देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा अवैध खनन
पंजाब के सीमांत क्षेत्रों में बड़े स्तर पर वैध-अवैध ढंग से किया जा रहा खनन समय के अन्तराल के साथ इतना व्यापक रूप धारण कर गया है कि इससे चिन्ता का उपजना बहुत स्वाभाविक-सी बात लगता है। पंजाब एक सीमांत राज्य है जिसकी सीमाएं अनेक स्थानों पर पड़ोसी पाकिस्तान से जुड़ती हैं। प्रदेश में दो बड़ी नदियों सतलुज और ब्यास के अतिरिक्त दर्जनों ऐसे बरसाती नाले हैं जिनमें बड़े स्तर पर रेत की निकासी निरन्तर होती रहती है। रावी नदी का एक बड़ा हिस्सा भी पंजाब की धरती से होकर गुज़रता है। प्रदेश के जंगलों और पहाड़ों से भी रेत, बजरी और मिट्टी की खुदाई निरन्तर चलती रहती है। यह खनन स्थानीय प्रशासन की मंज़ूरी से भी होता है किन्तु अवैध रूप से की जाने वाली खुदाई इससे कई गुणा बड़े स्तर पर होती है। अवैध खुदाई का कार्य विगत कई दशकों से किया जाता आ रहा है। जैसे-जैसे रेत, बजरी और मिट्टी के दाम बढ़ते गये हैं, वैसे-वैसे अवैध खनन एक विशाल कारोबार बन गया है। इस कारोबार को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होने से स्थिति अनियंत्रित होती चली गई, किन्तु अब यह जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा ़खतरा बन कर सामने आने लगा है। इस बात का पता पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा की गई एक ताज़ा एवं कठोर टिप्पणी से चल जाता है। उच्च अदालत ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सीमांत क्षेत्रों में अवैध रूप से किया जाता खनन ऐसे चरण पर पहुंच गया है जहां पर न्यायालय आंखें मूंद कर बैठे नहीं रह सकते।
सीमांत क्षेत्रों के नदी-नालों और वन्य एवं पर्वतीय क्षेत्रों में अवैध खनन की यह क्रिया यूं तो प्रदेश के सभी भागों में चलती रहती है, किन्तु वर्तमान में यह मामला ज़िला पठानकोट में उजागर हुआ है जहां बरसात के मौसम में स्थानीय और नदी-सहयोगी चोओं और नालों में अक्सर पानी लबालब भर जाता है। इस कारण अवैध खनन-कर्ताओं को बड़े स्तर पर रेत और मिट्टी की खुदाई का बहाना मिल जाता है। इस स्थिति को लेकर विगत वर्ष सीमांत सुरक्षा बलों ने भी आपत्ति जताते हुए इसे सीमांत क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु खतरा करार दिया था। अब स्वयं प्रदेश के उच्च न्यायालय ने भी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु खतरा करार दे दिया है। अदालत का तर्क है कि दिन-रात होते इस अवैध खनन की आड़ में सीमा-पार से समाज-विरोधी तत्वों एवं आतंकवादियों की घुसपैठ की आशंका बढ़ जाती है। अदालत ने इस निरन्तर खनन की आवाजाही हेतु उपजते शोर और धुएं को भी प्रदूषण के लिए बड़ा ़खतरा घोषित किया है। व्यापक स्तर पर हो रहे इस अवैध खनन को सत्ता-संस्थानों और राजनीति का किस स्तर पर संरक्षण प्राप्त है, इसका पता अदालत में दायर की गई एक इस याचिका के विवरण से पता चल जाता है जिसमें प्रदेश के एक वरिष्ठ अधिकारी का नाम लेकर, उसके रिश्तेदारों पर खनन कारोबार में लिप्त होने के गम्भीर आरोप लगाये गये हैं। यूं भी, हम समझते हैं कि इतने बड़े स्तर पर, अवैध रूप से होने वाला यह कारोबार राजनीतिक एवं प्रशासनिक सहयोग व संरक्षण के बिना हो ही नहीं सकता। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि अवैध खनन हेतु प्रयुक्त की गई भूमि कागज़ों में केन्द्रीय सरकार की भूमि घोषित की गई है।
याचिकाकर्ता ने यह भी आशंका व्यक्त की है कि इस अवैध खनन की आड़ में भूमि के बड़े हिस्से पर अवैध रूप से कब्ज़ा कर लिया जाता है। इन अवैध कब्ज़ा-धारियों की ओर से विरोध करने वाले लोगों को डराना-धमकाना जैसे आम बात हो गई है। ऐसे आम लोगों पर आसामाजिक तत्वों से हमले कराये जाते हैं। अवैध खनन करने वालों के हौसले कितने बुलन्द हैं, इसका पता इस एक तथ्य से चल जाता है कि अतीत में जांच अथवा कार्रवाई करने गये पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर जानलेवा हमले किये गये, और कि उन्हें भारी-भरकम वाहनों से कुचलने की कोशिशें भी की गईं। अब स्थिति यह है कि उच्च अदालत ने एक ओर जहां पठानकोट के डिप्टी कमिश्नर से जवाब तलब किया वहीं इस मामले की स्वतंत्र जांच कराये जाने के लिए भी कहा है। इस मामले में सरकारी विभागों द्वारा ज़िम्मेदारी लेने से कतराना और उनमें विवाद उत्पन्न होना स्थितियों को और गम्भीर बनाता है। हम समझते हैं कि इससे पूर्व, कि आशंकाओं के अनुरूप स्थिति अधिक गम्भीर हो जाए, अथवा सीमाओं पर खतरा और गहरा जाए, सरकार को इस हेतु दृढ़ता-पूर्वक और प्रतिबद्धता से कार्रवाई करनी चाहिए। यह कार्रवाई जितनी जल्दी होगी, उतना ही प्रांत, देश और समाज के लिए अच्छा होगा।

