युवा वर्ग का भविष्य तथा भारत के व्यापारिक समझौते 

भारत का मूलमंत्र, लोकतंत्र और समानता का आधार होते हुए भी व्यवस्था की कार्यप्रणाली सोचने को मज़बूर करती है कि यही सत्य है या कोई भुलावा है। उदाहरण के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) जिसके पास भारत में उच्च शिक्षा की ज़िम्मेदारी है, इस तरह के नियम बनाये जिन पर उच्चतम न्यायालय गौर न करे तो देश में युवाओं की स्थिति यह हो जाए कि आपस में बात करने या मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने में इसलिए हिचकिचायें कि कहीं सरकारी नियमों की अवहेलना तो नहीं कर रहे। यह डर पैदा करता है और खतरनाक है। 
भ्रम, असुरक्षा और दिशाहीनता 
संसार में सबसे अधिक युवा जनसंख्या भारत में है। इसी के साथ शिक्षा व्यवस्था में अनिश्चय और भय का वातावरण उसे किस ओर ले जाएगा, कोई नहीं बता सकता। हो यह रहा है कि अस्पष्ट नियमों, बार-बार बदलते फैसलों और बिना सिर पैर के सुधार करने की ज़िद ने विद्यार्थियों के भविष्य को संकट में डाल दिया है। वे डिग्री लें तो किस विषय में, क्या उसके अनुरूप नौकरी मिल पाएगी या स्वरोज़गार कर पाएंगे और जो परिस्थिति आज है, क्या वह कल किसी आधे-अधूरे नियम के लागू होने से बदल तो नहीं जाएगी और यदि ऐसा हुआ तो उसका अब तक का किया धरा व्यर्थ ही हो जाएगा।
अजीब विरोधाभास है, एक ओर आरक्षित जिसे पिछड़ा माना जाता है तथा सामान्य वर्ग जिसे मज़बूत या समर्थ कहा जाता है, के बीच द्वेष उत्पन्न करना और दूसरी ओर भारत का विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का रास्ता तय करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक समझौते करना। क्या राजनीति इस अवस्था को प्राप्त हो गई है कि वह बिना भेदभाव किए हो ही न सके। प्रश्न यह है कि क्या यह किन्हीं खास व्यक्तियों, उनके व्यापार और उद्योग समूहों के लाभ को ध्यान में रखकर तो नहीं किया जा रहा, क्योंकि जब युवाओं में एक-दूसरे के प्रति ऊंच-नीच का भाव होगा, तब ही यह संभव हो सकेगा?
व्यापारिक समझौते 
अब हम इस बात पर आते हैं कि अमरीका भारत के प्रति अपना रूख ढीला कर रहा है तो इसका मतलब है कि यह ऊपरी नरमी है, अंदर से वह भारत और उसके जैसे दूसरे विकासशील देशों पर अपनी नकेल कसने की नीति पर ही चल रहा है। इसके साथ ही जहां तक यूरोपीय देशों तथा भारत के साथ व्यापार करने के इच्छुक दूसरे देशों की बात है, तो हकीकत यह है कि वे हमें केवल अपना आपूर्तिकर्ता बनाकर रखना चाहते हैं, न कि बराबरी का रिश्ता यानी निर्णायक भूमिका अदा करने वाला। वे भारत को एक बड़े बाज़ार की तरह देखते हैं, जहां वे अपनी अनुपयोगी वस्तुओं, उपकरणों और पुरानी टेक्नोलॉजी को बेच कर मुनाफा कमा सकें और हमें सशक्त बनाने के भ्रम में रख सकें।
ये सभी चाहते हैं कि भारत में उत्पादन हो लेकिन दाम वे तय करें। 
सस्ता श्रम होने और हमें प्रशिक्षित करने के बहाने वे हमें आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बाधा डालने का काम यह कहकर करते हैं कि वे अपने विशेषज्ञों और कर्मचारियों से यह सब करा तो रहे हैं, हमें क्यों इस पचड़े में पड़ना कि स्वयं गहन रिसर्च करें, अपनी टेक्नोलॉजी विकसित करें और दूसरी परेशानियां मोल लें। उनका लक्ष्य बाज़ार खुलवाना है न कि बराबरी की हैसियत बनने देना। इसके विपरीत चीन ने डंके की चोट पर अपना अच्छा बुरा, बढ़िया-घटिया, महंगा-सस्ता सभी तरह का सामान इन सभी देशों में पहुंचा कर उन्हें अपना बाज़ार बना दिया लेकिन खुद अपने यहां उनके सामान से यथासंभव दूरी बनाये रखी। भारत जो समझौते इन देशों से कर रहा है, यदि सतर्कता नहीं बरती गई तो भारत उनके लिए एक गोदाम बन जाएगा। 
