इस बार बजट में कर रियायतों की संभावना कम
1 फरवरी, 2026 को पेश होने वाले बजट के लिए देश की मौजूदा घरेलू आर्थिक परिस्थितियां दमदार हैं, परन्तु विदेशी मोर्चे पर देश के लिए कुछ चिंता की लकीरें कायम हैं। मौजूदा वित्त वर्ष में घरेलू मोर्चे पर कई खुशगवार घटनाएं घटित हुई जिसमें सबसे पहले तो देश की इस साल अनुमानित विकास दर साढ़े छह फीसदी से बढ़कर साढ़े सात फीसदी होने का अनुमान हैं। इस बावत भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपना अनुमान संशोधित तो किया ही है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसी कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अपना विकास अनुमान 7 फीसदी से ऊपर कर दिया है। कोरोना के बाद पहली बार देश का वित्तीय घाटा लक्ष्य अनुमान के बराबर 4.2 फीसदी रहने की उम्मीद है। सबसे बड़ी बात जीएसटी कर स्लैबों की संख्या चार से घटाकर 2 और अधिकतम कर दर की मात्रा 28 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने और कई उत्पादों और सेवाओं को कर मुक्त तथा कई उत्पादों व सेवाओं के कर में की गई कटौती से देश के घरेलू मांग, उपभोग और बिक्री कारोबार में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई।
अकेले दीवाली के त्योहारी सीजन में 10 लाख करोड़ रूपये का अतिरिक्त कारोबार अर्थव्यवस्था में दर्ज हुआ। इसका नतीजा ये हुआ कि देश के उत्पादन क्षेत्र को एक नई संजीवनी मिली। तो दूसरी तरफ मुद्रास्फीति चाहे वह खुदरा मामले में हो या थोक मामले, उसमें रिकॉर्ड गिरावट कुल मिलाकर 2 फीसदी से नीचे तक कायम रही है। इसके अलावा देश में आधारभूत संरचना के सभी क्षेत्रों में विकास की गति पूर्ववत कायम है यानी वित्त मंत्री के लिए अर्थव्यवस्था के अधिकतर घरेलू मैक्रो इकोनॉमिक इंडिकेटर बेहतरीन हैं, परन्तु विदेशी मोर्चे पर भारत के लिए चिंता की लकीरें अभूतपूर्व रूप से कायम हैं। अमरीका के अतिरिक्त टैरिफ के बोझ से भारत की बाह्य अर्थव्यवस्था पर तीन-तरफा असर पड़ा है। इसका त्वरित असर अमरीका को होने वाले निर्यात पर पड़ा, जो अभी तक हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था और उस पर करीब 100 अरब डॉलर का व्यापार अतिरेक हासिल था। इसमें अभी 20 फीसदी की फौरी गिरावट हुई है। दूसरा असर जो भारत अपने बढ़ते विदेशी मुद्रा कोष के लिए जाना जा रहा था, उसमें अब तेजी से गिरावट हो रही है। 700 बिलियन डॉलर का हमारा कोष 600 बिलियन डॉलर के आस-पास चला गया। इसके असर से रुपये का मूल्य डॉलर के मुकाबले निरन्तर घट रहा है। इन सभी प्रभावों से भारत के स्टॉक मार्केट भी काफी प्रभावित हुए हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों के निवेश खींचने और लगाने से भारतीय शेयर बाज़ार पूरे तौर से प्रभावित होता रहा है। देखा जाए तो पिछले 16 महीने में भारत का शेयर बाज़ार ढलान पर ही रहा।
