जैव विविधता की समृद्धि का आधार है आर्द्रभूमि

आज विश्व आर्द्रभूमि पर विशेष

प्रकृति जीवों-पादपों की पोषक है, सांसों का स्पंदन है। प्रकृति की रचना में जीवन का सौंदर्य एवं लास्य नर्तन है। प्रकृति की यह वैविध्यपूर्ण बनावट धरती में जीवन गढ़ती है, रचती है। नदी, झीलए, डेल्टा, घाटी, जल, जंगल, पर्वत, पठार, उदधि, उपवन, रेत, खेत इन सभी में सौंदर्य बिखरा पड़ा है जो मानव मन को आकर्षित करता है। लेकिन प्रकृति की तमाम अद्भुत रचनाओं में से एक रचना पर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता। हम उसके महत्व एवं पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी भूमिका से सर्वथा अपरिचित हैं और वह अप्रतिम प्राकृतिक संरचना है आर्द्रभूमि अर्थात् धरती का नमी वाला क्षेत्र। 
आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र अंतर्गत धरती का वह विशेष क्षेत्र होता है जो आंशिक या पूर्णत: वर्ष भर, न्यूनतम आठ महीने, प्राय: जल में डूबा रहता है और जहां जलीय पादपों एवं जल-जीवों की तमाम प्रजातियां विकसित होकर इको सिस्टम को समृद्ध करती हैं। एक प्रकार से भरपूर नमीयुक्त यह दलदली भू-भाग जलीय एवं स्थलीय जैव विविधता का मिलन बिंदु या संधि क्षेत्र होता है। दुर्भाग्य से मानवीय हस्तक्षेप से सम्पूर्ण विश्व में आर्द्रभूमि पर संकट उभरा है जो न केवल मानव जीवन बल्कि पूरे जीव-पादप विकास एवं जैव जीवन पर खतरा बनकर मंडरा रहा है, क्योंकि आर्द्रभूमि का खत्म होना या क्षेत्र कम होना पारिस्थितिकी तंत्र के प्राकृतिक चक्र को अस्थिर कर देगा और तब तमाम जीव-पादप प्रजातियां विलुप्त हो जायेंगी। इस दृष्टि से विचार करके 2 फरवरी, 1971 को कैस्पियन सागर के तट पर ईरान के रामसर नगर में आर्द्रभूमि के संरक्षण, युक्तिसंगत उपयोग एवं तत्संबंधी वैश्विक जागरूकता के लिए आयोजित सम्मेलन में एक समझौता हुआ जिसे रामसर संधि कहा जाता है। इसमें कहा गया कि प्रत्येक देश अपने यहां प्राकृतिक आर्द्रभूमि (नेचुरल वेट लैंड ) को चिह्नित करेगा। ऐसे चिह्नित सभी स्थल रामसर साइट कहे जायेंगे और उनकी एक समग्र वैश्विक सूची बनाई जायेगी। वर्तमान समय में इस सूची में 172 देशों की 2530 से अधिक आर्द्र भूमियों का अंकन किया गया है। संख्या की दृष्टि से सबसे अधिक रामसर साइट ब्रिटेन में हैं तो क्षेत्रफल के हिसाब से दक्षिण अमरीकी देश बोलविया शीर्ष पर है।  अमरीका का एवरग्लेड्स वेटलैंड विश्व की सबसे बड़ी रामसर साइट है। इसके साथ ही इन सूचीबद्ध रामसर आर्द्रभूमियों में से ऐसे स्थल जो मानवीय हस्तक्षेप, प्रदूषण एवं तकनीकी विकास के कारण बड़े बदलावों का शिकार हुए या हो रहे हैं, उन्हें मोंट्रिक्स रिकार्ड नामक एक पंजिका में अंकित कर संरक्षण के विशेष प्रयास किये जाने हेतु योजना बनाई गयी है और सरकारी एजेंसियों एवं पर्यावरण मुद्दे पर केंद्रित स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा योजनानुसार संरक्षण कार्य किये जा रहे हैं। मोंट्रिक्स रिकार्ड सूची में भारत के दो आर्द्र स्थल शामिल हैं। वर्ष 1990 में केवलादेव घना पक्षी बिहार, भरतपुर (राजस्थान) तथा 1993 में लोमतक झील मणिपुर को संकटग्रस्त रामसर साइट के रूप में पहचाना गया। रामसर सम्मेलन के 26 साल बाद 2 फरवरी, 1997 को पहली बार विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया गया।
रामसर संधि के तहत समुद्र स्तर से 6 मीटर ऊंचा ज्वार-भाटा आच्छादित तटीय क्षेत्र एवं गहरे धान क्षेत्र, डेल्टा, झीलें आदि आर्द्रभूमि अंतर्गत शामिल हैं। विश्व की एक अरब आबादी का जीवन यापन आर्द्रभूमि पर ही निर्भर है। वहीं भूमि आधारित कार्बन के 30 प्रतिशत हिस्से का स्रोत भी यही वेट लैंड साइट ही है। आर्द्रभूमि के महत्व को हम यूनेस्को के एक कथन से समझ सकते हैं कि आर्द्रभूमि पर खतरा उत्पन्न होने से विश्व की 40 प्रतिशत वनस्पतियों एवं जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा जो इन आर्द्रभूमियों पर पाये जाते हैं और प्रजनन करते हैं। विश्व की भू-सतह का 6 प्रतिशत हिस्सा आर्द्रभूमि है। भारत 98 रामसर साइट के साथ एशिया में प्रथम स्थान पर है। ये आर्द्रभूमि लगभग तेरह लाख हेक्टेयर भू-क्षेत्र को आच्छादित करती हैं। इनमें चिल्का झील उड़ीसा, नंगल एवं रोपड वेटलैंड पंजाब, भिंडावास अभयारण्य हरियाणा, कांवर झील बिहार, अष्टमुड़ी केरल, दीपोर आर्द्र भूमि असम, सांभर झील राजस्थान, रुद्रसागर झील त्रिपुरा, रेणुका आर्द्र भूमि हिमाचल प्रदेश, सुंदरवन पश्चिम बंगाल, केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर पक्षी विहार, राजस्थान), स्तार्ता सापुक लद्दाख, भोज आर्द्र भूमि मध्य प्रदेश आदि सहित दो नये साइट पटना पक्षी विहार, एटा उत्तर प्रदेश तथा छारी ढांड कच्छ गुजरात को वर्ष 2025 में ही इस सूची में शामिल किया गया है। इनमें हिमाचल एवं लद्दाख सहित उत्तरी ठंडे एवं शुष्क क्षेत्र, दक्षिण का तटीय क्षेत्र, मानसूनी वन प्रदेश, बाढ़ वाले मैदानी इलाके, डेल्टा एवं झीलें आदि सम्मिलित हैं। 4230 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला सुंदरवन भारत का सबसे बड़ा रामसर साइट है तो हिमाचल का रेणुका वेटलैंड सबसे छोटा मात्र 0.2 वर्ग किमी क्षेत्र है, जिसकी घोषणा 15 अक्टूबर, 2012 को हुई थी। उल्लेखनीय है कि रामसर संधि भारत में फरवरी 1982 से लागू हुई। आर्द्र भूमियों के उचित संरक्षण एवं रख-रखाव के लिए एक केंद्रीय कानून आर्द्र भूमि संरक्षण एवं प्रबंधन नियम 2017 के अंतर्गत सुनियोजित ढांचा विकसित किया गया है। (एजेसी)

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