गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन होने की सम्भावना
ठंड और बारिश गेहूं की फसल के लिए बहुत फायदेमंद है। इस वर्ष कड़ाके की ठंड भी पड़ रही है और पर्याप्त बारिश भी हो रही है। जनवरी में पंजाब में सामान्य 19.1 एम.एम. की बजाय 34.3 एम.एम. बारिश हुई, जो गेहूं की फसल को घी की तरह लगी। कृषि और किसान कल्याण विभाग के अनुसार इस वर्ष गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन होने की संभावना है, जो 185-186 लाख टन तक पहुंच सकता है। वर्ष 2018-19 में अब तक गेहूं का 182.62 लाख टन रिकार्ड उत्पादन हुआ था। इस वर्ष का उत्पादन इसे पार कर जाएगा।
पटियाला के निकट बिशनपुर छन्ना के प्रगतिशील किसान राजमोहन सिंह कालेका, जिन्हें भारत सरकार के साथ पंजाब सरकार से ‘कृषि करमन’ अवॉर्ड मिला है और पीएयू से सम्मानित एवं आईएआरआई के फैलो फार्मर अवॉर्डी हैं, कहते हैं कि पीएयू द्वारा विकसित पी.बी.डब्ल्यू.-872, पी.बी.डब्ल्यू.-826, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित एच.डी.-3386, एच.डी.- 3226 और आईसीएआर—भारतीय गेहूं एवं जौ के अनुसंधान संस्थान द्वारा जारी की गईं डी.बी.डब्ल्यू.-327, डी.बी.डब्ल्यू.-372 जैसी ज़्यादा पैदावार देने वाली किस्मों की काश्त बड़े रकबे पर की गई है। उनके खेतों में खड़ी फसल दर्शाती है कि प्रति हेक्टेयर पैदावार में गत वर्ष के मुकाबले काफी वृद्धि होगी।
गुल्ली डंडा नदीन जो गेहूं के उत्पादन को कई खेतों में 40 प्रतिशत तक प्रभावित करता है, संबधी उन्होंने कहा कि किसानों द्वारा यूपीएल जैसे स्टैंडर्ड कम्पनियों द्वारा दिए गए स्परूस, शगन 21-11, टोटल तथा झटका जैसे नदीननाशक का समय पर छिड़काव करने पर खेतों से लगभग गायब हो गया। फतेहगढ़ साहिब ज़िले में अमलोह के निकट धर्मगढ़ गांव के प्रगतिशील किसान बलबीर सिंह जड़िया का कहना है कि उन्होंने अपनी ज़मीन को लेज़र लेवलर से समतल करवा कर गेहूं की बुआई की और स्तरीय नदीननाशकों का छिड़काव किया जिससे फसल में गुल्ली डंडा बिल्कुल नहीं हुआ।
आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान) दिल्ली के गेहूं के मुख्य ब्रीडर डॉ. राजबीर यादव के अनुसार पंजाब में ही नहीं, पूरे भारत में गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन होने की सम्भावना है और भारत में गेहूं की काश्त का रकबा भी दस लाख (एक मिलियन) हेक्टेयर बढ़ा है। गत वर्ष यह रकबा 32.80 मिलियन हेक्टेयर था, जिससे उत्पादन 117.90 मिलियन टन हुआ था।
डॉ. यादव ने कहा है कि गेहूं के अनुमानित उत्पादन को प्राप्त करने के लिए आगामी दिनों में किसान पीली कुंगी से फसल को बचा कर रखें और खेतों का लगातार सर्वेक्षण करते रहें। पंजाब में पहाड़ी व तराई के क्षेत्रों से पीली कुंगी रोपड़, होशियारपुर से प्रवेश करती है और अधिक नमी वाले क्षेत्रों में नहरों के किनारे अमृतसर, यमुनानगर (हरियाणा) ज़िलों में भी फसल को पीली कुंगी से बचाने हेतु विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है। जिस गेहूं की लंबाई अधिक है, वहां किसानों को ‘लिहोसिन’ जैसी किसी सिफारिश की गई दवाई का छिड़काव करना चाहिए। इससे गेहूं गिरने से बच जाएगा और उत्पादन बरकरार रहेगा।
डा. राजबीर यादव का कहना है कि गेहूं की फसल के लिए अब तक मौसम बहुत अनुकूल है। सिर्फ वही ज़मीनें जहां पानी खड़ा हो जाता है, वहां थोड़ी-बहुत फसल प्रभावित हो सकती है। किसानों ने पीएयू, आईसीएआर तथा आईएआरआई की सिफारिशों को पूरी तरह अपनाया है, जो गेहूं का उत्पादन बढ़ाने में बहुत सहायक होंगी।
उन्होंने रासायनिक खाद जैसे यूरिया, डीएपी और अन्य खादों की पर्याप्त खुराक से ज़्यादा मात्रा में डाली है। चाहे उन्हें इन खादों का समय पर प्रबंध करने में दिक्कत हुई, लेकिन उन्होंने मिक्सचरों को डीएपी के स्थान पर बुआई के समय इस्तेमाल करके फसल की पूरी देखभाल की। इससे उत्पादन बढ़ेगा। अब किसानों को देर से बोए गए गेहूं में सामान्य समय पर बोए गए गेहूं के लिए की गई नाइट्रोजन डालने की सिफारिश से 25 प्रतिशत यूरिया की मात्रा कम कर देनी चाहिए।
इस वर्ष गेहूं का ज़रूरत से ज्यादा भंडार पड़ा है। बीज बिक्रेताओं और उत्पादकों के प्रमाणित किस्मों के बीज अधिक मात्रा में इस वर्ष नहीं बिके। अब जब वे इसे गेहूं के दाम पर बेच रहे हैं, उन्हें मंडी में लाभदायक दाम नहीं मिल रहा। सरकार ने जो न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है, उसके आस-पास ही लगभग 2600 रुपये प्रति क्ंिवटल दाम मिल रहा है। इससे उनका खर्च भी पूरा नहीं होता। किसानों को चिंता है कि उन्हें गेहूं के मंडीकरण में कहीं मुश्किलें न आएं। इस संबंध में सरकार द्वारा उचित प्रबंध किए जाने चाहिएं।
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