बूढ़ों का देश
देखते ही देखते हमने दुनिया के सबसे युवा देश को बूढ़ों का देश बनते देख लिया है। बूढ़ा कौन होता है? विद्वान कहते हैं बूढ़ों का देश वह होता है जहां के लोग अपनी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा न कर सकें। जी हां, खुद पूरा न कर सकें। क्या आपको नहीं लगता कि इस देश के रहने वाले अधिक लोग सुबह से लेकर रात तक अपनी ज़रूरतों को स्वयं पूरा नहीं करते हैं, या इसे पूरा करने के लिए खुदाई ताकतों पर अर्थात छप्पड़ फाड़ कर धन बरस जाने या आलाधिकारियों की लाटरी खुल जाने पर भरोसा करते हैं। जो ऐसा नहीं करता वह बूढ़ा नहीं है, चाहे उसकी उम्र कितनी ही क्यों न हो।
कहते हैं हमारे पड़ोसी देश चीन और जापान हम से भी पहले बूढ़े हो गये हैं। इसका कारण उनकी प्रजनन दर का कम हो जाना बताया जाता है। ‘हम एक हमारा एक’ की कृपा से चीन की प्रजनन दर तो इतनी कम हो गई कि वहां बूढ़ों की भरमार हो गई है, और उनकी मंडियों में मांग बच्चों की दूध की बोतलों से अधिक कांपते हाथों की छड़ियों की हो गई है। जब इसी कृपा से आबादी के लिहाज़ से भारत ने चीन को पछाड़ दिया तो अब वहां नारा ‘हम एक हमारे तीन’ का बन गया है जो बेशक हमारे नारे ‘हम दो हमारे दो’ से बेहतर है। आबादी के लिहाज़ से तो हम दुनिया में नम्बर एक हो गये, लेकिन सस्ते राशन की दुकानों के बाहर खड़ा होने में अभी हम नम्बर एक हैं। काम की जगह आराम को प्राथमिकता देने में भी हम नम्बर एक हैं क्योंकि हमारे लिये सस्ती रोटी का इंतज़ाम तो भाग्य विधाताओं ने अनन्त काल तक के लिए कर दिया है।
इस देश ने सपने भी अजब गजब देखने शुरू कर दिये हैं। सपना है कि आज़ादी के सौवें वर्ष में हम दुनिया की सबसे मज़बूत आर्थिक शक्ति बन जाएंगे जिसमें सस्ता राशन मांगने वालों की और अपने खाते में बिना काम पैसे आ जाने की इच्छा रखने वालों की कतार दुनिया में सबसे अधिक लम्बी हो जाएगी। उस समय अपनी धरती असल में रिकार्ड बनाने वालों की धरती बन जाएगी। दुनिया में सबसे अधिक असमय बूढ़ों लोगों की धरती का रिकार्ड, बिना काम किये अस्सी करोड़ लोगों द्वारा सस्ता राशन और मुफ्त रियायतें मांगने का रिकार्ड, काम मांगने की जगह आराम की रेवड़ियां मांगने वालों का रिकार्ड।
अधिक बूढ़े तो चीन और जापान में भी हो गये हैं। बूढ़ों की संख्या वहां नौजवानों से कहीं अधिक हो गई है लेकिन वे सक्रिय बूढ़ों के देश हैं। नौजवान काम करते हैं और बूढ़े उनका मार्ग-दर्शन करते हुए परामर्श मण्डल बनाते हैं। इन देशों में रियाटरमैंट की कोई समय सीमा नहीं है बल्कि काम करते बूढ़ों ने अधिक जीने के रिकार्ड बना दिये हैं।
अपने देश का हाल दूसरा है। यहां न काम करने वालों बूढ़ों ने ही नहीं, नौजवानों ने भी निष्क्रिय हो जाने के रिकार्ड बना दिये हैं। इसलिए न्यायपालिका के रोकने के बावजूद हमारे लोकतांत्रिक देश के राजनीतिक दलों के चुनाव एजेंडे अधिक से अधिक मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की प्रतियोगिता से भरे रहते हैं।
यहां दौड़ कर आगे बढ़ने की या अगड़ा हो जाने की नहीं, बल्कि पिछड़ा कहलाने की दौड़ लग गई है क्योंकि उनको आरक्षण देने के पैमाने ढीले कर दिये गये हैं। सूचित-अनुसूचित जातियों के साथ-साथ अन्य पिछड़ी जातियों के शीर्षक की छतरी के तले आ जाने की दौड़ होने लगी है। खुदा गवाह है कि यहां एक राज्य में बरसों से हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं, क्योंकि एक बड़ी जाति कहती है, हमें भी पिछड़ा घोषित कर दो, और दूसरे पहले से घोषित पिछड़े घोषित कहते हैं, नहीं हमने यह नहीं होने देना, क्योंकि इससे हमारे आरक्षण की अनुदान राशि अधिक लोगों में बंट जाएगी। पर जनाब यह केवल अर्थाचार की समस्या ही नहीं। यहां सभ्याचार, कला-साहित्य, संस्कृति की कुर्सियों पर अधिकार जमाये बैठे अनाधिकारी लोगों की समस्या भी यही है। यहां भी वही ‘बाप न मारी मेंढकी, बेटा तीरन्दाज़ ही हो गया’ जैसा माहौल है।
जिन्होंने कभी एक किताब भी नहीं लिखी, वे अकादमियों के मलाईदार स्थानों पर कब्ज़ा जमाये बैठे हैं। अपने जन्म जात अलेखक हो जाने के बावजूद उम्र भर लेखन से पहचान के लिए जूझते और उपेक्षित हो मरते लोगों को बताते हैं कि बिना लिखे, गाये या चित्र बनाये साहित्य व कला के क्षेत्र में मूर्धन्य कैसे बना जा सकता है। इसके लिए इस घोर सांस्कृतिक देश में शार्टकट संस्कृति एक उपादेय हथियार के रूप में उभर कर स्थापित हो गई है वाचालता इसका प्रमुख गुण है, अर्थात अपना ढिंढोरा खुद पीटने में सिद्धहस्त होना, और इस क्षेत्र में बरसों से कलम लगे वरिष्ठों को नकारने और ध्वस्त होने में सिद्धहस्त होना एक सफल मार्ग।
लेकिन इसे केवल साहित्य, कला व संस्कृति तक ही क्यों सीमित करते हो। राजनीति और जीवन की हथेली पर सरसों जमा झोंपड़ी से प्रासाद हो जाने का मार्ग भी तो इसी रास्ते से जाता है। इसलिए शार्टकट संस्कृति ‘यहां सब चलता है’ का नारा युग-बोध बन गया है। इसमें अधिकांश आबादी की तमन्ना एक असमय बूढ़ा कहलाने की बन चुकी है। ये बूढ़े सफलता नहीं, सफलता के मिथ्या आंकड़ों में विश्वास रखते हैं। बदलाव चाहे कहीं नज़र न आये, उसकी लक्ष्य प्राप्ति का उत्सव मनाने में इनका सानी नहीं। देश इन मिथ्या आंकड़ों की कुतुबमीनार पर बैठे सफल वृद्धों की शोभायात्राओं से भर गया है। लगता है, आज हर अनुदान प्राप्त युवा की तमन्ना भी यही है कि मैं भी असमय बूढ़ा हो जाऊं, और जल्द से जल्द मेरी भी एक शोभायात्रा निकले।