अमरीका का रूख बदलते दिखना एक अवसर है कि भारत अपनी नीतियों और विशेषकर कूटनीति से उसे यह अहसास और अन्य देशों को विश्वास दिलाए कि हम ही बेहतर हैं। हम उद्योग हो या आधुनिक टेक्नोलॉजी, सभी स्तरों पर काम करना जानते हैं। इन सभी देशों की नीति है कि भारत को काम पर लगाए रखो, यह सोचने का अवसर न दो कि हम उनके लीडर बन सकते हैं। असली ताकत क्षमता है न कि समझौता। स्थायी लाभ की स्थिति यह है कि हमारे उत्पाद और कल कारखाने स्वदेशी तकनीक से उत्पादन करें और अपनी गुणवत्ता का लोहा मनवायें, इस स्थिति में ही वे हमें अपनी नवीनतम तकनीक देने को तैयार होंगे। वे चाहेंगे कि हम उनके पिछलग्गू बने रहें जबकि हम उनसे चीन की तरह आगे निकलकर उन्हें अपना अनुसरण करने के लिए बाध्य कर सकते हैं। यह भी विचारणीय है कि क्या ये देश इन समझौतों से हमें अपने लिए चीन का विकल्प बनाने की नीति पर तो नहीं चल रहे। सम्भव है कि ये पश्चिमी देशों के तरह-तरह के टैक्स जैसे ग्रीन टैक्स, कार्बन टैक्स, खेतीबाड़ी और कृषि उत्पाद के लिए ऐसे सख्त स्टैण्डर्ड जो हमारे लिए फायदेमंद न हों, यही नहीं, वीज़ा सीमा और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में आनाकानी, यह सब हम पर थोपने लगें। ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर जनता का जागरूक रहना आवश्यक है वरना ये राजनीतिज्ञ अपनी वाहवाही के लिए कुछ भी कर सकते हैं। 
यह खेल समझना होगा 
संशय होता है कि यूजीसी वैश्विक प्रभावों में तो आकर यह सब नहीं कर रहा कि हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी हो कि युवाओं को डिग्री तो मिले, लेकिन वैश्विक कौशल नहीं। उनके यहां हमारे योग्य युवा शानदार वेतन और सुविधाओं वाली नौकरी तो करें लेकिन भारत में रहकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन न कर पायें। सरकार युवाओं के लिए रुकावट बनकर अर्थहीन नियम लागू करती है, बेमतलब की पाबंदियां लगाती है, उद्यमी को नियमों का हवाला देकर वर्षों तक लटकाए रखती है ताकि वह सोचने के लिए मजबूर हो कि विदेश में ही जाकर अपनी योग्यता के अनुसार उन्नति करे तो अच्छा होगा। भारत में डिग्री देखी जाती है, योग्यता नहींए जबकि विदेशों में देखा जाता है कि युवा कितने सक्षम हैं और उनका दिमाग किस तरह से काम करता है। 
भारत में ज़रूरी है कि शिक्षा का जुड़ाव उद्योग और उद्यमी दोनों से हो, विश्व में कहीं भी प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा करने की तैयारी से हो, अपनी बनाई वस्तु को उसकी गुणवत्ता का भरोसा दिलाने में मदद मिलने से हो और कैसी भी विकट या विषम परिस्थिति से निपटने की कोशिश करने से हो। मतलब यह कि उच्च शिक्षा ऐसी जो आर्थिक रूप से सक्षम और निर्णय लेने की मानसिकता बना सके न कि जाति के आधार पर भेदभाव करने की। सर्विस सेक्टर हो या औद्योगिक क्षेत्र, सरकारी सहयोग और वित्तीय संसाधन प्राप्त न हों तो कितना भी बुद्धिमान व्यक्ति हो, वह छोटी-मोटी प्रगति बेशक कर ले लेकिन वैश्विक स्तर पर अपनी और देश की पहचान नहीं बना सकता। युवा वर्ग को यह सब समझकर ही अपना रास्ता तय करना होगा।

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