नये साल की पार्टी
नीरज एक होनहार बच्चा था। वह अपने गांव से कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पढ़ने आता था। नीरज के पिता एक किसान थे और मम्मी एक कुशल गृहिणी। वे दोनाें खुद तो नहीं पढ़ पाये थे क्योंकि उनकी अपनी-अपनी पारिवारिक मजबूरी थी परन्तु वे अपने पुत्र नीरज को खूब पढ़ाना-लिखना चाहते थे। नीरज के माता-पिता चूंकि पढ़े लिखे नहीं थे, इसलिए उनके जीवन में ऐसे कई मौके आये जब उनकी समझ में यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गयी कि पढ़ना आदमी के लिए बहुत ज़रूरी है। पढ़े-लिखे न होने के कारण कई अवसरों पर नीरज के माता-पिता को काफी नुकसान भी उठाना पड़ा। नीरज अपने माता-पिता की स्थिति को खूब समझता था, इसलिए वह खूब मन लगाकर पढ़ता था और अपनी कक्षा में हमेशा अच्छे अंकों से पास होता था।
नीरज के पिता की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि वे अपने लाड़ले पुत्र को एक नई साइकिल खरीद कर दे पाते। उन्हें अपनी गरीबी पर इस बात के लिए कभी-कभी अफसोस भी आता था परन्तु बेचारे करते भी तो क्या करते। नीरज अपने माता-पिता के दुख और मजबूरी को समझता था और वह मन लगाकर खूब पढ़ता।
नीरज के स्कूल में उसकी ही कक्षा में एक और छात्रा संजय पढ़ता था जो स्कूल के पास ही रहता था। संजय के माता-पिता पढ़े-लिखे तथा अमीर आदमी थे। उनका अपना बहुत-बड़ा व्यापार था। दर्जनों नौकर-चाकर थे। संजय अपने पाप के साथ रोज चमचमाती कार में स्कूल पढ़ने आता था और छुट्टी के समय फिर अपने पापा के साथ स्कूल से कार में ही वापस अपने घर जाता था।
संजय अमीर घर का लड़का होने के बाद भी पढ़ने लिखने में अच्छा था। वह अमीरी गरीबी के फर्क को तो नहीं मानता था परन्तु उसकी एक बहुत बुरी आदत थी झूठ बोलने की। अपनी इसी आदत के चलते वह पढ़ने में अच्छा होने के बाद भी अपने शिक्षकों के दिल में वह स्थान नहीं बना पया जो गरीब नीरज का था।
यूं तो संजय और नीरज आपस में काफी अच्छे दोस्त थे परन्तु संजय को यह बात अगर खटकती रहती थी कि स्कूल के शिक्षक नीरज को ज्यादा चाहते हैं और उसे कम। इसी वजह से संजय मन ही मन नीरज से ईर्ष्या रखने लगा।
नीरज ने संजय को हमेशा यही समझाया कि वह बहुत अच्छा लड़का है परन्तु उसकी एक बुरी आदत है झूठ बोलने की। अगर वह उसे छोड़ दे तो वह सबकी आंखों का तारा हो सकता है परन्तु संजय ने कभी नीरज की बात पर ध्यान नहीं दिया।
एक दिन संजय ने अपने एक साथी का बस्ता स्कूल की छत के ऊपर जान-बूझकर छिपा दिया और उसे यह झूठ बोलकर काफी परेशान किया कि उसका बस्ता उसे देर से आने की सजा देने की एवज में मास्टरजी आफिस में उठ ले गये हैं।
संजय की इस बात को सच मानकर जब उस छात्रा ने ऑफिस में जाकर मास्टर जी को सारा हाल बताया तो मास्टर जी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने संजय की खूब पिटाई की। संजय ने काफी देर बाद सच्चाई बतायी और स्कूल की छत पर उस छात्रा के छिपाकर रखे गये बस्ते को वापस लाकर दिया।
नीरज को यह सब बहुत बुरा लगा। उसने कई दिनों तक संजय से बात करनी बन्द कर दी। संजय इससे बहुत परेशान हो उठा। वह नीरज को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानता था। अब नया साल भी आने वाला था। स्कूल में नये साल के अवसर पर एक पार्टी का आयोजन किया गया था। इस पार्टी में सिर्फ वही छात्र भाग ले सकता था जिसे झूठ बोलने की आदत न हो।संजय के बारे में सभी लोग यह जानते थे कि उसे झूठ बोलने की बहुत बुरी आदत है इसलिए उसका इस पार्टी में भाग लेना तो असंभव ही था परन्तु इस पार्टी में नीरज भी भाग नहीं लेगा, यह बात किसी की समझ में नहीं आयी। नये साल की पार्टी में नीरज भी भाग नहीं ले रहा है, यह जानकारी जब संजय को मिली तो वह हैरान रह गया। वह तुरन्त नीरज के पास पहुंचा और पार्टी में भाग में लेने का कारण पूछा।
इस पर नीरज ने संजय को बताया कि वह संजय को अपना सच्चा दोस्त मानता है परन्तु संजय को झूठ बोलने की आदत है। जब दोस्त ही झूठा हो तो उसका सच्चा दोस्त नये साल की पार्टी में भाग कैसे ले सकता है। नीरज की बात सुनकर संजय सन्न रह गया और उसने संकल्प लिया कि अब वह कभी भी झूठ नहीं बोलेगा और हमेशा सच्चाई का साथ देगा। संजय के इस परिवर्तन को देखकर नीरज ने उसे गले से लगा लिया और दोनों फूट-फूटकर रो पड़े।
स्कूल के मास्टर जी चुपके से सारा माजरा देख और सुन रहे थे। वे संजय और नीरज के पास आये और बोलेए ‘तुम दोनों की दोस्ती वास्तव में सच्ची है और तुम दोनों स्कूल की नववर्ष पार्टी में हिस्सा ज़रूर लोगे।’ मास्टर जी को आश्वासन पाकर नीरज और संजय खुशी के मारे उछल पड़े। (उर्वशी)



