान बिखेरता है। पंत का बसंत न शोर करता है, न विद्रोह, वह चुपचाप मनुष्य के भीतर संवेदनाओं की नई परतें खोलता है और उसे सौंदर्य-बोध से समृद्ध करता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाश्चात्य कवियों ने भी बसंत को आशा के संवाहक के रूप में स्वीकार किया है। पाश्चात्य कवि पी.बी. शेली की अमर पंक्ति ‘इफ विंटर कम्स, कैन स्प्रिंग बी फार बिहाइंड?’ बसंत को संघर्ष और पीड़ा के बाद आने वाले उज्ज्वल भविष्य का दर्शन बना देती है। यहां बसंत धैर्य की पराकाष्ठा और समय पर विश्वास का प्रतीक है। रवींद्रनाथ टैगोर के लिए बसंत वह काल है, जब आत्मा और प्रकृति के बीच की दूरी मिट जाती है। उनके गीतों में बसंत उस परम सत्ता का संगीत है, जो हर पंखुड़ी में अपने हस्ताक्षर छोड़ जाती है। शांतिनिकेतन का ‘बसंतोत्सव’ इसी दर्शन की अभिव्यक्ति है, जहां मनुष्य स्वयं को प्रकृति के रंगों में एकाकार कर लेता है।
दार्शनिक स्तर पर बसंत एक गहरी शिक्षा देता है कि त्याग के बाद ही प्राप्ति संभव है। जो वृक्ष पतझड़ में अपने पत्तों का त्याग कर देता है, वही बसंत में नई कोपलों से भर उठता है। यह नश्वरता और पुनरावर्तन का सबसे सुंदर उदाहरण है। सरसों के खेतों पर बिछी स्वर्णिम चादर केवल दृश्य सौंदर्य नहीं बल्कि किसान के श्रम, प्रकृति के संतुलन और जीवन के धैर्य का प्रतिफल है। बसंत ऋतु इस ऋतु का आध्यात्मिक केंद्र है, जहां ज्ञान, कला और विवेक की देवी सरस्वती की उपासना के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि बाह्य सौंदर्य तभी सार्थक है, जब उसके साथ आंतरिक बौद्धिक समृद्धि हो।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी बसंत जीवन का आधार है। फोटोपीरियडिज्म के कारण वनस्पतियों में होने वाले परिवर्तन, मधुमक्खियों का परागण के लिए सक्रिय होना, पक्षियों का प्रजनन काल, ये सभी संकेत करते हैं कि बसंत जैव-विविधता के संरक्षण और संतुलन की रीढ़ है। पृथ्वी की धुरी का झुकाव उत्तरी गोलार्ध में ऊर्जा के संचार को तीव्र कर देता है, जिससे जीवन के सभी रूपों में नवचेतना का संचार होता है। कुल मिलाकर, बसंत केवल फूलों के खिलने या तितलियों के उड़ने का नाम नहीं, बल्कि जड़ता के विरुद्ध एक मौन क्रांति है। यह हमें यही संदेश देता है कि कठोरतम शीत के बाद भी जीवन अपनी पूरी शक्ति के साथ लौटता है। यह सौंदर्य, प्रेम, त्याग और ज्ञान का वह संगम है, जहां पहुंचकर हर हृदय कवि हो जाता है और हर दृष्टि कलाकार। बसंत हमें स्मरण कराता है कि संसार कितना भी नीरस क्यों न हो जाए, प्रकृति के पास पुनर्जीवित करने के लिए सदैव एक नई कली, एक नई कूक और एक नई कोंपल शेष रहती है। जब-जब धरती पर बसंत आता रहेगा, तब-तब मानवता की आशा, सृजनशीलता और जीवन में विश्वास अजेय बना रहेगा।





