प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग भयावह हुआ

वर्तमान दौर में हमारे जीवन में प्लास्टिक एक ऐसा हिस्सा बन चुका है जिसके बिना आधुनिक जीवन की कल्पना करना कठिन लगता है। सुबह उठते ही टूथब्रश से लेकर दूध की थैली, मोबाइल कवर, पानी की बोतल, खाद्य पैकेजिंग, दवाइयों की शीशियां-हर जगह प्लास्टिक मौजूद है। यह हल्का है, सस्ता है, टिकाऊ है और आसानी से ढाला जा सकता है। इन्हीं खूबियों के कारण प्लास्टिक को कभी आधुनिक युग का चमत्कार कहा गया था लेकिन आज वही चमत्कार धीरे-धीरे मानवता और प्रकृति के लिए एक भयावह अभिशाप बनता जा रहा है। प्लास्टिक की सबसे बड़ी समस्या उसकी अविनाशी प्रकृति है। कागज, लकड़ी या कपड़ा समय के साथ नष्ट हो जाते हैं लेकिन प्लास्टिक सैकड़ों वर्षों तक मिट्टी, पानी और वातावरण में बना रहता है। यह न तो पूरी तरह सड़ता है, न ही प्रकृति में घुलता है। परिणामस्वरूप पृथ्वी पर प्लास्टिक का ढेर लगातार बढ़ता जा रहा है। नदियां, समुद्र, खेत, सड़कें-हर जगह प्लास्टिक कचरे की मौजूदगी सामान्य दृश्य बन चुकी है।
शहरों की जीवन शैली ने इस संकट को और गहरा किया है। यूज एंड थ्रो संस्कृति यानी इस्तेमाल करो और फेंक दो। इस मानसिकता ने प्लास्टिक के उपभोग को बेतहाशा बढ़ाया है। एक बार उपयोग में आने वाले प्लास्टिक बैग, कप, प्लेट, स्ट्रॉ और पैकेजिंग सामग्री हमारे आराम का साधन तो बने लेकिन पर्यावरण के लिए जहर साबित हुए। हम सुविधा के लिए कुछ मिनट प्लास्टिक का उपयोग करते हैं लेकिन उसकी कीमत प्रकृति को सदियों तक चुकानी पड़ती है।
प्लास्टिक प्रदूषण का सबसे भयावह रूप समुद्रों में दिखाई देता है। हर साल लाखों टन प्लास्टिक समुद्र में पहुंच जाता है। मछलियां, कछुए, पक्षी और अन्य जलचर इसे भोजन समझकर निगल लेते हैं, जिससे उनकी मौत हो जाती है। कई बार जानवर प्लास्टिक में उलझकर दम तोड़ देते हैं। यह केवल वन्य जीवन की समस्या नहीं है, बल्कि अंतत: वही प्लास्टिक खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर तक पहुंच जाता है। माइक्रोप्लास्टिक आज पानी, नमक, दूध और यहां तक कि हवा में भी पाया जा रहा है। प्लास्टिक केवल पर्यावरण ही नहीं, मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है। प्लास्टिक निर्माण में प्रयुक्त रसायन हार्मोन असंतुलन, कैंसर और अन्य बीमारियों से जुड़े पाए गए हैं। प्लास्टिक कचरे को जलाने से निकलने वाली जहरीली गैसें श्वसन रोगों को जन्म देती हैं। अनेक ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कचरा जलाना आम बात है, जिससे हवा और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि प्लास्टिक इतना हानिकारक है तो इसका उपयोग पूरी तरह बंद क्यों नहीं किया जा सकता? सच्चाई यह है कि प्लास्टिक के कुछ उपयोग वास्तव में उपयोगी और आवश्यक हैं जैसे चिकित्सा उपकरण, रक्त थैलियां, सीरिंज, आपातकालीन पैकेजिंग आदि। समस्या प्लास्टिक के अस्तित्व से अधिक उसके अनियंत्रित और अनावश्यक उपयोग की है।
समाधान का रास्ता भी हमारे व्यवहार से ही निकलता है। सबसे पहला कदम है प्लास्टिक के विकल्प अपनाना। कपड़े या जूट के थैले, स्टील और कांच की बोतलें, मिट्टी और पत्तल से बने बर्तन-ये सब हमारे पारंपरिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। आवश्यकता है उन्हें आधुनिक जीवन में फिर से स्थान देने की। दूसरा महत्वपूर्ण कदम है कम उपयोग, पुन: उपयोग और पुनर्चक्रण’ की भावना को अपनाना। सरकारों ने भी प्लास्टिक पर नियंत्रण के लिए नियम बनाए हैं। कई राज्यों में सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया गया है लेकिन कानून तभी प्रभावी होंगे, जब नागरिक उनमें सहभागी बनें। केवल जुर्माने या आदेश से समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए सामाजिक चेतना और नैतिक जिम्मेदारी ज़रूरी है। विद्यालयों, परिवारों और समाज को मिलकर नई पीढ़ी में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करनी होगी। 
बच्चों को यह सिखाना होगा कि सुविधा के साथ जिम्मेदारी भी आती है। सीमित और विवेकपूर्ण उपयोग में यह सुविधा हो सकता है लेकिन अंधाधुंध उपभोग में यह निस्संदेह एक अभिशाप है। आज ज़रूरत है कि हम प्रकृति के साथ अपने संबंध को फिर से समझें और यह स्वीकार करें कि सच्ची सुविधा वही है जो जीवन और पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित हो। (एजेंसी)

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