अब कौन और कैसे चलाएगा अजित पवार की एनसीपी

एनसीपी नेता अजित पवार की 28 जनवरी को एक विमान दुर्घटना में दुखद मौत से महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसा खालीपन पैदा हो गया है जिसे कोई भी अकेला राजनेता निकट भविष्य में नहीं भर सकता। राजनीतिक पुनर्गठन की एक संभावना, जिसका संकेत 15 जनवरी को हुए नगर निगम चुनावों और उसके नतीजों से पहले ही मिल गया था, जल्द ही साकार होने वाली है, क्योंकि प्राचीन सिद्धांत के अनुसार प्रकृति खालीपन को पसंद नहीं करती। महाराष्ट्र में नए गठबंधन, पहचान और क्षेत्रीय सौदेबाजी का दौर शुरू होगा।
मुम्बई में हाल ही में हुए बृहन्मुम्बई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव के दौरान हमने पहले ही देखा है कि एसनसीपी (अजित पवार) ने महायुति गठबंधन से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ा था और पुणे में एनसीपी (शरद पवार) के साथ हाथ मिलाया था। राजनीतिक बदलाव साफ  दिख रहा था। इसने पूर्व एनसीपी के दोनों गुटों के रुख को नरम कर दिया था। अब अजित पवार की मौत के बाद उनकी एनसीपी के भविष्य को लेकर कई परिदृश्य सामने आए हैं, उनमें से एक यह है कि उनकी पार्टी के कई नेता एनसीपी (शरद पवार) खेमे में लौट सकते हैं, और यह एक संभावना है कि लोग फिर से एक एकजुट एनसीपी देख सकते हैं, जिसे अजित पवार ने 2023 में तोड़ा था। तब उन्होंने अपने चाचा की एनसीपी से नाता तोड़ लिया था और भाजपा-शिवसेना (शिंदे) के नए सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल हो गए थे और राज्य के उप-मुख्यमंत्री बने थे।
चूंकि एनसीपी (शरद पवार) स्वाभाविक रूप से नैतिक अधिकार, राष्ट्रीय कद और सॉफ्ट पावर बनाए रखती है। इसलिए पार्टी पर मजबूत प्रशासनिक पकड़ वाले नेता की अनुपस्थिति में एनसीपी (अजित पवार) खेमे के कई नेता इसकी ओर आकर्षित होंगे। अजित पवार ने खुद पुणे में नगर निगम चुनावों में एनसीपी (शरद पवार) के साथ हाथ मिलाया था, इसलिए पार्टी के अन्य सदस्यों द्वारा भी ऐसा करने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
फिर भी अगर एनसीपी (अजित पवार) एक राजनीतिक दल के रूप में जीवित रहती है, तो यह अजित पवार जैसे मजबूत नेता के बिना, केवल एक गठबंधन करने वाली पार्टी या क्षेत्रीय नेताओं के लिए एक मंच के रूप में ही जीवित रहेगी। पार्टी काफी कमजोर हो जाएगी और भाजपा और शिवसेना (शिंदे) जैसी दूसरी राजनीतिक पार्टियों द्वारा सेंधमारी की जाएगी। एनसीपी (अजित पवार) के नेता के सामने यह तय करने का एक अहम समय है कि उन्हें एक पार्टी के तौर पर और महायुति गठबंधन में बने रहना है या नहीं। उनमें से कई भाजपा में चले जाएंगे या स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और शिवसेना गुटों के साथ गठबंधन कर लेंगे। फिर भी कई लोग दोनों एनसीपी गुटों का विलय करके फिर से एकीकृत एनसीपी बनाना चाहेंगे। अगर एनसीपी (अजित पवार) बच भी जाती है तो एक कमज़ोर राजनीतिक पार्टी बनकर रह जाएगी।
अजित पवार की गैर-मौजूदगी में भाजपा उनके गढ़ों में फायदा उठा सकती है, खासकर पश्चिमी महाराष्ट्र में उन नेताओं के ज़रिए जिन्हें वे अपने साथ मिलाना चाहेंगे, विशेषकर शहरी या अर्ध-शहरी इलाकों में, जैसा कि हाल के कॉर्पोरेशन और नगर निकायों के चुनावों से पता चलता है और इस प्रक्रिया में संस्थानों, संसाधनों और राजनीति पर ज़्यादा नियंत्रण हासिल कर सकती है। हालांकि भाजपा के साथ दिक्कत यह है कि वह अपनी सीमाओं तक पहुंच चुकी है। सांप्रदायिक राजनीति वहां फायदा नहीं उठा सकती, जहां जातिगत समीकरण, ग्रामीण सहकारी नेटवर्क में इसका विरोध और अपनी सांस्कृतिक वैधता के लिए सहयोगियों पर निर्भरता मुख्य कारक हैं। ये सभी संकेत देते हैं कि हालांकि भाजपा राज्य में एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी बनी रहेगी, लेकिन अगर वह एनसीपी (अजित पवार) के कार्यकर्ताओं का ख्याल नहीं रखती है तो वह अजेय नहीं रहेगी। वे चाहेंगे कि पार्टी के नेता महायुति के साथ रहें। शिवसेना (शिंदे) हाल के शहरी निकायों के चुनावों में ज़्यादा मज़बूत होकर उभरी है। अजित पवार की गैर-मौजूदगी में वह एनसीपी (अजित पवार) के नेताओं के साथ अपने रिश्ते मजबूत करना चाहेगी, क्योंकि अजित पवार के बाद पहचान आधारित राजनीति में यह उनके लिए महत्वपूर्ण होगा।
महाराष्ट्र वर्तमान में राजनीति में सबसे बड़े बदलाव से गुजरने वाला है पूरी राजनीति गठबंधन से बंधी होगी, और कोई भी नेता अजीत पवार की मौत से पैदा हुए खालीपन को भर नहीं पाएगा। पूरे राज्य में मराठा और ओबीसी राजनीति को फिर से व्यवस्थित करने की ज़रूरत होगी। शरद पवार अभी भी अपने समर्थकों के बीच सबसे ज़्यादा सम्मानित हैं, लेकिन फिर चार युवा नेता हैं—शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले, अजीत पवार की पत्नी या उनके बेटे पार्थ पवार या जय पवार। अब एनसीपी (अजीत पवार) को कौन चलाएगा और कैसे? यह महाराष्ट्र की राजनीति के राजनीतिक पुनर्गठन के साथ भविष्य के गर्भ में छिपा है। (संवाद)

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