विदेशी मोर्चे पर इधर अच्छी बात ये रही कि इधर भारत ने कई देशों के साथ सफल मुक्त व्यापार समझौते को अंजाम दिया। इसमें अभी हाल ही में यूरोपीय संघ के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता इस वित्त वर्ष की सबसे खुशगवार घटना कही जाएगी। इससे पूर्व ग्रेट ब्रिटेन के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता, उसके बाद न्यूज़ीलैंड, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान के साथ हुआ समझौता है। यूरोपीय संघ के साथ भारत के समझौते को मदर आफ ऑल ट्रेड डील्स बताया जा रहा है। जर्मनी के साथ भी भारत का व्यापार समझौता पाइपलाइन में है। उम्मीद लगाई जा रही है अमरीका से भी व्यापार समझौता देर-सवेर संभव होगा, खबरें आयी हैं कि भारत पर लगे 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ को अमरीका हटा सकता है।
देश में उभरी बाह्य अर्थव्यवस्था की नई परिस्थितियों के अनुरूप वित्त मंत्री ने इस बार के बजट में कस्टम्स यानी आयात कर सुधारों को लाने की तरफ इशारा किया है जो मुक्त व्यापार समझौते को और आसान बनायेगा। ज़ाहिर है कि तब भारत की आयात जनित अर्थव्यवस्था में आयात की मात्रा और बढ़ेगी, परन्तु निर्यात के भी ज़बरदस्त बढ़ने की संभावना होगी। मुक्त व्यापार समझौते से भारतीय निर्यात उद्योग और प्रतियोगी होंगे। इस बार के बजट में भी देश के पूंजीगत क्षेत्र में निवेश और बढ़ेगा जिसका सिलसिला पिछले छह साल से निरन्तर कायम है। तीसरा, रक्षा क्षेत्र में बजट आबंटन काफी ज्यादा बढ़ेगा। इस क्षेत्र को न केवल सामरिक दृष्टि से बल्कि एक उद्योग के रूप में पनपने की योजना बड़े ज़ोर-शोर से देश में चल रही है। यूरोपीय संघ के साथ व्यापारिक समझौता बहुत जल्द सामरिक समझौते को भी अपने में शामिल करेगा। इससे देश के रक्षा उद्योग के विस्तृत होने की बहुत संभावना होगी। मौजूदा मोदी सरकार रोज़गार के मोर्चे पर आलोचनाओं का खूब सामना करती रही है। आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं कि संगठित सरकारी क्षेत्र में नई भर्तियां निरन्तर संकुचित हो रही हैं। मगर मोदी सरकार की रोज़गारी को लेकर खासकर शैक्षणिक रोज़गार पर सोच ये है कि स्टार्टअप के ज़रिए स्व-रोजगार पर ज़ोर दिया जाए और दूसरा कॉरपोरेट निजी क्षेत्र में रोज़गार सृजन को प्रोत्साहन दिया जाए और तीसरा, सरकारी क्षेत्र में मौजूदा श्रम शक्ति से ही काम चलाया जाये।
इसे लेकर पिछले बजट में तीन बड़ी निजी रोज़गार व प्रशिक्षण प्रोत्साहन योजना घोषित की गईं। इसमें तीन करोड़ रोज़गार उत्पन्न करने की बात की गई थी। इन योजनाओं की कोई समीक्षा रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई, परन्तु सरकार का दावा है वर्ष 2025 में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के 1.29 करोड़ नए सदस्य बने। स्टार्टअप व्यवसाय के मामले में देश में इसकी संख्या 2 लाख से ऊपर और रोज़गार की मात्रा 22 लाख तक पहुंच गई है। इससे अंदाज़ा लगता है कि निजी रोज़गार की वृद्धि दर ज्यादा उदासीन नहीं, बल्कि सामान्य है।
कुल मिलाकर इस बजट में कर रियायतों की संभावना कम है, क्योंकि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों करों में पहले ही कटौती की जा चुकी है। इस बार ज्यादा ध्यान बदलते दौर में विकास के बदलते विज़न और नई अर्थव्यवस्था के उभरते क्षेत्रों विद्युत वाहन, हरित ऊर्जा, प्राकृतिक और यौगिक कृषि और डिजिटल क्षेत्र के सभी पहलुओं को लेकर नए बजट आबंटन पर होगा। साथ ही वाह्य अर्थव्यवस्था को लेकर आत्मनिर्भरता के नारे के नए आयाम खोजने पर केंद्रित होगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



