मुम्बई की कला चेतना का प्रतीक है काला घोड़ा आर्ट फेस्टिवल

अगर किसी एक आयोजन को मुम्बई की कला चेतना का प्रतीक कहा जा सकता है, तो वह निस्संदेह ‘काला घोडा आर्ट्स फेस्टिवल’ है। साल 2026 में यह एक बार 31 जनवरी से 8 फरवरी के बीच मुम्बई के फोर्ट इलाके को कला-संस्कृति और संगीत के जीवंत केंद्र में बदल देगा। काला घोड़ा आर्ट फेस्टिवल सिर्फ रंगों, मंचों और प्रदर्शनों का सिलसिला भर नहीं है बल्कि इस शहर की आत्मा का सार्वजनिक उद्धोष है जो रोज़मर्रा की आपाधापी में भी रचनात्मकता को मरने नहीं देता। मुम्बई जहां दिन-रात काम करना, एक मजबूरी का नाम है, वहीं काला घोड़ा उत्सव इस मजबूरी के बीच ठहरकर सोचने, देखने और सवाल करने की मोहलत देता है। इस फेस्टिवल में कला दीवारों पर टंगी हुई तस्वीरें चुप नहीं रहती, बल्कि सड़क पर उतरकर दर्शक से आंख मिलाती है। यहां कविता बहस बन जाती है, नाटक सामाजिक हस्तक्षेप और चित्र समकालीन बेचौनी का दस्तावेज़। काला घोड़ा उत्सव उस मुंबई को सामने लाता है जो सिर्फ मुनाफे और रफ्तार से नहीं पहचानी जाती, बल्कि विचार, असहमति और सौंदर्य-बोध से भी अपनी पहचान गढ़ती है।
इस उत्सव में शामिल होना किसी कार्यक्रम में जाना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक वक्तव्य का हिस्सा बनना है। साथ ही यह स्वीकार करना भी है कि महान शहर सिर्फ ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि जीवित कला चेतना से भी महान होते हैं। काला घोड़ा वही चेतना है, जो हर साल मुम्बई को खुद से रूबरू कराती है। भारतीय कला उत्सवों की लंबी और समृद्ध परंपरा में काला घोड़ा आर्ट्स फेस्टिवल, एक ऐसा नाम है, जो सिर्फ किसी आयोजन का नहीं बल्कि एक शहरी सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। यह उत्सव हर वर्ष जनवरी-फरवरी में आयोजित होकर कला, साहित्य, रंगमंच, संगीत, डिज़ाइन, फिल्म, वास्तुकला, स्ट्रीट परफॉर्मेंस और जन-संवाद को एक साझा मंच पर ले आता है। यह उत्सव किसी बंद हॉल या टिकट-आधारित अभिजात्य कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहता बल्कि शहर की सड़कों, विरासत इमारतों और सार्वजनिक स्थानों को खुली कला-दीर्घा में बदल देता है। यही वजह है कि भारतीय कला उत्सव कलेंडर में इसका स्थान विशिष्ट, अनिवार्य और लगभग अपूरणीय माना जाता है।
कला से आगे एक सामाजिक प्रयोग
काला घोड़ा कला उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ‘कला’ को विशेषज्ञों की बपौती नहीं बनने देता। यहां कला आम नागरिक से सीधे संवाद करती है। स्ट्रीट थिएटर में सामाजिक मुद्दे उठते हैं, फोटोग्राफी प्रदर्शनियां समकालीन भारत की बेचौनियों को दर्ज करती हैं, साहित्यिक चर्चाओं में युवा और वरिष्ठ रचनाकार आमने-सामने होते हैं, बच्चों के लिए कला कार्यशालाएं भविष्य की रचनात्मक पीढ़ी तैयार करती हैं। इस अर्थ में काला घोड़ा सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक सांस्कृतिक अभ्यास है।
मुंबई को कलात्मक बनाता है काला घोड़ा उत्सव?
भारत की आर्थिक राजधानी को काला घोड़ा उत्सव, केवल पैसों का शहर नहीं रहने देता। यह साबित करता है कि मुंबई विचार, सौंदर्य-बोध और रचनात्मक जोखिम लेने की भी राजधानी है। यह उत्सव दिखाता है कि यह शहर सिर्फ शेयर मार्किट और रियल एस्टेट तक सीमित नहीं है बल्कि कविता, चित्रकला, इंस्टॉलेशन आर्ट और बहसों का भी घर है। काला घोड़ा फेस्टिवल इस शहर को विरासत और आधुनिकता का सेतु बनाता है। काला घोड़ा खुद में औपनिवेशिक वास्तुकला का जीवित संग्रहालय है। उत्सव के दौरान ये इमारतें बैकड्रॉप नहीं रहतीं, बल्कि संवाद का हिस्सा बन जाती हैं। यह विरासत और आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच ऐसा सेतु बनाता है, जो भारत के बहुत कम शहरों में दिखता है।
 मुंबई का सॉफ्ट पावर
आज के समय में शहरों की पहचान केवल जीडीपी से नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक छवि से भी बनती है। काला घोड़ा उत्सव मुंबई को एक ऐसे वैश्विक शहर के रूप में प्रस्तुत करता है, जो खुले विचारों वाला है, विविधता को स्वीकार करता है, बहस और असहमति से नहीं डरता। यह ‘सॉफ्ट पावर’ पर्यटन, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और रचनात्मक उद्योगों को भी आकर्षित करता है।
युवा रचनाकारों का लांच पैड
देश के कई मौजूदा चर्चित कलाकार, लेखक और डिज़ाइनर पहली बार बड़े दर्शक वर्ग से यहीं रूबरू हुए। यह उत्सव बिना किसी भारी संस्थागत बाधा के युवाओं को मंच देता है- और यही इसकी सबसे प्रगतिशील भूमिका है। अगर काला घोड़ा कला उत्सव न हो, तो मुंबई सार्वजनिक सांस्कृतिक स्पेस खो देगी। मुंबई पहले ही भीड़, रफ्तार और संघर्ष का शहर है। काला घोड़ा उत्सव उसे रुकने और सोचने का मौका देता है। इसके बिना शहर के पास ऐसा कोई बड़ा, मुक्त और गैर-व्यावसायिक कला मंच नहीं बचता।
कला का जनतंत्रीकरण
यह फेस्टिवल कला और तमाम कलात्मक गतिविधयों को जो इसकी अनुपस्थिति में गैलरियों, प्राइवेट क्लबों, महंगी टिकटों तक सिमटा रहता है, एक मंच में खींच लेता है। क्योंकि काला घोड़ा इस कृतिम दीवार को तोड़ता है; बाद में उसके बिना यह दीवार फिर खड़ी हो जाती है। हर साल का यह उत्सव उस समय के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्नों को भी गंभीरता से दर्ज करता है। इसके बिना मुंबई की समकालीन सांस्कृतिक डायरी अधूरी रह जाती है। यह उत्सव मुंबई को याद दिलाता है कि वह सिर्फ ‘काम करने का शहर’ नहीं, बल्कि सपने गढ़ने का शहर भी है। इसके बिना  शहर की  रचनात्मक थकान और बढ़ जाती है। काला घोड़ा कला उत्सव को केवल एक वार्षिक आयोजन के रूप में देखना उसकी भूमिका को कम करके आंकना होगा। यह मुंबई की सांस्कृतिक आत्मा की सामूहिक अभिव्यक्ति है। भारतीय कला उत्सव कैलेंडर में इसकी महत्ता इसलिए भी है क्योंकि यह कला को जीवन से अलग नहीं, जीवन के बीच रखता है। इसके बिना मुंबई आर्थिक रूप से वही रह सकती है, पर सांस्कृतिक रूप से वह कुछ ज्यादा खामोश, कुछ ज्यादा थकी हुई और कुछ कम जीवंत हो जाएगी और किसी भी महान शहर के लिए यह सबसे बड़ा नुकसान होता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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